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कांग्रेसी नेता की दादागिरी आरक्षक को दी गालियाँ कहा वर्दी उतरवा दूंगा

कांग्रेसी नेता की दादागिरी आरक्षक को दी गालियाँ कहा वर्दी उतरवा दूंगा

बिलासपुर। मोती थारवानी जैसे उजड्ड नेताओं की हरकतें गाहे बगाहे इस बात की बानगी पेश कर ही देती हैं कि सत्ता का असली चेहरा कितना क्रूर है।

बीते कल शहर की मुख्य सड़क पर रेलवे परिक्षेत्र ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मोती थारवानी ने ट्रैफ़िक पुलिस के एक आरक्षक को माँ बहन की गालियाँ दीं, उसका मोबाइल फोन छीन लिया और उसकी वर्दी उतरवा देने की धमकी दी।

शहर में कांग्रेस से जुड़े कुछ लोगों ने बताया कि ये उजड्ड नेता जिसका नाम मोती थारवानी है, विधायक शैलेश पाण्डे का करीबी है, खैर कौन किसका करीबी है ये अलग बात है, सोचने की बात तो ये है कि किसी भी नेता के अंदर इतना दुस्साहस आख़िर आ कैसे जाता है कि वो किसी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करने में हिचकता नहीं है।

ग़लती कांग्रेस नेता मोती थारवानी की ही थी। वो रॉंग साइड से आ रहा था वहां ड्यूटी पर तैनात आरक्षक राजकुमार रजक ने उसे रॉंग साइड से न चलने की बात कही इस पर विधायक के करीबी मोती थारवानी के अहंकार को ऐसी ठोकर लगी कि वो गाली गलौच पर उतर आया। वो तो वीडियो बन गया और सोशल मीडिया में चल गया तो नेता जी की करतूत सामने आ गई वरना इस मामले में तो आरक्षक की ही मुसीबत हो जानी थी।

अपनी पार्टी की सरकार हो तो नेता चाहे जितनी भी और जैसी भी नंगई कर सकता है, ये अघोषित लीवरेज नेताओं ने ले रखी है।

रायपुर में एजाज ढेबर के भतीजे शोएब ढेबर ने भी पिछले दिनों पुलिस के एक जवान को खुलेआम सस्पेंड करवा देने की धमकी दी थी।

ट्रैफ़िक DSP ललिता मेहर ने इस घटना इस घटना पर अफ़सोस व्यक्त करते हुए लिखा है कि “श्रीकांत वर्मा मार्ग के पास यातायात पुलिस आरक्षक के द्वारा ग़लत दिशा में गाड़ी चलाने वाले को रोका गया तो वाहन चालक के द्वारा यातायात नियम का पालन करने के बजाय आरक्षक से अभद्रता पूर्ण व्यवहार किया गया एवं उसे अपने राजनीतिक पद का धौंस दिखाया गया और नौकरी से सस्पेंड करने, जान से मारने की धमकी दी गयी, धक्का मुक्की की गई, जो पूर्णतः अवैधानिक एवं निंदनीय था, जिस पर वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा संज्ञान में लिया गया और उक्त वाहन चालक के विरुद्ध धारा 186, 353, 332, 294, 506 IPC के तहत अपराध पंजीबद्ध कर लिया गया है।”

मीडिया रिपोर्ट्सके मुताबिक पुलिस आरोपी  नेता को गिरफ़्तार करने गई थी लेकिन वो पहले ही फ़रार हो चुका था।

पुलिस को इस बात का भी उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए कि पिड़ीत आरक्षक पर की नौकरी पर आँच न आए, उसपर किसी तरह का दबाव न बनाया जाए और उसकी सुरक्षा की भी व्यवस्था की जाए।

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