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भिलाई: बारिश के मौसम में कोरोना महामारी के बीच मजदूरों की 30 साल पुरानी बस्ती तोड़ने की तैयारी

भिलाई। छत्तीसगढ़ की उद्योग नगरी कहे जाने वाले भिलाई शहर के बिजली नगर इलाके में हथखोज नाम की मजदूरों की एक छोटी बस्ती है। बस्ती लगभग तीन दशक पुरानी है। 30 परिवारों की इस बस्ती में लगभग 100 लोग रहते हैं जिनमें 50 बच्चे भी शामिल हैं।

इस बस्ती को “अवैध” का संबोधन देकर अब छत्तीसगढ़ की सरकार इसे तोड़ने की तैयारी कर रही है। पुनर्वास की कोई भी व्यवस्था किए बिना ही बीती 17 जुलाई को प्रशासन के बुल्डोजर ने बस्ती में चल रही लगभग 10 छोटी दुकानों को तोड़ दिया और एक हफ़्ते के भीतर सभी घरों को तोड़ने की बात कही।

बस्ती “अवैध” है क्योंकि मजदूरों की है

हथखोज बस्ती के घर मजदूरों ने कई दशकों में अपनी मेहनत से, ईमानदारी की पाई पाई जोड़कर बनाए हैं। इन घरों में बिजली और पानी के “वैध” कनेक्शन लगे हैं जिनके बिल का भुगतान भी “वैध” तरीके से किया जाता है। बस्ती के घरों के संपत्ति कर का भी “वैध” तरीके से भुगतान यहां के लोग  करते हैं। लेकिन फिर भी सरकार की नज़र में ये बस्ती “अवैध” है। शायद इसलिए क्योंकि ये फैक्ट्रियों में काम करने वाले गरीब मजदूरों की बस्ती है। यही अगर किसी बिल्डर की बनाई कॉलोनी होती तो तमाम घपलों के बावजूद भी “अवैध” नहीं कही जाती और सरकारी बुल्डोजर तो उसके आसपास भी नहीं फटकता।

सत्ता की नजर में मजदूरों की बस्तियां हमेशा ही अवैध क्यों होती हैं ?

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बरसात भी और कोरोना भी

छत्तीसगढ़ की सरकार मानवीय पहलुओं पर लगातार गिरावट की ओर जाती लग रही है। इस समय पूरे देश में कोरोना महामारी का प्रकोप है जिसके चलते अर्थव्यवस्था धीमी पड़ गई है, जीने खाने जितना धन जुटाना भी मुश्किल है ऐसे समय में मजदूरों से उनका घर छीन लेना उनके लिए कितनी बड़ी त्रासदी होगी ये साधारण सी बात अगर हमारी  सरकारें नहीं समझ पा रही हैं तो देश की आवाम के लिए ये बहुत खतरनाक बात है।

भिलाई की इस मजदूर बस्ती को इस बरसात के मौसम में न तोड़ने और अन्य मांगों के साथ National Alliance of People’s Movements (NAPM) ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ख़त भी लिखा है।  

NAPM ने लिखा है कि जिस ज़मीन पर यह बस्ती है वह छत्तीसगढ़ शासन के वाणिज्य एवं उद्योग विभाग की है, जो कि इस ज़मीन पर नई औद्योगिक इकाइयाँ शुरू करना चाहता है। इन श्रमिकों को कोई वैकल्पिक आवास नहीं दिया गया है और उनके पुनर्वास के लिए भी कोई प्रावधान नहीं किया गया है। यहाँ के निवासियों ने न केवल बिजली, पानी, आदि सारी उपयोगिताओं के बिलों का नियमित रूप से भुगतान किया है बल्कि वे अपने घरों की ज़मीन का संपत्ति कर भी देते आ रहे हैं। इसके बावजूद, 17 जुलाई 2020 को बुल्डोज़र आए और बस्ती को ढहाना शुरू कर दिया और लोगों को सामान समेटने का मौका भी नहीं दिया गया।

भिलाई औद्योगिक क्षेत्र में कई ऐसी मज़दूर बस्तियां हैं, क्योंकि श्रमिकों के रहने के लिए  औद्योगिक क्षेत्र के अधिकतर हिस्सों में कभी कोई प्रावधान किए ही नहीं गए। जब भिलाई औद्योगिक क्षेत्र के निर्माण के लिए दशकों पहले भूमि का अधिग्रहण किया गया था, तो स्वच्छ और विशाल श्रम शिविरों और श्रमिक कॉलोनियों में औद्योगिक श्रमिकों के आवास के लिए कई वादे किए गए थे लेकिन ये वाडे कभी पूरे नहीं किए गए। 

अधिग्रहित की गई भूमि केवल औद्योगिक इकाइयों को आवंटित की गई, जिसमें श्रमिकों और उनके परिवारों के आवास के बारे में कोई विचार नहीं किया गया। अब, जब श्रमिकों ने अपने घरों और कॉलोनियों को बनाने के लिए कड़ी मेहनत की है, उन्हें एक महामारी और एक धीमी अर्थव्यवस्था के बीच में अपने ही घरों से बाहर खदेड़ा जा रहा है। इस सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के दौरान श्रमिकों की घरों से बेदखली, मजदूरों और उनके परिवारों के लिए विनाशकारी साबित होगी, और उन्हे कोविड-19 महामारी का शिकार बनाएगी।

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मजदूरों के लिए NAPM की मांग

1. हाथखोज के बिजली नगर क्षेत्र में घरों और अन्य प्रतिष्ठानों को दहाने के कार्य को तत्काल रोका जाए।
2. बिजली नगर के निवासियों को वैकल्पिक आवास में बसाया जाए, उनके कार्य स्थलों के करीब, स्कूलों और अस्पतालों तक पहुंच के साथ।
3. बारिश के मौसम की अवधि एवं कोविड़ के दौरान किसी को भी जबरन नहीं हटाया जाए|
4. जिन घरों/दुकानों/इमारतों को तोड़ दिया गया है उनके मालिकों को पर्याप्त मुआवजा दिया जाए।

भिलाई की हथखोज बस्ती ऐसी पहली जगह नहीं है जहां से गरीबों को बेघर किया जा रहा हो। अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में भी सैकड़ों गरीबों को बरसात के ही मौसम में कोविड के ख़तरों के बीच ही बेघर कर दिया गया था।

छत्तीसगढ़ के तमाम मजदूर संगठनों ने इस पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से निवेदन किया है कि वे मजदूरों के अधिकारों का सम्मान करते हुए, संवेदनशील कार्यवाही करेंगे। 

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