कला साहित्य एवं संस्कृति

पुस्तक और पाठक -शरद कोकास

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मित्रों, आज हमारे मित्र *डॉ. के. बी. बंसोडे* अपनी दिवंगत माताजी एवं पिताजी की स्मृति में रायपुर के बुद्ध विहार में एक पुस्तकालय की स्थापना करने जा रहे हैं । इस पुस्तकालय का नाम है *बेनूताई जगदीशचंद्र बनसोडे स्मृति पुस्तकालय* । उनके इस स्तुत्य प्रयास के लिए उन्हें शुभकामनाएँ देते हुए समाज में पुस्तकों की उपयोगिता तथा पुस्तक और पाठक के सम्बन्ध पर आधारित यह लेख आप सब के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

? *शरद कोकास* ?

? *पुस्तक और पाठक* ?

?मित्रों हम मनुष्य हैं और हमारे पास एक सुदृढ़ मस्तिष्क है । हमने सहस्त्राब्दियों की अपनी यात्रा में जाना है कि पुस्तकों की हमारे जीवन में क्या उपयोगिता है । हम अपने अपने व्यवसाय में होने के अलावा और जीवन में अपनी भूमिका अदा करने के साथ साथ पुस्तक का महत्व भी जाना है । इसलिए हम एक अच्छे पाठक भी हैं और पुस्तकें खरीद कर उन्हें पढ़ते हैं । छात्र जीवन से लेकर अब तक पुस्तकें हमारी साथी रही हैं । सामान्यतः हमारा ध्यान इस बात की ओर नहीं जाता कि हमारे अलावा समाज में और किस तरह के पाठक हैं और वे क्या पढ़ते हैं ।

आप अगर नियमित रूप से बुक स्टाल , किताब की दुकानों अथवा पुस्तक मेलों में जाते होंगे तो आपने इस बात की ओर अवश्य ध्यान दिया होगा कि अब वहां वे पुस्तके कम मिलती हैं जो हम चाहते हैं । आज हम समाज में पाठकों की मनोवृति को बदलता हुआ देख रहे हैं । समाज में पुस्तकों की क्या उपयोगिता है और कितने तरह के पाठक पाए जाते हैं यह हमारे आज के इस लेख का विषय है ।

*रोज़गार प्राप्त करने के लिए पुस्तकें पढ़ने वाले पाठक*

?समाज में पुस्तकों की उपयोगिता और पुस्तकों के पाठक वर्ग के सन्दर्भ में बात करते हुए हमारे अवलोकन के परास में सामान्यतः वह समाज होता है जो अध्यापन, लेखन अथवा ऐसे ही किसी सामाजिक कार्य से सम्बन्ध रखता हो और पुस्तकें उसकी आवश्यकता की वस्तु हो । हम पढ़े-लिखे लोगों के समाज के बीच रहते हैं और साधारणतया सुशिक्षित लोग हमारे आसपास होते हैं , किन्तु आवश्यक नहीं है कि सभी की रूचि पुस्तकों में हो । यह वह मध्यवर्गीय समाज है जिसे जीवन की न्यूनतम सुविधाएँ हासिल हैं । वे लोग जो शहरों या कस्बों में रहते हैं जिन्हें जीवनयापन हेतु रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं , जो पढने का महत्त्व जानते हैं तथा अपनी आनेवाली पीढ़ी के लिए शिक्षा की सुविधा एवं उपलब्धता के प्रति सचेत हैं , इस वर्ग के लोग जीवन में पुस्तकों की भूमिका तथा उनके महत्त्व को पहचानते हैं , जाने अनजाने पुस्तकें उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं , पुस्तकों की उपयोगिता का अर्थ वे शिक्षा से लेते हैं और पुस्तकें उनके लिए अकादमिक शिक्षा का एक साधन मात्र हैं । पुस्तकों की उपयोगिता उनके जीवन में एक सीमा तक होती है जिसमे शालेय शिक्षा , उच्च शिक्षा और उसके बाद इनके माध्यम से प्राप्त किया गया रोज़गार शामिल होता है ।

