कला साहित्य एवं संस्कृति

II कवि कालजयी II अमीर ख़ुसरो : जश्न-ए-अदब.

खुसरो दरिया प्रेम का,सो उलटी वा की धार।
जो उबरो सो डूब गया जो डूबा हुवा पार।

अबुल हसन यमीनुद्दीन अमीर ख़ुसरो को हम हिंदी खड़ी बोली के सबसे पहले और सबसे लोकप्रिय लोककवि के रूप में जानते हैं. प्रसिद्ध इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ ‘तारीखे-फिरोज शाही’ में लिखा है कि बादशाह जलालुद्दीन फ़ीरोज़ खिलजी ने खुसरो की एक चुलबुली फ़ारसी कविता से प्रसन्न होकर उन्हें ‘अमीर’ का ख़िताब दिया यही नहीं वे एक वाहिद दरबारी हैं जिन्होंने गुलाम, ख़िलजी और तुग़लक़ के कई सुल्तानों का शासन अपनी आँखों से देखा है.

दोस्तों, उनके जन्म से पहले की बात है, चंगेज़ ख़ान के सितम बढ़ते जा रहे हैं, समरक़ंद से जान बचाकर कुछ लोग हिन्द पहुंचते हैं. सैफ़ महमूद भी अपने बाशिंदों के साथ हिंदुस्तान आते हैं यहाँ इल्तुतमिश की बादशाहत है. वे यही पनाह लेते हैं एक नवाब की बेटी से शादी हो जाती है अमीर ख़ुसरो उन्ही के मंझले बेटे हैं जिनका जन्म एटा उ. प्र. में सन् 1253 में हुआ.

आठ बरस की उम्र में वे अपने सूफ़ी गुरु, अपने पीर ‘हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया’ की शरण में आ जाते हैं वे हर ज़ाविये से अद्वितीय हैं वे बहुमुखी व्यक्तित्व के मालिक हैं वे कवि, संगीतकार, गवैये, दरबारी, सिपाही और इतिहासकार भी हैं. वाद्यंयंत्रो के साथ प्रयोग भी उनकी कार्यशैली और विलक्षण प्रतिभा का हिस्सा है. मुझे याद है मेरी भुआ मुझसे ये पहले बुझने को कहती थी और मुझे तब यह नहीं पता था कि यह सदियों पुरानी है मुझे तो लगता था कि मेरी भुआ ने ही बनाई है

एक थाल मोती से भरा
सबके सर पर औंधा धरा
चारों ओर वह थाली फिरे
मोती उससे एक न गिरे।

इसका उत्तर था ‘आकाश‘.

हिन्द से उनकी मोहब्बत बेमिसाल है यहाँ कि प्रकृति और संस्कृति ख़ुसरो की रूह में बसती है उनके पद, ग़ज़लें, पहेलियाँ, कह-मुकरियाँ, दोहे, ढकोसले, अनमेलियाँ, दुसुख़ने, उलटबाँसियाँ, गीत भी साधारण में असाधारण दर्शन और सूफ़ी फ़लसफ़े से भरे हुए हैं भाषा का जहाँ तक ताल्लुक़ है तो देखिये कि क्या तुर्की, क्या अरबी, क्या फ़ारसी और क्या हिन्दवी (हिंदी )

बहुत कठिन है डगर पनघट की।
कैसे मैं भर लाऊं मधवा से मटकी।

उनका अपने पीर ख्वाजा हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से मोहब्बत का रिश्ता रूहानी था. ख्वाजा का मामूल था कि वे ध्यान में बैठते थे और इसमें कोई भी विघ्न नहीं डाल सकता था, वाहिद एक ख़ुसरो हैं जो ऐसा कर सकते हैं। अक्सर ख्वाजा ख़ुद उनसे ख़ुद की उम्रदराज़ी की दुआ मांगने को कहते और ये भी कहते कि मेरी उम्र से ही तेरी ज़िंदगी जुडी है मेरे बाद तू भी ज़्यादा न रह पाएगा इसलिए मैं अपने लिए नहीं तेरे लिए जीना चाहता हूँ मेरे लिए दुआ मांग, मेरी उम्र के लिए दुआ मांग। आख़िर में हुआ भी यही कि की ख्वाजा के जाने के बाद वो भी बदहवास होकर जल्द ही उनके पीछे-पीछे रुख़्सत हो गए. आज भी दोनों जुड़े हुए हैं दोनों की क़ब्र साथ साथ है. ख़ुसरो ने जाते जाते आख़िरी बार जो कहा वो ये था कि –

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस।

आइये मिलते हैं इसी क्रम में उनके बाद वाले कवियों से बारी-बारी तब तक के लिए…

शब-अ-ख़ैर!

आपका अपना
जश्न-ए-अदब.

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जुलैख़ा जबीं की फेसबुक वाल से आभार सहित 

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