कला साहित्य एवं संस्कृति

दुष्प्रचार के शिकार : जयचंद और भारतीय इतिहास

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*इतिहास हमेशा से ताक़तवर का हथियार रहा है। इसकी सच्चाई को कैसे बदला जाता है इसे जानने के लिए ‘जयचंद’ की सच्ची कहानी को पढ़कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है। भारत के पहले ‘हिंदवन’ राजा पृथ्वीराज चौहान ने अपने मामा की लड़की संयोगिता को अगवा कर उससे ज़बरदस्ती शादी की। मगर आज वह इतिहास का हीरो है और मामा ‘जयचंद’ ग़द्दारी का मुहावरा बन गया है। पिछले दिनों इंटरनेट पर एक लेख पर नज़र पड़ी तो बारहवीं सदी के इतिहास के कुछ छुपे हुए पहलू सामने आये। इस लेख से जो एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है वह यह है कि पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद ग़ोरी की लड़ाई का आधार साम्प्रदायिक नहीं था। यह लेख आप भी पढ़ सकते हैं।*
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किसी भी धोखे़बाज़, देशद्रोही या ग़द्दार के लिए ‘जयचंद’ का नाम मुहावरे की तरह प्रयोग किया जाता है। साहित्यिक रचनाएँ हों, कवियों की काव्य रचनाएँ हों या देशवासियों के आम बोलचाल की भाषा में धोख़ेबाज़, ग़द्दार, घर के भेदी, देशद्रोही वग़ैरह को जयचंद की उपमा तुरंत दे दी जाती है। बेशक उपमा देने वाला व्यक्ति जयचंद के बारे में कुछ जानता तक न हो। यही क्यों ? खुद जयचंद के वंशज भी बिना यह जाने कि वे भी उस जयचंद के ही वंशज है जिस जयचंद को पृथ्वीराज ग़ौरी के युद्ध में साहित्यकारों, कवियों, आदि ने देशद्रोही घोषित कर पृथ्वीराज की हार का ठीकरा झूठ ही उसके सिर पर फोड़ दिया, जाने अनजाने सुनी सुनाई बातों के आधार पर देशद्रोही ठहरा देते हैं और अपने आपको उसका वंशज समझ कर हीनभावना से ग्रसित होते हैं।

जयचंद पर आरोप है कि उसने मुहम्मद ग़ौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने हेतु बुलाया और सैनिक सहायता दी, लेकिन समकालीन इतिहासों व पृथ्वीराज रासो में इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है कि ग़ौरी को जयचंद ने बुलाया था और सहायता दी। फिर भी जयचंद को झूठा बदनाम किया गया। उसे ग़द्दार, देशद्रोही की संज्ञा दी गई जिसे एक वीर ऐतिहासिक पुरुष के साथ न्याय कतई नहीं कहा जा सकता है।

आईये पृथ्वीराज की हार के कुछ कारणों व उस वक़्त उसके साथ ग़द्दारी करने वाले व्यक्तियों के ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों पर नज़र डालते हैं जो साबित करते हैं कि जयचंद ने कोई ग़द्दारी नहीं की, कोई देशद्रोह नहीं किया। दरअसल पृथ्वीराज और जयचंद की पुरानी दुश्मनी थी, दोनों के मध्य कई युद्ध भी हो चुके थे। फिर भी पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता से शादी के बाद वह जयचंद का दामाद बन चुका था और यदि जयचंद पृथ्वीराज को मारना ही चाहता तो संयोगिता हरण के समय कन्नोज की सेना से घिरे पृथ्वीराज को जयचंद आसानी से मार सकता था, पर उसने पृथ्वीराज को संयोगिता के साथ घोड़े पर बैठे देखा तो उसे सुरक्षित रास्ता देकर जाने दिया और उसके बाद अपने पुरोहित दिल्ली भेजे जिन्होंने विधि-विधान से पृथ्वीराज-संयोगिता का विवाह संपन्न कराया।