?रोज़गार प्राप्त करने के बाद ऐसे पाठकों के जीवन से पुस्तकों का सम्बन्ध सदा के लिए समाप्त हो जाता है । गाहे बगाहे यदि उन्हें प्रतियोगी परीक्षा में बैठने या किसी तकनीकी ज्ञान के लिए पुस्तकों की आवश्यकता होती है तभी वे पुस्तक पढ़ते हैं । पुस्तकों से उनका सम्बन्ध तब तक ही बना रहता है जब तक पुस्तकें उनके लिए अनिवार्य न हो अथवा वे एक ऐसे व्यवसाय से जुड़े न हों जहाँ पुस्तक पढ़ना उनकी विवशता न हो । इस वर्ग में ऐसे शिक्षक अथवा प्राध्यापकों को हम ले सकते हैं जो पुस्तकों में पूर्वसंचित ज्ञान को अपने छात्र वर्ग तक पहुंचाते हैं ।निस्संदेह यह बहुत महत्वपूर्ण कार्य है लेकिन विषय से सम्बंधित अद्यतन जानकारी से परिचित होना और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना बहुत श्रमसाध्य कार्य है और बहुत कम लोग ऐसा कर पाते हैं । ऐसे वर्ग में भी उन लोगों की संख्या अधिक है जिन्होंने अपने पढ़ने की सीमा तय कर रखी है पाठ्य पुस्तको अथवा व्यवसाय हेतु अनिवार्य पुस्तकों में निहित सामग्री उनके लिए ज्ञान की अंतिम सीमा है ।

*मनोरंजन के लिए पुस्तकें पढ़ने वाले पाठक*

?इसके बाद जो वर्ग आता है पुस्तकों की उपयोगिता उनके जीवन में केवल रोज़गार प्राप्ति के साधन अथवा व्यावसायिक सफलता हेतु नहीं है । वे पुस्तकों का उपयोग जीवन के अन्य उद्देश्यों के लिए भी करते हैं इनमे सबसे बड़ा उपयोग हैं मनोरंजन । फुटपाथ पर बिकने वाली सैकड़ों किस्म की किस्से कहानियों की किताबों से लेकर शहर की बड़ी बड़ी दुकानों के शो केस में सजी पुस्तके उनके लिए मनोरंजन का साधन मात्र है। उनके लिए पुस्तकों का अर्थ महज समय बिताना है । विभिन्न किस्म के झूठ ,कपोल कल्पनाएँ सेक्स , रहस्य – रोमांच से भरी इन किताबों में छपी सामग्री उनके लिए विश्व का सवश्रेष्ठ साहित्य है । यह लोग इसी तरह की कल्पनाओं में जीते हैं और इन उपन्यासों या कहानियों के पात्र इनके लिए आदर्श नायक की तरह होते हैं । उनके व्यक्तित्व का निर्माण भी इसी प्रकार की पुस्तकों से होता है ।

? मैं यहाँ सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जुंग को उद्धृत करना चाहूँगा । जुंग के अनुसार कहा जाए तो ऐसे पाठकों का सामूहिक अचेतन इसी प्रकार की पुस्तकों से निर्मित होता है जिसमे उनके धार्मिक विश्वास , पौराणिक कहानियां ,काल्पनिक कथाएं आदि का समावेश होता है । इन पुस्तकों में वे अपने आद्यरूप (Archetype) चरित्रों को ढूँढते हैं जो जुंग के अनुसार चमत्कारिक गुणों से ओतप्रोत नायक , अनुभव और ज्ञान से पूर्ण परामर्शदाता अथवा तामसिक या अपराधिक प्रवृति से भरे शैतान हो सकते हैं । ऐसे पाठक अपने जीवन में इन्ही आद्यरूपों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं । मातृशक्ति आद्यरूप के गुणों का वर्णन करते हुए जुंग ने स्त्री के ज्ञान , कर्म आदि को प्राथमिकता न देकर उसकी भावनाएं ,वात्सल्य ,क्षमा ,स्नेह आदि को उनका प्रमुख गुण माना है इन बातों के गूढार्थ न समझने के फलस्वरूप ऐसे पाठकों की स्त्री सम्बन्धी धारणाएँ भी ऐसे ही निर्मित होती हैं और वे उसे पुरुष की बराबरी का न समझकर उसे गौण समझते हैं । समाज में पुरुषवादी मानसिकता के निर्माण में ऐसी पुस्तकें सहायक होती हैं । इन पाठकों के लिए किसी भी भाषा का क्लासिक साहित्य गंभीरता और बोझिलता से भरा हुआ होता है और वे इस तरह का साहित्य पढ़ने का अर्थ दिमाग पर बोझ डालना समझते हैं । सामान्यतः वे भक्तिकालीन साहित्यकारों के अलावा आधुनिक युग के ऐसे साहित्यकारों का नाम भी नहीं जानते । वैश्विक साहित्य से तो उनका कोई परिचय ही नहीं होता ।

