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गंगा बहती हो क्यूँ ?  नदियों का वैतरणी बनना और लाशों के अधिकार का प्रश्न

आलेख : बादल सरोज

इन दिनों गंगा, यमुना, नर्मदा, केन, बेतवा सभी नदियों के वैतरणी नदी बन जाने की खबरें आ रही हैं। यहां ओड़िसा में कटक और बालासोर की सीमा पर बहने वाली वैतरणी की नहीं, हिन्दू धर्मशास्त्रों की वैतरणी नदी की बात हो रही है। यह यम की नदी है। यह नर्कलोक के रास्ते में पड़ने वाली नदी है, जो कोई 400 किलोमीटर (100 योजन) की गर्म पानी, रक्त से लाल हुइ, माँस-मज्जा, हड्डियों, मल-मूत्र और अपार गन्दगी से भरी अत्यंत बदबूदार नदी है।

गरुड़ पुराण के अनुसार जब मनुष्य मरते हैं, तो वे इसी नदी में गिरते हैं फिर…..फिर पर इसलिए नहीं कि फिलहाल नरक की ट्रेवलिंग एजेंसी एजेंडे पर नहीं है। एजेंडे पर है गंगा और बाकी नदियों के वैतरणी बन जाने और उनमें प्रवाहित होते शवों से उठे सवाल, मृत देह की सम्मानजनक अन्तिम क्रिया – डिग्नीफाईड फ्यूनरल/बरियल – के अधिकार के सवाल।

नदियों का वैतरणी बनना और लाशों के अधिकार का प्रश्न

अभी पिछले साल ही एक मृत देह के अंतिम संस्कार को लेकर भक्तों की एक किस्म के प्रपंच को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था और अपने फैसले में कहा था कि “भारतीय संविधान की धारा 21 के दायरे और परिधि (स्कोप एंड एम्बिट) में सम्मानजनक अंतिम संस्कार भी आता है।”

सम्मानजनक अंतिम संस्कार को लेकर दायर एक याचिका में 2007 में सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले में 1989 के अपने ही निर्णय (रामशरण औत्यनुप्रासी विरुध्द भारत सरकार) को दोहराते हुए इसे और अधिक विस्तार से साफ़ कर चुका था। उसने कहा कि “आज के विस्तृत फलक में मनुष्य के जीवन के दायरे में उसकी जीवन शैली, संस्कृति और विरासत की हिफाजत भी आती है।” धारा 21 की समझदारी विस्तृत हो जाती है।

पंडित परमानंद कटारा विरुध्द भारत सरकार (1995) प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “धारा 21 में वर्णित सम्मान जनक जीवन और उचित बर्ताब सिर्फ जीवित मनुष्यों तक के लिए नहीं है, मरने के बाद उनके मृत शरीर के लिए भी है।”

आश्रय अधिकार अभियान विरुध्द भारत सरकार (2002) में दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “बेघर मृतकों को भी उनकी धार्मिक मान्यता के अनुसार सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अधिकार है और राज्य का कर्तव्य है कि वह उसे सुनिश्चित करे।”

ध्यान रहे कि भारत के संविधान की धारा 21 भारतीय नागरिकों के मूल अधिकारों में आती है। ये वे बुनियादी अधिकार हैं, जिन्हे सुनिश्चित कराना सरकारों का काम है वे इसी के लिए चुनी जाती हैं। अगर वे इन्हे सुनिश्चित नहीं कर सकतीं, तो उन्हें सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

लाशें और दुनिया

दुनिया में मरने के बाद शव की दुर्गति न होने देने और उसका कफ़न-दफ़न ढंग-ढौर से करने के रीति-रिवाज जब से समाज सभ्य हुआ है, तब से चले आए हैं।

इतने पीछे न भी जाएँ, तो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुए सारी संधियों, अंतर्राष्ट्रीय सहमति से बनी नियमावलियों और  समझौतों का यह प्रमुख विषय रहा है। जैसे :

  •  जेनेवा कन्वेंशन (1949) में युद्धरत राष्ट्रों के लिए बनाए गए नियमों में संकल्प 16 में तय किया गया कि “युद्धरत राष्ट्र मारे गए सैनिकों/लोगों की मृत देहों के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार को रोकने के कदम उठाएंगे।
  • संयुक्त राष्ट्रसंघ (यूएनओ) का मानवाधिकार आयोग 2005 के अपने प्रस्ताव में कह चुका है कि मानव देहों के साथ सम्मानजनक बर्ताब, उनके परिजनों की इच्छा के अनुरूप उनके संस्कार का प्रबंध राष्ट्रों की जिम्मेदारी है।

गंगा, यमुना, नर्मदा, बेतवा, केन और बाकी नदियों में बहती भारत के नागरिकों की लाशें क़ानून के राज को चलाने में मौजूदा हुक्मरानों की विफलता की जीती-जागती बदबूदार मिसाल ही नहीं हैं, बल्कि उन्हें लेकर हुक्मरानों के विचार गिरोह का प्रचार, उनका मखौल उड़ाना, इन बहती देहों के बीच “पॉजिटिविटी अनलिमिटेड” का उत्सव और जश्न मनाना, इन कुटुम्बियों के अंदर मानवता के पूरी तरह मर जाने का भी उदाहरण है।

लाशें बिना बोले ही बोल रही हैं। वे ऐसे ही बोलती हैं, जैसे बोलना चाहिए। वैसे बोलने का जिम्मा जीवित बचे लोगो का होता है। अग्रज कवि विष्णु नागर ने आज इन लाशों की कही और बाकियो की अनकही को दर्ज किया है :

1

सवाल करो, सवाल, जिंदा मुर्दों

तुमसे तो मैं ही अच्छा

पहले गंगा में बहती मेरी लाश ने सवाल किया

फिर उस सवाल को मुझे नोंच खाते कुत्तों ने तीखा किया

तुमसे तो मैं ही अच्छा

जो यह कहने के लिए नहीं बचा

कि जिंदा मुर्दों तुमसे तो ये कुत्ते ही अच्छे

जो बिना भौंके, चुपचाप खाते हुए भी सवाल उठाते रहे

मैंने मर कर जो सीखा

तुम जीते जी क्यों नहीं सीख लेते

क्योंकि हरेक लाश को सवाल करने का

मौका भी नहीं मिलता।

2.

मुर्दों के सवाल हवा में तैरते हैं

जिंदा लोगों के जवाब सूखे पत्तों की तरह

बिखरते जाते हैं।

 

बोलना जिंदा होने की अनिवार्य पहचान है। हमारे मित्र कवि-कथाकार उदय प्रकाश इसे अलग अंदाज में कह चुके है ;

आदमी

मरने के बाद

कुछ नहीं सोचता.

आदमी

मरने के बाद

कुछ नहीं बोलता.

कुछ नहीं सोचने

और कुछ नहीं बोलने पर

आदमी

मर जाता है।

उदय प्रकाश की इन पंक्तियों में आदमी के साथ औरत भी जोड़ लें और आईने में निहार कर पुष्टि कर लें कि हम सब जीवित हैं या कार्पोरेटी हिंदुत्व के यम और उनके भैंसों की वैतरणी में तैरती लाशें हैं।

(लेखक हिन्दी पाक्षिक ‘लोकजतन’ के संपादक तथा अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं)

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