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ज्योति देशमुख की 5 कविताएँ —दस्तक के लिए अमिताभ मिश्र

दोस्तों आज हम समूह की रचनाकार ज्योति देशमुख की कविताओं को पढें और इन पर बात करें।

ज्योति देशमुख की कविताएँ

दस्तक के लिए अमिताभ मिश्र

1.
गौरी लंकेश तुम्हारी हत्या की खबर से
दिल दहल गया
बहुत देर तक सोचती रही
कैसे समय में जी रहे है हम
कैसे समाज का हिस्सा है
जहाँ सच बोलना गुनाह है
अधिकार नहीं सच बोलने वाले को जीने का
शहरों कस्बों में
हो रही है
बैठके गोष्ठियां शोक सभाएं
तो हम कैसे पीछे रहते
हमे भी लगा है उतना ही गहरा आघात
तो झट से एक मेसेज टाइप किया
और सेंड कर दिया अपने ग्रुप में
समय शाम चार बजे
वहीँ उसी कम्युनिटी हॉल में
फिर निकाली अलमारी से
सफ़ेद पर गुलाबी बूटों वाली शिफोन की साड़ी
और भिजवा दी रोल प्रेस के लिए
कि ऐसे ओकेशन पर
कांजीवरम, बनारसी, मैसूर सिल्क
सूट नहीं करती
ब्यूटिशियन से टाइम लेकर उसे ओकेशन बताया
और मैचिंग सैंडल निकाल कर रखी
हमेशा की तरह करीब-करीब सभी
पांच बजे तक पहुँच गए
और तुम्हारे बारे में चर्चा शुरू हुई
लगता था आज कोई क्रांति हो कर रहगी
कितना दुःख
कितना संताप था सबके शब्दों में
और कितनी जानकारी तुम्हारे बारे में
छ: बजे सभा के औपचारिक समापन के बाद
पुरुष और स्त्रियाँ अलग अलग गुटों में बट
हो गए मशगूल अपनी बातों में
और थोड़ी ही देर बाद
जैसा कि करते है पुरुष
रवाना हो गए
सब के सब शहर से बाहर
एक ढाबे की ओर
अब हम स्त्रियाँ तो पुरुषों की तरह
किसी ढाबे में खाट पर बैठ
सिगरेट फूकते
चखने के साथ घूंट-घूंट कर गिलास खाली करते
मुर्गे की टांग नहीं चबा सकती
सो हम सब निकल गई शौपिंग करने
और देखो न मैंने बिलकुल वैसा ही टॉप ख़रीदा
जैसा तुमने उस फोटो में पहना है
जो इन दिनों बहुत वायरल है पब्लिक मीडिया में

2

संभल कर रहना उन लोगों से
जिनके हांथों में नहीं
ज़ेहन में बंदूके होती है
वे जानते है थमाना
बंदूकें उन हांथों में
जिनमे रोटी नहीं होती
आँखों में रोटी का ख्वाब होता है
संभल कर रहना उनसे
जिनके रगों में नहीं
इरादों में लहू बहता है
वे जानते है बहाना लहू की नदी
भरे शहर में
अपना गला तर करने के लिए
संभल कर रहना उनसे
जो कहते है तुम्हे दोस्त
और लगाते है बेवजह गले
इन्हें हासिल है काबिलियत
पीठ में
अदृश्य खंजर
घोपने की

3
कहते है
हजारों में से कोई एक स्पर्म होता है
जो जीतता है जिन्दगी की रेस
और मिलाता है उसे सौभाग्य
मनुष्य योनि में धरती पर जन्म लेने का
लेकिन अब
हजारों में से एक भी स्पर्म
नहीं जीतना चाहता वो पहली रेस
कि पता है उसे
इस धरती पर पहले से ही
फन फैलाये बैठे है हम
जो ज्यादा दूर तक नहीं जाने देंगे उसे
और फिर भी जोर मारा उसने
तो तैयार कर रखा है
दोज़ख उसके लिए
यहीं इसी ज़मीं पर