*जिस तरह कवि सम्मलेन में फूहड़ हास्य की तुकबंदी युक्त कविताएँ और चुटकुले सुनाने वाला कवि उनके लिए देश का सबसे बड़ा कवि होता है उसी तरह गुलशन नंदा ,रानू , राजवंश , समीर , सुरेन्द्र मोहन आदि इनके लिए प्रेमचंद से बड़े लेखक है.

इसलिए वर्दीवाला गुंडा ,सबका बाप , खूनी कातिल , धोखा जैसे जासूसी उपन्यास और धार्मिक पुस्तकों की लाखों प्रतियाँ बिकती हैं . रेलवे स्टेशन , बस स्टैंड और फुटपाथ पर सजी किताबों की दुकानें ऐसे ही साहित्य से भरी होती हैं जिनमे सेक्स , नैतिकता और सामाजिकता के नाम पर स्त्री विरोधी बातें लिखी होती हैं , टी वी पर इनके विज्ञापन आते हैं । ऐसी पुस्तकों के लेखक और प्रकाशन के व्यवसाय से जुड़े व्यवसायी पाठक वर्ग की इस कमजोर नस को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं और उनके लिए इसी प्रकार का लुगदी साहित्य परोसते हैं ।

*सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए पुस्तक पढ़ने वाले पाठक*

?इसी वर्ग में एक उपवर्ग और है जिसका उद्देश्य पुस्तकों द्वारा मात्र सूचनाएं प्राप्त करना होता है ।कहाँ क्या घटित हो रहा है और उस घटना से समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है यह उनके अध्ययन के विषय है । अपना सामान्य ज्ञान बढाने तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने के लिए अक्सर छात्र वर्ग ऐसी पुस्तकों का सहारा लेता है जो परीक्षा हेतु तय की जाती हैं । इनमे भी अब ऐसे पाठकों की बहुतायत हो गई है जो विषय का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने हेतु विस्तार से लिखी पुस्तकें पढने की अपेक्षा उस विषय पर लिखी संक्षिप्त कुंजियां पढ़ना अधिक पसंद करते हैं । इस वर्ग में वे लोग भी हैं जो सामाजिक राजनैतिक गतिविधियों से स्वयं को अपडेट रखना चाहते हैं किन्तु उन पर किसी प्रकार की चर्चा करना अथवा हस्तक्षेप करने से उन्हें परहेज होता है । पुस्तकों से ज्यादा पत्रिकाएँ उनकी मदद करती हैं ।

