कला साहित्य एवं संस्कृति

ईश्वर का बहिष्कार __राधामोहन गोकुलजी- अंतिम भाग *

माधुरी’ नवम्बर 1925 से फ़रवरी 1926 तक

*ये व्याख्यान ahwanmag.com से लिया है।*
*दस्तक के लिए अमिताभ मिश्र*

संभवतः वह १९७७ का वर्ष होगा जब भगतसिंह का नास्तिक वाला निबंध पढ़ा और उन दिनों इसके बारे में सुमन जी (शिवमंगल सिंह सुमन) से इसके बारे में बताया तो उन्होंने माधुरी के वे अंक पढ़ने को दिए थे जिनमें ये व्याख्यान छपे थे। और ये कहा इन्हें जरूर पढ़ो। तो ये व्याख्यान तब पढ़े थे इस पर देवताले जी से भी बात हुई थी फिर उन्होंने भी उसे फिर से पढ़ा था। लगा कि इन्हें साझा किया जाना चाहिए. बाद में यह व्याख्यान पूरा ahwanmag.com में मिला. यह पहले से तय था कि इस बारे में समापन अंश में बताया जाए।

तो दोस्तों यह चौथा और आखिरी हिस्सा पढ़ें जरूर और पूरे निबंध के आलोक में बात करें.

*ईश्वर का बहिष्कार*

  1. m

राधामोहन गोकुलजी राष्‍ट्रीय जागरण काल की वह विभूति थे जिनमें यूरोपीय पुनर्जागरण काल के महामानवों वाली विचारों और कर्म की एकता थी। उनमें वाल्‍तेयर, दिदेरो, और रूसो जैसे फ्रांसीसी प्रबोधनकालीन दार्शनिकों की तार्किक प्रखरता थी और बेलिंस्‍की, हर्जन, चेर्नीशेव्‍स्‍की और दोब्रोल्‍यूबोब जैसे 19वीं सदी के रूसी क्रान्तिकारी जनवादी चिन्‍तकों वाली जुझारू भौतिकवादी दृष्टि और साहसिकता भी। 19वीं सदी के अन्‍त में उन्‍होंने जाति प्रथा और रूढ़ि‍यों का विरोध किया था। 20वीं सदी के उत्‍तरार्द्ध में उन्‍होंने स्त्रियों की मुक्ति और लैंगिक समानता के बारे में जितने उग्र और वैज्ञानिक विचार अभिव्‍यक्‍त किये थे, उनका आज भी अभाव मिलता है। 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध में वे नास्तिकता और तार्किकता के उत्‍कट प्रचारक के रूप में जाने जाते थे। सोवियत क्रान्ति के समय तक वे मार्क्‍सवाद की ओर मुड़ चुके थे। वे भारत में समाजवाद के प्रचारकों की पहली पीढ़ी के सदस्‍य थे। इस तथ्‍य को कम ही लोग जानते हैं कि महाकवि निराला गोकुलजी को गुरूतुल्‍य मानते थे। प्रेमचन्‍द ने उन्‍हें आधुनिक युग के चार्वाक की संज्ञा दी थी। 20वीं सदी के प्रारम्भिक तीन दशकों के सभी साहित्‍यकार और पत्रकार उन्‍हें आदरणीय मानते थे। भगतसिंह, शिव वर्मा और एच.एस.आर.ए. के कई क्रान्तिकारियों को वैज्ञानिक समाजवाद की दिशा में मोड़ने में भी गोकुलजी का योगदान था। इस महान व्‍यक्तित्‍व का ये लेख ‘माधुरी’ (सं _. प्रेमचन्‍द) में सन 1925-26 में प्रकाशित हुआ था।

राहुल फाउण्‍डेशन, लखनऊ द्वारा ये लेख और गोकुल जी की कई अन्‍य पुस्‍तकें प्रकाशित हुई हैं।
*आज के लिए चौथा और अंतिम हिस्सा प्रस्तुत है*

