कला साहित्य एवं संस्कृति

मिथकों को मुक्ति का हथियार तो बनाएं लेकिन उसको इतिहास न बनाएं या समझें.- नन्द कश्यप

** नंद कश्यप

अब तो सारे विश्लेषक कह रहे, मोदी सरकार के तीन साल देश के जरूरतमंदों, बेरोजगारों, किसानों और असंगठित मजदूरों , कुटीर शिल्प आधारित उद्योग छोटे व्यापारियों,लघु एवं मध्यम उद्योग के लिए विनाशकारी रहा है,कोई फला फूला है तो वो विदेशों से सूचना प्रौद्योगिकी लाकर देश में बेचने वाले और प्राकृतिक संसाधनों जल जंगल जमीन खनिज कच्चा तेल की सरकारी संरक्षण में लूट करने वाले , आगे जो करना है वह लोकतांत्रिक तरीके से इन्हें खदेड़ना है, दलीय प्रतिबद्धताओं को सम्मान देते हुए भी खदेड़ने के लिए व्यापक एकता बनाई जा सकती है,बस एक मानवीय प्रतिबद्धता जरूरी है वह कि ये वापस आए तो देश टुकड़े टुकड़े होकर बर्बाद हो जाएगा,
और कारपोरेट फासिस्ट गठजोड़ ने जनता को विभिन्न तरीकों से विभाजित करने का खेल शुरू कर दिया है, उन्हें पता है कि विभाजित वोटरों के बीच यदि भाजपा पिछले चुनाव (31% वोट) से बहुत कम 22\ 23*% वोट भी पा जाती है तो सहयोगियों की मदद से खुद का बहुमत ले आएगी,सारे देश में कारपोरेट फंडेड मिथकीय चरित्रों के आधार पर छोटी छोटी पहचान बना कर पूर्व मध्यकालीन क़बीलाई संस्कृति को खड़े करने की कोशिश हो रही है, कारपोरेट का यह प्रयोग अफगानिस्तान ईरान ईराक सहित पश्चिम एशिया के देशों में सफल रही है, आज दुनिया के प्राचीनतम सभ्यताओं वाले साधन-संपन्न ये देश इस्लामिक होते हुए भी क़बीलाई गृह युद्ध में बर्बाद हैं, खुद आपस में एक दूसरे को मार रहे और साम्राज्यवादियों को अपने पर हमला करने बुला रहे हैं, नतीजा इन देशों की करोड़ों जनता शरणार्थी बन भटक  रहेे है.

हमारे देश में लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत हैं, हमारे पास बुद्ध का प्रबोधन है तो गांधी की विरासत , लेकिन आरएसएस भाजपा इन्हीं पर हमले कर रहे, हमारी सर्वसमावेशी धर्मनिरपेक्ष बहुभाषी बहुसांस्कृतिक परंपराओं की जगह फासीवादी एकाधिकार वादी कट्टर नस्लवादी हिंदुत्व को थोप रहे,
वो तमाम सताई हुई पीड़ित समूहों के लिए कुछ मिथक उनकी पहचान और मुक्ति के ,शोषक परंपराओं के समानांतर खुद को फौरी तौर पर भले ही स्थापित करते हों,यदि आज के दौर की वैज्ञानिक चेतना से दूर रहेंगे तो अंततः आरएसएस की गोद में पहुंचेंगे, इसलिए मिथकों को मुक्ति का हथियार तो बनाएं लेकिन उसको इतिहास न बनाएं या समझें.

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