? अखबार भी यह काम अच्छी तरह से करते हैं इसलिए अख़बार की भाषा में लिखी गई पुस्तकें उन्हें प्रिय होती हैं । इसमें केवल महिलाओं के लिए प्रकाशित वे तमाम पुस्तकें और पत्रिकाएँ भी शामिल हैं , जिनमें ‘ ननद से आपका व्यवहार कैसा हो ‘, मायके आने पर कैसे व्यवहार करें’ . ‘ आपका बच्चा बिस्तर में पेशाब करता है तो क्या करें ‘ आदि शीर्षक से लेख होते हैं . कई लोग हेल्थ टिप्स , फैशन टिप्स या ब्यूटी टिप्स के लिए इन किताबों को खरीदते हैं । कुछ पाठक फिल्मों सम्बन्धी अपने ज्ञान में वृद्धि हेतु इन पुस्तकों या पत्रिकाओं को पढ़ते हैं और उनकी रूचि केवल इस बात में होती है की फ़िल्मी सितारों के जीवन में क्या घटित हो रहा है । वे इस बहाने उनके बेडरूम तक में झांककर देख लेना चाहते हैं । पिछले कुछ वर्षों से मानव व्यवहार , व्यक्तिव विकास ,धन कमाने के नुस्खे , वक्तृत्व कला , काम कला , सफल लेखक कैसे बने जैसे विषयों पर भी पुस्तकों की बाढ़ आई हुई है । इन पुस्तकों का अपना एक अलग पाठक वर्ग है । इन पुस्तकों के शीर्षक भी बहुत रोचक होते हैं यथा ‘ एक माह में लखपति बने ‘ चिंता छोड़े सुख से जियें ‘ ‘ आप जीत सकते हैं ‘ इत्यादि . ऐसे विषयों पर लिखने वाले विदेश के लोकप्रिय लेखकों की तर्ज पर हमारे यहाँ के लेखकों ने भी ऐसी ही पुस्तके लिखना प्रारंभ किया है जिनमे मानव व्यवहार से सम्बन्धित अधिकांश उदाहरण विदेशों , खासकर अमेरिका और योरोप की जीवन पद्धति को लेकर होते हैं । हमारे यहाँ के पाठक यद्यपि उस परिवेश से भिन्न परिवेश के होते हैं किन्तु रातों सफलता प्राप्त करने और शीघ्र धन कमाने के आकर्षण में वे उन पुस्तकों को खरीद लेते हैं ।

 

*जीवन शैली के लिए पुस्तक पढ़ने वाले पाठक*

? इनके अतिरिक्त कुछ पाठकों को ज्योतिष हस्तरेखा आदि से सम्बंधित पुस्तकें प्रिय होती हैं । कोई अपनी राशि जानने के लिए किताबे पढ़ता है तो कोई अपना भविष्य जानने के लिए . तंत्र मंत्र से सम्बन्धित किताबों के पाठक अक्सर समाज में अन्धविश्वास को प्रश्रय देते हैं . इसी श्रेणी में ‘होमियोपैथी के सफल डॉक्टर बने ’ जैसी किताबों के पाठक भी होते हैं जो बिना किसी वैज्ञानिक या चिकित्सकीय ज्ञान के डॉक्टर बन जाना चाहते हैं । ऐसे लोग आगे चलकर ‘ नीम हकीम खतराए जान ‘ जैसी कहावतों को चरितार्थ करते हैं । इन्ही में से कुछ पाठक ‘ घर बैठे हारमोनियम ,तबला ,गिटार , सिंथेसाइजर सीखें जैसी किताबें पढ़कर संगीतज्ञ बन जाना चाहते हैं । कुछ पाठक योगासन ,बॉडी बिल्डिंग जैसे विषयों पर लिखी किताबें पढ़कर स्वयं को स्वस्थ्य महसूस करते हैं और अक्सर ऐसी पुस्तकें पढ़कर अपने मन से व्यायाम करने पर किसी व्याधि या शारीरिक कष्ट का शिकार हो जाते हैं जबकि ऐसी पुस्तकों में स्पष्ट लिखा होता है की यह सब क्रियाएँ किसी योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शन में करें ।

*इन्हीमें एक पाठक वर्ग पोर्न पुस्तकों का भी होता है जिनके लिए सचित्र कामशास्त्र , यौन रोगी और उनकी समस्याएँ जैसे शीर्षकों में पुस्तकें उपलब्ध होती हैं । इन पुस्तकों में अश्लील भाषा में कहानियां होती है जो यौन रूप से कुंठित पाठकों की कुंठा का शमन करती हैं।*

