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मिल्खा सिंह पर की गई ये दो फ़ेसबुक पोस्ट आपको ज़रूर पढ़नी चाहिए

हिन्दुस्तान के लिए दौड़ने वाले धावक मिल्खा सिंह का पोस्ट कोविड दिक्कतों के चलते शुक्रवार की रात निधन हो गया. मिल्खा का जीवन सच में किसी सुपरहिट फ़िल्म की तरह ही रोमांचक है. उन्हें याद करते हुए सोशल मीडिया पर लिखे गए बहुत महत्वपूर्ण ये दो लेख अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं.

पहला लेख अशोक पाण्डे ने पोस्ट किया है :-

जीवन से निराश मिल्खा डाकू बन जाना चाहते थे

विभाजन की त्रासद हिंसा में मिल्खा सिंह के माता-पिता, एक सगी बहन और दो सगे भाई मार डाले गए थे. पाकिस्तान से भाग कर दिल्ली पहुंचे मिल्खा कुछ दिन अपनी बहन के घर रहे. उसके बाद उन्होंने रेलवे प्लेटफार्म को अपना घर बनाया. बिना टिकट यात्रा करते पकड़े जाने पर उन्हें जेल हुई. उसी बहन ने अपने हाथों के कड़े बेचकर भाई को तिहाड़ से बरी कराया. जीवन से निराश मिल्खा डाकू बन जाना चाहते थे लेकिन अपने भाई मलखान के कहने पर उन्होंने फ़ौज में भरती के लिए आवेदन किया. चौथी बार में उनका सेलेक्शन हुआ.

एक जवान के तौर पर उन्हें 5 मील की अनिवार्य दौड़ दौड़नी थी. शुरू के दस आने वालों को दौड़ने की ट्रेनिंग दी जाने वाले थी. आधा मील दौड़ाने के बाद मिल्खा के पेट में दर्द उठने लगा और वे बैठ गए. लेकिन उनके भीतर से कोई कह रहा था – “उठो! तुम्हें शुरू के दस में जगह बनानी है!” मिल्खा छठे नम्बर पर रहे.

बाद में उनके अफसर ने उनसे ट्रेनिंग के दौरान कहा कि उन्हें चार सौ मीटर की रेस के लिए तैयार किया जाएगा.

मिल्खा ने पूछा – “चार सौ मीटर माने कितना?”

“मैदान का एक चक्कर” उसे बताया गया.

“एक चक्कर! बस! यह तो कुछ भी नहीं है.” मिल्खा ने सोचा.

पांच साल बाद 1956 में मिल्खा सिंह मेलबर्न ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. 400 मीटर रेस में कुल आठ हीट हुईं. मिल्खा का नंबर पांचवीं में आया. 48.9 सेकेण्ड का समय निकाल कर वे हीट में आख़िरी रहे और प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गए. अमेरिका के चार्ल्स जेन्किन्स ने फाइनल में 46.1 सेकेण्ड का समय निकाल कर गोल्ड मैडल जीता.

प्रतियोगिता समाप्त होने पर मिल्खा टूटी-फूटी अंगरेजी बोलने वाले एक साथी अपने साथ ले गए और चार्ल्स जेन्किन्स से मिले. मिल्खा जानना चाहते थे कि चार्ल्स अपनी ट्रेनिंग कैसे करते हैं. दोस्ताना जेन्किन्स ने एक-एक बात बताई.

उसी वक्त मिल्खा ने फैसला किया कि जब तक जेन्किन्स का रेकॉर्ड नहीं तोड़ लेते, उन्हें रुकना नहीं है. दो साल बाद कटक में हुई एक रेस में उन्होंने ऐसा कर भी दिखाया. वे इतनी तेजी से भागे कि निर्णायकों को यकीन न हुआ और उन्होंने ट्रेक की दोबारा से पैमाइश कराई.