तराइन के दूसरे युद्ध में चूँकि पृथ्वीराज ने जयचंद से किसी भी तरह की सहायता नहीं मांगी थी अत: जयचंद उस युद्ध में तटस्थ था। वैसे भी पृथ्वीराज उस युद्ध में इतने आत्मविश्वास में था कि जब गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव ने सैनिक सहायता का प्रस्ताव भेजा तो पृथ्वीराज ने उसकी ज़रुरत ही नहीं समझी और संदेश भिजवा दिया कि ग़ौरी को हराने के लिए तो वह अकेला ही काफी है। ऐसी परिस्थितियों में पृथ्वीराज द्वारा जयचंद से सहायता मांगने का तो प्रश्न ही नहीं उठ सकता।

*फिर कौन थे वे देशद्रोही और ग़द्दार जिन्होंने ग़ौरी को बुलाया था ?*

पृथ्वीराज रासो के उदयपुर संस्करण में ग़ौरी को ख़ुफ़िया सूचनाएं देकर बुलाने वाले ग़द्दारों के नाम थे – नित्यानंद खत्री, प्रतापसिंह जैन, माधोभट्ट तथा धर्मयान कायस्थ जो तंवरों के कवि व अधिकारी थे। पंडित चंद्रशेखर पाठक ने अपनी पुस्तक “पृथ्वीराज” में माधोभट्ट व धर्मयान आदि को ग़ौरी के भेजे जासूस बताया है जो कि किसी तरह पृथ्वीराज के दरबार में घुस गए थे और वहां से दिल्ली की सभी गोपनीय ख़बरें ग़ौरी तक भिजवाते थे।

जब संयोगिता हरण के समय पृथ्वीराज के ज़्यादातर शक्तिशाली सामंत जयचंद की सेना से पृथ्वीराज को बचाने हेतु युद्ध करते हुए मारे गए तो उसकी इस क्षीण शक्ति की सूचना इन ग़द्दारों ने ग़ौरी तक भिजवा उसे बुलावा भेजा पर ग़ौरी को इनकी बातों पर भरोसा नहीं हुआ। सो उसने फक़ीरों के भेष में अपने जासूस भेज सूचनाओं की पुष्टि करा कर और भरोसा होने पर ही पृथ्वीराज पर आक्रमण किया।

जम्मू के राजा विजयराज जिसका कई इतिहासकारों ने हाहुलिराय व नरसिंहदेव नाम भी लिखा है, हम्मीर महाकाव्य के अनुसार “घटैक” राज्य के राजा ने ग़ौरी की युद्ध में सहायता की। घटैक राज्य जम्मू को कहा गया है। पृथ्वीराज रासो में भी जम्मू के राजा का ग़ौरी के पक्ष में युद्ध में आना लिखा है। रासो में उसका नाम हाहुलिराय लिखा है जो युद्ध में चामुण्डराय के हाथों मारा गया था। तबक़ाते नासिरी के अनुसार – कश्मीर की हिन्दू सेना ग़ौरी के साथ युद्ध में पृथ्वीराज के ख़िलाफ लड़ी थी।

इतिहासकारों के अनुसार पृथ्वीराज का सेनापति स्कन्ध भी पृथ्वीराज से नाराज़ था और जब ग़ौरी ने पृथ्वीराज को मारने के बाद अजमेर का राज्य पृथ्वीराज के बेटे गोविन्दराज को देकर अपने अधीन राजा बना दिया था तब स्कन्ध ने पृथ्वीराज के भाई हरिराज को लेकर अजमेर पर आक्रमण किया और उसके बाद जब गोविन्दराज रणथम्भोर चला गया तब भी स्कन्ध ने हरिराज के साथ मिलकर उसका पीछा किया तब पृथ्वीराज के बेटे गोविन्दराज की दिल्ली के सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने सहायता की थी। अत: सेनापति स्कन्ध का असंतुष्ट होना भी पृथ्वीराज की हार का कारण हो सकता है और उसका नाम भी ग़द्दारों की सूची में होना चाहिये था।

राजस्थान के जाने माने इतिहासकार देवीसिंह मंडावा अपनी पुस्तक “सम्राट पृथ्वीराज चौहान” में लिखते हैं प्रारंभ में ग़ौरी का इरादा था पृथ्वीराज को अपने अधीन राजा बनाना था। इसलिए उसने पृथ्वीराज को क़ैद से मुक्त भी कर दिया था, ऐसा ताजुल मासिरी में लिखा है। शायद ग़ौरी ने इतने बड़े साम्राज्य पर नियंत्रण करने में स्वयं को असमर्थ महसूस किया हो। यह बात इससे सिद्ध होती है कि ग़ौरी ने प्रारंभ में जो सिक्का (मुद्रा) निकाला था वह चौहान शैली ही का था। जिस पर एक तरफ अश्वारोही और पृथ्वीराज देव अंकित था तथा पृष्ठ भाग में बैठा हुआ बैल और लेख “श्री महमद साम” दिया है।