*ज्ञानवर्धन हेतु पुस्तक पढ़ने वाले पाठक*

?इन तमाम पाठकों के अतिरिक्त पाठकों का एक वर्ग और है जो साहित्य , दर्शन , मनोविज्ञान , इतिहास , आदि की पुस्तकों का गंभीर अध्येता है । इस वर्ग में अधिकांश लेखक और बुद्धिजीवी हैं जो पुस्तकों से प्राप्त ज्ञान का उपयोग नया जीवनोपयोगी साहित्य रचने में करते हैं । इसमें विभिन्न विषयों पर लिखने वाले लेखकों के अतिरिक्त कविता कहानी , उपन्यास आदि साहित्य रचाने वाले लेखक शामिल हैं । यह लोग पढ़ी गई पुस्तकों का उपयोग सन्दर्भ ग्रंथों की तरह करते हैं । साहित्येतर विषयों पर लिखने वाले लोगों लेखकों के लिए यह पुस्तके उनके शोध के काम में आती हैं । संसार में रचा गया महान साहित्य पढ़ने के लिए यह पाठक सदा तत्पर रहते हैं .मूल साहित्य के साथ साथ अनुदित साहित्य भी इन्हें उपलब्ध होता है । संसार के महान लेखक इनके प्रेरणास्त्रोत होते हैं । लेखकों के लिए अध्ययन की उपयोगिता पर बहुत सरे लेखकों ने अपने विचार प्रकट किए हैं . ‘ मैंने लिखना कैसे सीखा ‘ इस विषय पर लिखे एक निबंध में प्रसिद्द लेखक गोर्की कहते हैं कि “ स्वयं जीवन तथा पुस्तकों ने भी मेरे मन पर अपनी छापें अंकित कीं । मैं विदेशी साहित्य खासकर फ्रांसीसी साहित्य का बहुत ऋणी हूँ । मुझे एक बात मालूम हुई की पुस्तकों से मनुष्यों के बारे में मुझे ऐसी बातों का ज्ञान हो सकता है जो पहले मैंने उसमे नहीं देखी थीं या नहीं जानता था । मैंने घटिया पुस्तकें भी बेहिसाब पढ़ीं परन्तु उनसे भी मुझे लाभ हुआ जीवन के बुरे पहलू को भी आदमी को उसी तरह से जानना चाहिए जिस तरह अच्छे पहलू को । आदमी को अधिक से अधिक ज्ञान होना चहिये , उसका अनुभव जितना विविध होगा उसका दृष्टि क्षेत्र उतना ही व्यापक होगा .”

?यह प्रसन्नता का विषय है कि इस तरह का पाठक वर्ग निरंतर बढ़ता ही जा रहा है । इनमे बहुसंख्य युवा वर्ग भी शामिल है । प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में तथा देश के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जाने वाले पुस्तक मेलों में ऐसे पाठकों की उपस्थिति आशा का संचार करती है । विभिन्न संस्थाएं भी अपने सेट अप में पुस्तकालय की उपयोगिता को महत्व दे रही हैं । वास्तव में अच्छी पुस्तकों का भविष्य ऐसे ही पाठकों की उपस्थिति पर निर्भर करता है ।यह हर्ष का विषय है कि अब ज्ञान वर्धन करने हेतु पुस्तक पढ़ने वाले पाठकों का समुदाय बढ़ता जा रहा है ।

*पुस्तकें न केवल हमारे ज्ञान की भूख मिटाती हैं बल्कि यह हमारी विश्व दृष्टि निर्माण करने में हमारी सहायक होती हैं , जिसके आधार पर हम जान सकते हैं कि दुनिया में विषमता क्यों है ? क्यों कुछ लोगोंके पास दुनिया की पूरी सम्पति है और शेष लोग निर्धन हैं ? क्यों हम अपनी विवशता में जीने को मजबूर हैं ? क्यों हम अन्द्धविश्वासों के साये में जीते हुए अपनी बदहाल स्थिति के लिए ज़िम्मेदार हैं ? हम कैसे अपनी इस स्थिति से बाहर निकल सकते हैं ? कैसे हम अपने दमन और शोषण के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं ?*

*अगर आप भी इन सवालों के जवाब जानना चाहते हैं तो किताबें पढ़िए , किताबें हमारे लिए सिर्फ किताबे नहीं हैं बल्कि अपनी बदहाली के खिलाफ लड़ने के लिए एक हथियार हैं ।*

? *शरद कोकास* ?
*8871665060*

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