कला साहित्य एवं संस्कृति

जो काम दिल का हो… खुशी देता है। अपने काम से बेपनाह मोहब्बत करता हूं इसलिए यह खुशी आप सबसे शेयर कर रहा हूं, — राजकुमार सोनी

 

पत्रिका दिनांक  20.०७. 2017

दिल का काम…

कुछ स्टोरी दिल के करीब होती है। ऐसी ही एक स्टोरी आज छपी है पत्रिका के जीरो ग्राउंड पेज में। इस स्टोरी के लिए अपने राज्य संपादक श्री ज्ञानेश उपाध्याय जी का शुक्रिया अदा करता हूं। दरअसल अब से लगभग दो हफ्ते पहले जब हम जनसंपर्क विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी स्वराज दास जी के साथ चर्चा में मशगूल थे तभी उन्होंने याद दिलाया कि कभी श्रीलंका रेडियो स्टेशन से बजने वाले प्रसिद्ध मसीह गीत वंदना करते हैं हम को संगीतबद्ध करने वाले बंसत तिमोथी जी को लेकर एक अच्छी स्टोरी लिखी थी मैंने। हमारी बात सुनकर वहां मौजूद शायर मोहसिन अली सुहैल ने बताया कि रायपुर का मोमिन पारा एक ऐसा इलाका है जहां हर दूसरा बाशिंदा शायर है।

तय हुआ कि मोमिनपारा के शायरों पर एक स्टोरी कर ली जाए। मैं इस स्टोरी को चार-पांच सौ शब्दों में समेटना चाहता था, लेकिन ज्ञानेश जी ने कहा- इस पर तो पूरा एक पेज जाना चाहिए।

ऐसे समय जबकि साहित्य/ कला और संस्कृति की खबरें हाशिए में चली गई है तब उनके इस फैसले से मेरश होना स्वाभाविक था।

अब बारी थी खबर को कवर करने की। सुबह- सुबह कैमरा लेकर मोमिन पारा पहुंचा तो सबसे पहले एक नजर होटल मूसा पर पड़ी। एक कप चाय पीने की इच्छा जताते हुए मैंने होटल वाले से पूछा- यहां शायर कहां रहते हैं? होटल वाले ने शायराना अंदाज में जवाब दिया- ये पूछिए जनाब कि… कहां नहीं रहते हैं? जनाब… इस बस्ती के बारे में कहा जाता है यहां शायर ही पैदा होते हैं।
चार- पांच तो अभी यही होटल में ही बैठे हैं। मिल लीजिए। बस… फिर क्या था… मैं शायरों से घिर गया।

पूरे चार से पांच दिन मोमिन पारा आते-जाते रहा। कभी इस शायर से मुलाकात तो कभी उस शायर से। कभी किसी ने सिगरेट के पैकेट के पीछे शायरी लिखकर दी तो कभी चाय की गरमा-गरम चुस्कियों के बीच वजनदार शेर मिला। हर शायर एक से बढ़कर एक और हर की शायरी बेजोड़ शानदार और मीटर में।

स्टोरी को कवर करने के दौरान पता चला कि शायरों को सुन-सुनकर होटल में कार्यरत कर्मचारी भी शायर हो गए हैं।

सच कह रहा हूं मोमिन पारा के शायर गुरबत में जरूर जीते हैं लेकिन शायरी के मामले में मैंने उनसे ज्यादा अमीर किसी को नहीं देखा।

शायरों को सुनकर फिल्म प्यासा के गुरुदत्त की याद आई। मैं शायर बदनाम… जैसा लोकप्रिय गीत और रजा मुराद की भी। कई नामचीन शायर भी याद आए। इस बात का भी पता चला कि सैकड़ों ख्वाहिशें/ हजारों नाकामियां/ बेचैनियां/ घुटन/ तड़प साथ जमा होती है तब जाकर एक शायर बनता है।

यह स्टोरी मेरे दिल के करीब है।

जो काम दिल का हो… खुशी देता है। अपने काम से बेपनाह मोहब्बत करता हूं इसलिए यह खुशी आप सबसे शेयर कर रहा हूं।

एक रिपोर्टर को और क्या चाहिए?

 

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