3

चालीस पार स्त्री
नहीं साबित होती अच्छी प्रेमिका
कि उसकी आँखों में नहीं होती है
किसी और के सपनों के लिए जगह
चालीस बसंत औरों के सपनों में सुर्ख रंग और नमक भरने वाली
बचे हुए दशक में तराश कर देना चाहती है
आकार अपने सपनों को
स्टोर रूम में पड़े
गर्त की चालीस परतों में दबे सपनों को निकाल
झाड़-पोछ कर रखती है ड्राइंग रूम में
उत्साह से लबरेज़
जीवन का आखरी अध्याय अपनी भाषा अपने तरीके से लिखने को
अपनी जिम्मेदारियों को करीब-करीब कर चुकी पूरा
नहीं है उसे जल्दी घर पहुँचने की
वो बिताना चाहती है एक पूरा दिन
स्पा या पार्लर में मसाज कराते
किसी और को आकर्षित करने के लिए नहीं
खुद को मोहित करने के लिए
चाहती है बनना-सवरना
बिना बिंदी मंगलसूत्र के
देखती है खुद को आईने में
और हो जाती है खुद पर लट्टू
सोती है देर तक रविवार को
और दोपहर में मोबाइल साइलेंट पर कर
औंधे लेट पढ़ती है कोई रोमांटिक नावेल
बिताती है खुद के साथ
खुद के लिए पूरा एक दिन
अब नहीं है उसके पास समय न ही शौक
कि किसी पुराने या नए प्रेमी के हाथों में हाथ डाले
घूमें किसी बगीचे में
पिए कॉफ़ी बतियाते हुए किसी कॉफ़ी हाउस में
या जाये देखने कोई फिल्म
लेकिन चूँकि अब
जब वो लुटा चुकी है
अपने तमाम प्राथमिक रंग
औरों के सपने रंगने में
उसके पैलेट में बचे है
कुछ सूखे कुछ बदरंग से रंग
सो
हो यदि किसी में इतनी सकत
कि वो अपने रंग दे सके उसे
उसके सपने पुरे करने को
तो मुश्किल नहीं उसका प्रेमी हो जाना भी

4
अब्बू ने नहीं भेजा था मुझे स्कूल
कि स्कूल जा कर बिगड़ जाती है लड़कियां
जैसे सायमा बिगड़ गई
कहती थी इश्क हो गया है उसे
उससे दो दर्ज़ा उपर पढ़ने वाले लडके से
जब पकड़ा गया था
उसकी अंग्रेजी की किताब से ख़त
बंद हो गया उसका कहीं भी जाना
फिर नहीं आती थी वो सिफारा पढ़ने भी
मगर सुना था कि
कांपती थी उसकी टाँगे
पथराई आँखों से जाने क्या तांका करती
लरज़ते होंठों से
बडबडाया करती
और आज बरसों बाद
याद आई सायमा
जब वोही सवाल मुझसे पूछा गया
फर्क बस इतना उसके अब्बू ने पुछा
मेरे खाविंद ने
बौराई सी रहती
किसी और के इश्क में उलझी मै
छिटक के हाथ से गिर जाती पतीली
जब आ जाते है वो
बेसमय घर
नज़रे चुराती घबराती
कांपते हाथों से लाती
पहले चाय फिर पानी
बेतहाशा धड़कते दिल की आवाज़ दबाने को
हंसती जोर से
करती बेवजह बाते
पर्दा ठीक करने के बहाने
झांकती कभी खिड़की कभी दरवाज़े से
उलटती-पलटती अख़बार
कनखियों से पढ़ती उनके चहरे के उतार-चढाव
बेखयाली में सुन नहीं पाती कही हुई बात
अपने ही ज़ेहन में उठते सवालों के देती जवाब
बिना पूछे बताती उस गली का नाम
जहाँ कभी गई ही नहीं
उस शख्स का नाम
जिसे सुनने वाला जानता तक नहीं
छोड़ देती जवाबों के बदले एक सवाल
जिसे पूछे जाने पर
पैर के अंगूठे से
नज़रे झुकाए कुरेदती फर्श
शरीर पर हरे-नीले चकते लिए
आँखों में सुर्ख डोरे लिए
ठूस अपना दुपट्टा मुह में
बंद रखती हूँ अपनी जुबां
दीन-दुनिया के कशमकश में उलझी
कभी भी चुन नहीं पाती किसी एक को

 

5

वो सोचती है लिखूंगी कविता
घर जाकर फुर्सत से
अपनी अफसरी के रुतबे पर
जिसके आगे झुकता है तमाम महकमा
या अपने सुरों के उतर-चढाव पर
जिसपर झूमते श्रोता करते है वाह वाह
या कॉलेज में लेक्चर के दौरान
डिस्टर्ब कर रहे छात्र को लताड़ने पर
या बैंक में अपनी कुर्सी छोड़
किसी बुज़ुर्ग की मदद करने पर
या 104 सेटेलाइट लोंच करने के
रोमांचित कर देने वाले अनुभव पर
लेकिन घर पहुँचने पर
कमबख्त ये आटा नून तेल पीछा ही नहीं छोड़ता

****

*दस्तक के लिए अमिताभ मिश्र*

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