Tag : प्रोम्थियस प्रताप सिंह

अभिव्यक्ति धर्मनिरपेक्षता नीतियां

डा. नरेन्द्र दाभोलकर की स्मृति शेष :आज उन्हें याद करते हुये..

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प्रोम्थियस प्रताप सिंह , 20 अगस्त उनके स्मृति दिवस पर. “मंगल, गुरु, शनि निर्जीव हैं, अचेतन हैं । मंगल पृथ्वी से 8 करोड़ किलोमीटर की...
कला साहित्य एवं संस्कृति

राष्ट्रीयता वर्तमान का कोढ़ है उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी. – मुंशी प्रेम चंद

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सन 1933-34 को ‘राष्ट्रीयता और अंतर्राष्ट्रीयता’ के शीर्षक से मुंशीजी ने लिखा– ● राष्ट्रीयता वर्तमान का कोढ़ है उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़...
कला साहित्य एवं संस्कृति

आज 31 जुलाई जन्मदिवस पर याद करते हुए. प्रोम्थियस प्रताप

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15 जनवरी 1934 को 2:15 बजे दिन ऐसा जबरदस्त भूचाल आया जैसा इस देश में इधर सदियों से नहीं आया था, जो ‘नेपाल’ की तराई...
विज्ञान

12 जुलाई : विस्सारियन ग्रिगोरियेविच बेलिंस्की का जन्म.

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प्रोम्थियस प्रताप सिंह विस्सारियन ग्रिगोरियेविच बेलिंस्की का जन्म 12 जुलाई 1811 को एक देहाती डॉक्टर के घर हुआ था। बचपन का अधिकतर समय पेंजा गुबर्निया...
कला साहित्य एवं संस्कृति

11 जुलाई भीष्म साहनी जी का स्मृति दिवस .

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पापा की खिंची भीष्म साहनी की कुछ पुरानी तस्वीरें। आज 11 जुलाई भीष्म साहनी जी का स्मृति दिवस है। – प्रोम्थियस प्रताप सिंंह 26 मई...
औद्योगिकीकरण पर्यावरण

हम तो अपनी सांसों की वकालत करेंगे….पूरी दुनिया में ही जंगलों की जान को खतरा है…

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कबीर संजय ,जंगल कथा से … पूरी दुनिया में ही जंगलों की जान को खतरा है। कहीं पर रेल की पटरियों के लिए, कहीं पर...
जल जंगल ज़मीन पर्यावरण

दुनिया को जलवायु संकट से बचाने के लिए एक हजार अरब पेड़ों को लगाए जाने की जरूरत है.

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कबीर संजय ,जंगल कथा से दुनिया को जलवायु संकट से बचाने के लिए एक हजार अरब पेड़ों को लगाए जाने की जरूरत है। इतने पेड़...
कला साहित्य एवं संस्कृति

पता नहीं इंसान ने कितनी पीढ़ियां खर्च करने के बाद निजी संपत्ति और चोरी के द्वैत को स्थापित किया होगा.

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कबीर संजय ,जंगल कथा से इब्ने इंशा जी ने लिखा है— इस जग में सबकुछ रब का है, जो रब का है वो सबका है।...
कला साहित्य एवं संस्कृति पर्यावरण

पैसे की सनक सबकी दुश्मन है ,पेड़-पौधे, पानी, पहाड़ और प्रकृति सबकी .

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कबीर संजय ,जंगल कथा से पैसे की सनक सबकी दुश्मन है। पेड़-पौधे, पानी, पहाड़ और प्रकृति। उसके लिए सब बस उसकी इच्छा पूर्ति के साधन...
कला साहित्य एवं संस्कृति प्राकृतिक संसाधन

प्रकृति के संकेतों को नहीं समझने वाली सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं.

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कबीर संजय जी की वॉल से साभार प्रकृति के संकेतों को नहीं समझने वाली सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं। लग तो ऐसा ही रहा है...