प्रबंध चिंतामणि, प्रबंध संग्रह और ताजुल मासिरी के अनुसार पृथ्वीराज के एक मंत्री प्रतापसिंह पुष्पकरणा ने ग़ौरी को सूचना दी कि पृथ्वीराज मुसलमानों का घोर विरोधी है और नफरत करता है। ताजुल मासिरी लिखता है – अजमेर में पृथ्वीराज को कै़द से ग़ौरी ने छोड़ दिया था किन्तु इस्लाम के प्रति घृणा तथा किसी संभावित षड्यंत्र की आशंका हो जाने पर ग़ौरी ने अजमेर में ही पृथ्वीराज का सिर क़लम कर दिया था। हम्मीर महाकाव्य में भी पृथ्वीराज का अजमेर में ही मारा जाना लिखा है।

युद्ध के दौरान घटी घटनाओं व विभिन्न इतिहास की पुस्तकों में पृथ्वीराज की हार के कारणों के उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि इस युद्ध और उसमें हार के प्रति जयचंद की कोई भूमिका नहीं थी। उसे तो मुफ्त में ही पृथ्वीराज से दुश्मनी होने के चलते बदनाम कर दिया गया, जो कि उस ऐतिहासिक पात्र के साथ अन्याय है।

*पृथ्वीराज से ग़ौरी की दुश्मनी का असली का कारण*

सोने की चिड़िया के रूप में ख्याति प्राप्त भारत में धन प्राप्ति के चक्कर में विदेशी लुटरों के आक्रमण सतत् चलते रहे हैं। ग़ौरी को भी धन लिप्सा थी कि भारत में अथाह धन है जिसे लूटकर मालामाल हुआ जा सकता है। अत: भारत पर आक्रमण करने का उसका पहला इरादा यह भी समझा जा सकता है। मगर फिर भी सवाल उठता है कि उसनें पृथ्वीराज चौहान जैसे शक्तिशाली सम्राट से सीधी टक्कर क्यों ली जबकि वह छोटे-छोटे अनेक राज्यों को आसानी से लूटकर अपना खजाना भर सकता था?

पंडित चंद्रशेखर पाठक की पुस्तक “पृथ्वीराज” के अनुसार – पृथ्वीराज ने शिकार खेलने के लिए नागौर के पास वन में डेरा डाल रखा था तभी वहां ग़ौरी का एक चचेरा भाई “मीर हुसैन” चित्ररेखा नाम की अपनी प्रेमिका के साथ आया। वह सुन्दरता के साथ अति गुणवती भी थी। वीणा बजाने व गायन में वह पारंगत थी। ग़ौरी ने उसकी सुंदरता के अलावा उसके गुण नहीं देखे थे पर मीर हुसैन उसे उसके गुणों के चलते चाहने लगा था। अत: वह उसे साथ लेकर गज़नी से भाग आया था। नागौर के पास शिकार खेल रहे पृथ्वीराज से जब मीर हुसैन ने सब कुछ बता कर शरण मांगी तब उसने अपने सामंतों से सलाह मशविरा किया और शरणागत की रक्षा का क्षत्रिय धर्म निभाते हुए उसे शरण तो दी ही साथ ही उसे अपने दरबार में अपने दाहिनी और बैठाने का सम्मान भी बख़्शा। यही नहीं पृथ्वीराज ने मीर हुसैन को हांसी व हिसार के परग़ने भी जागीर में दिये।

इन सब की सूचना धर्मयान कायस्थ और माधोभट्ट के ज़रिये ग़ौरी तक पहुंची तब ग़ौरी ने संदेशवाहक भेजकर मीर हुसैन व चित्ररेखा को उनके हवाले करने का संदेश भेजा जिसे पृथ्वीराज व उसके सामंतों ने शरणागत की रक्षा का अपना धर्म समझते हुए ठुकरा दिया।

चंदरबरदाई के अनुसार पृथ्वीराज और ग़ौरी के आपसी बैर का मुख्य कारण यही था।

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