कला साहित्य एवं संस्कृति कविताएँ

“मेरी सड़क मेरी रात ” — सविता प्रथमेश

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लड़की और सड़क
लड़की खड़ी है सड़क पर
भांप रही है, समझ रही है
सड़क को
ग़र इस पर वह चले तो जाने कहां ले जाएगी सड़क?
हो सकता वहां, जहां उसे जाना न हो.
क्यों न वह अपनी सड़क ख़ुद बनाए?
जो उसे वहां ले जाए,जहां वह जाना चाहती है.
वह सोचती है कितनी बडी़ है दुनिया!
कितने लोग हैं यहां?
सबकी मंज़िल अलग,सबकी सोच अलग.
सभी एक ही सड़क से गुज़रते हैं!
कितना तकलीफ़ देह होता होगा?
क्यों नहीं सभी बना लेते अपनी-अपनी सड़क?
सफ़र कितना आसान, कितना आनंददायक हो जाता?
वह तो अपनी सड़क ख़ुद बनाएगी
गिट्टी, रेत,सीमेंट इकट्ठा करना शुरू कर दिया उसने,
हंगामा मच गया
लड़की सड़क बना रही है!
अपनी सड़क!
भला!यह लड़कियों का काम है?
लड़कियों का काम सड़क पर चलना है
सड़क बनाना नहीं
सड़क तो मर्द बनाते हैं
फेको यह गिट्टी, यह मिट्टी, यह रेत
लड़की बनाएगी सड़क!
लड़की ख़डी़ है सड़क पर अब भी
सोच रही है कब बनेगी
उसकी
खु़द की सड़क
अपनी सड़क…

(सविता प्रथमेश)

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