मिल्खा सिह के नाम के साथ 1960 के रोम ओलम्पिक की वह ऐतिहासिक रेस जुड़ी हुई है जिसने उन्हें एक मिथक में तब्दील कर दिया. वे फाइनल में पहुंचे और आधी रेस तक सबसे आगे रहने के बावजूद सेकेण्ड के सौवें हिस्से से मैडल पाने से रह गए. उस रेस में ओटिस डेविस और कार्ल कॉफ़मैन ने नया विश्व रेकॉर्ड बनाया जबकि 45.73 सेकेण्ड के साथ मिल्खा सिंह ने राष्ट्रीय रेकॉर्ड बनाया. यह रेकॉर्ड तोड़ने में अड़तीस साल लगे जब  परमजीत सिंह ने कलकत्ता में 45.70 सेकेण्ड का समय निकाला.

मिल्खा सिंह के कारनामों के बारे में हर कोई थोड़ा-थोड़ा जानता है. हमने बचपन से उन्हें हमेशा एक सादगी भरे सैनिक की तरह देखा है जिस की आंखों के भीतर हर वक्त एक आग रोशन रहती थी. अपनी सफलता का श्रेय उन्होंने हमेशा तीन चीजों को दिया – अनुशासन, मेहनत और इच्छाशक्ति. ये तीन चीजें बस में आ जाएं तो आदमी दुनिया में सब कुछ हासिल कर सकता है. इस साधारण सी बात को जानता हर कोई है अलबत्ता जिन्दगी में उसे बरतने की तमीज बस किसी-किसी में होती है. इसीलिये हमारे पास सिर्फ एक मिल्खा सिंह था.

था लिखते हुए भीतर कुछ काँप रहा है. अभी कुछ देर पहले उनके न रहने का समाचार आ रहा है. देश के सबसे बड़े चैम्पियन एथलीट को श्रद्धान्जलि!

https://www.facebook.com/ashokpande29

और ये दूसरी पोस्ट पत्रकार श्याम मीरा सिंह ने लिखी है :-

”Milkha you did not run, you flew”

हिंदुस्तान के लिए जैसे मिल्खा थे वैसे ही पाकिस्तान के लिए अब्दुल खलीक थे. पाकिस्तान चैंपियन अब्दुल खलीक. साठ का दशक था और जनवरी का सर्द महीना. पकिस्तान के उर्दू अख़बारों में हेडलाइन छपी…’खलीक बनाम मिल्खा – पाकिस्तान बनाम इंडिया’. मिल्खा के लिए उस मुल्क में लौटना एक ट्रौमा से कम न था जिसमें अपने मां-बाप, भाई बहनों के गले कटते हुए अपनी आंख के सामने देखा था. मिल्खा का जन्म अविभाजित भारत में हुआ था, जिसे आज पाकिस्तान कहते हैं. जब साल 1947 में हिंदुस्तान की सरजमीं पर दो लाइनें खींच दी गईं. इधर हिंदुस्तान में मुसलमान मारे गए, उधर दूसरे मुल्क में सिख और हिन्दुओं के कत्लेआम किये गए. मिल्खा का परिवार भी हिंदुस्तान आने के क्रम में ही था कि मिल्खा के मां-पिता और आठ भाई-बहनों को मौत के घाट उतार दिया. बचे मिल्खा. भागते-गिरते-गिराते बचते हुए अकेले ही भारत आ पहुंचे, दिल्ली के शरणार्थी कैंपों में रहे. कोई काम नहीं मिलता था उन दिनों, मन हुआ कि डकैत बन जाऊं. पर बड़े भाई की सोहबत ने चोर न बनने दिया. दूसरा ऑप्शन सेना में सिपाही बन जाना था. 1951 में मिल्खा सिपाही हो गए.

शुरुआत में पाकिस्तान जाने के सवाल पर मिल्खा झिझकने लगे. तभी हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु से उनकी बात होती है, नेहरु ने मिल्खा से कहा- तुम्हारे पास इस मुल्क का प्यार और स्नेह है, हम सब तुम्हारे साथ हैं, इसलिए अतीत को भुला दो, उन्होंने दोस्ती की भावना से तुम्हें अपने यहां दौड़ के लिए निमंत्रण भेजा है. मैं चाहता हूं तुम वहां जाओ और हमारे देश का प्रतिनिधित्व करो.” नेहरु से तसल्ली मिल जाने के बाद मिल्खा पाकिस्तान जाने के लिए तैयार हो गए.

बाघा बॉर्डर पार करते ही मिल्खा की जीप पर पाकिस्तानियों ने फूल बरसाए, फूल बरसाने वाले और इस स्वागत से खुश होने वाले दोनों ही लोगों ने विभाजन में जरूर अपने खोए रहे होंगे. फिर भी आज दोनों अपना अतीत भुलाकर भविष्य के साथ न्याय बरतना चाहते थे. सड़क के दोनों पार खड़े लोग हिन्दुस्तानी खिलाड़ी को चीयर कर रहे थे, खुश हो रहे थे. ये वो दो मुल्क मिल रहे थे जिन्होंने दस साल पहले ही अपनी अपनी तलवारों को एक दूसरे के गले से नीचे उतारा होगा. मगर इस दिन का आना इस बात की गुंजाइश का भी गवाह था कि लाख नफरतों में मोहब्बत के फूल उगाए जा सकते हैं. इधर के बाग़ में नेहरु जैसा जहीन माली था उधर भी किसी का दिल हिंदुस्तान के लिए पिघला होगा.

मिल्खा के पहुंचते ही उर्दू अख़बारों में एकबार फिर हेडलाइन बनीं… खलीक बनाम मिल्खा, पाकिस्तान बनाम हिंदुस्तान….”

रेस वाले दिन लाहौर स्टेडियम में 60 हजार लोग इकट्ठे हो गए, जिनमें बीस हजार महिलाऐं थीं. रेस शुरू होने से पहले मौलवी आए, प्रार्थना की गई, मोहम्मद याद किये गए. खलीक के लिए दिल भर दुआएं माँगी गईं. मिल्खा के लिए दुआएं मांगने वाला कोई पुरोहित वहां न था, खलीक के लिए दुआएं मांगने के बाद जैसे ही मौलवी लौटने को हुए, मिल्खा बोल पड़े…..”मैं भी खुदा का बन्दा हूँ.”

इसे सुनने के बाद दो मुल्कों की दीवारें ढह गईं, दो धर्मों के दरवाजे एक आंगन में आकर मिल गए. मौलवी रुक गए, और मिल्खा के लिए भी दुआएं कर दीं, या अल्लाह इसे भी जीत बक्शें…

कुछ देर बाद रेस शुरू हो गई. खलीक सौ मीटर की रेस मारने वाले महान लड़ाका थे और मिल्खा थोड़ी दूर तक जाने वाले जांबाज घोड़ा थे, मुकाबला दो देशों के साथ-साथ दो वीरों का भी था. दोनों में से कोई उन्नीस बीस नहीं. दोनों बराबर, दोनों किसी युद्ध में खड़े आखिरी सेनापति जैसे. शुरुआत में ही खलीक मिल्खा से दो कदम आगे निकल गए, खलीक आगे आगे, मिल्खा पीछे पीछे, लेकिन 150 यार्ड होते-होते मिल्खा बराबरी पर आ गए, अगले ही पल खलीक पीछे छूट गए . मिल्खा ने मात्र 20.7 सेकंड में वो दौड़ मार दी. पूरे विश्व में वो नया रिकॉर्ड बना. मौलवियों की दुआएं शायद मिल्खा को लग गईं. खलीक हार गए, मिल्खा विजयी हुए…

चारों ओर साठ हजार पाकिस्तानी मायुश. पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब मिल्खा के पास पहुंचे और जीत की माला पहना दी. अयूब मिल्खा से बोले- ”Milkha you did not run, you flew”. मतलब तुम दौड़े नहीं यार, तुम तो उड़े…

पूरी दुनिया के अख़बारों में अगले दिन ये खबर छप गई. अयूब के शब्दों ने मिल्खा का नया नामकरण कर दिया, हर जगह एक ही लाइन छपी ‘Milkha you did not run, you flew” यहीं से मिल्खा का नाम पड़ा ‘फ्लाइंग सिख’…

जिस पाकिस्तान ने मिल्खा से उसके मां-बाप को छीना… उसी पकिस्तान ने उन्हें जी भर मोहब्बत दी. पाकिस्तान से लौटने के बाद मिल्खा के आगे दो शब्द और जुड़ गए ”फ्लाइंग सिख मिल्खा”…

यही भारत मां का उड़ने वाला इकलौता बच्चा… अपना हंस लेकर कल किसी दूसरे आसमान में उड़ गया..

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