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संसार में जितने धर्म-ग्रंथ हैं, सबमें श्रेष्ठ और सुपाठ्य प्रकृति है। इस ग्रंथ के किसी-किसी सूत्र के व्याख्याकार भी हुए हैं। उन्हें भी हम चाहें तो सहायता लेने के विचार से पढ़ें। कितने ही गणितज्ञ, भूगोल-खगोल वेत्ता, नई-नई खोज और आविष्कारों के कर्ता पण्ति हुए हैं। इन्ही के निश्चित सार्वभौम निर्दोष प्राकृतिक नियमों के मानने से हमारी स्वाधीनता, स्वतंत्रता तथा मनुष्यता स्थिर रह सकती है। इसके विरूद्ध जितने नियम हैं, वे सब तिरस्कार के साथ ठुकरा देने योग्य हैं। इन प्राकृत नियमों को जहाँ हमने एक बार समझ कर मान लिया, फि़र हमारा मार्ग सीधा, सरल और निष्कंटक हो जायगा। संसार में साधारण जनता से लेकर बड़े-बड़े पण्डित तक सभी इसके विरूद्ध मुँह खोलने में असमर्थ हैं। कौन-सा ऐसा धर्म-याजक, जगद्गुरु, महात्मा, पैगम्बर, अवतार, दर्शनकार इस संसार में है, जो गणितशास्त्र-सिद्ध सिद्धान्तों का विरोध करने का साहस करेगा। पगलखाने के बाहर मैं समझता हूँ, कोई बड़े से बड़ा धर्मान्ध भी ऐसा न मिलेगा, जो एक-एक दो होते हैं, इन बात से इंकार करे। आग जलती है, पानी जलती हुई आग को बुझा देता है, इसे कौन न मानेगा, जब तक कि कोई प्राकृतिक नियम इसके अन्दर दूसरी क्रिया न करता हो। साधारण जनता भी अपनी प्राकृतिक सहज बुद्धि से काम लेती है। वह नित्य प्रति निसर्ग के नियमों को देखती है और एक सीमा तक जानती तथा मानती है। यदि उसे बहके हुए पथ से हटाकर नैसर्गिक नियमों पर ही दृढ़ रखने का थोड़ा सा प्रयत्न किया जाय, तो निःसन्देह सत्य प्रकृति की उपासना अथवा असत्स ईश्वर के त्याग से बड़ा कल्याण हो। हमें उचित है कि हम विज्ञान की शरण लें और धर्म-ग्रन्थों को एक साथ नदी में बहाकर सदा के लिए निश्चिन्त हो बैठें। महात्मा कार्ल मार्क्स ने ठीक ही कहा कि Religion is opium of the people. – अर्थात् धर्म मनुष्य जाति की अफ़ीम है। एक बार जिसे अफ़ीम का चस्का लग गया, वह फि़र इस घातक विष के फ़न्दे से निकल नहीं सकता। यदि कोई हजार में एक आध निकल जाय तो बड़ा ही चतुर, दूरदर्शी, बहादुर या साधारण परिभाषा में अत्यन्त भाग्यशाली है। किसी-किसी धर्म रूपी अफ़ीम का नशा तो इतना गहरा और बेहोश करनेवाला होता है कि लोग अपनी जन्मभूमि, अपने बाप-दादों के रज-वीर्य और अपने अस्तित्व को भी भूल जाते हैं। उदाहरण के लिए हम मुसलमान धर्म को ही लेते हैं। भारत को गुलाम, भूख मरते, अर्द्ध जाति वाले मुसलमान अर्थात् नवमुसलिम अपनी पिनक में आकर कहने लगते हैं कि इस्लाम धरती की किसी सीमा से आबद्ध नहीं हैं। ‘मुस्लिम हैं, हम वतन है, सारा जहाँ हमारा।’

हम इन मुसलमानों से पूछते हैं कि आप हिजरत कर गए थे, तब आपको मुस्लिम दुनिया ने यथेष्ट प्यार क्यों न किया, रहने को स्थान क्यों न दिया? आपका वतन सारा जहान था तो आप क्यों मुँह की खाकर लौट आये? 1920 ई. में सारे हिन्दुस्तान के मुसलमान क्यों न अपने धर्म शास्त्र के अनुसार हिजरत कर गये? बात यह है कि फ़कीर टुकड़े को तरसता है, जिसके रहने के लिए एक कोठरी भी नहीं, वही मूर्ख सारी पृथ्वी को अपनी जागीर बताता है-

‘अवतार वतन कहते हैं सारा जहाँ हमारा ।’

हमारे मुसलमान धर्मावलम्बी भाइयों से इस पिनक ने माता के रज और पिता के वीर्य से भी इनकार करा दिया। काश्मीरी ब्राह्मण, खत्री और अन्याय हिन्दू अपने बाप-दादों को भूलकर खुरासानी खच्चर की तरह अपने बाप-दादों के बदले अरब के रज-वीर्य का दावीदार बनने लगता है। वह इतना पागल हो जाता है, उसे यह भी तमीज नहीं रहती कि धर्म दूसरी चीज़ है और नस्ल दूसरी; धर्म का ख़याली पुलाव और बात है और अपनी प्यारी मातृभूमि दूसरी। धर्म के नशे में चूर नशेबाज जिधर देखो यही पुकारता फि़रता है किः-

बररूय शश जेहत दरे आइनः बाज है।

यां इम्तियाज नाकिसो कामिल नहीं रहा।।

इसी बदबख़्त मज़हब के नशे के पागल अपनी उस धरती की महत्ता और पवित्रता को भूल जाते हैं, जिसमें उनकी अगणित पीढ़ियों की मिट्टी मिली हुई है और चोरों, उठाईगीरों, डकैतों की धरती को पवित्र मान बैठते हैं। इस तरह जिस धर्म के कारण मनुष्य मनुष्यता से गिर जाता है, उस धर्म, मज़हब या रिलीजन से कब किसी मनुष्य का कल्याण संभव है?

इस धर्म के नशे में डालकर ही पूँजीपति शासन श्रमिकों को लूटता-खसोटता ओैर पशुतुल्य दास बनाये रखता है। समस्त देशों के धर्म-याजक धर्मरूपी अफ़ीम के प्रचार के ठेकेदार हैं। इन्हें इस नशे से ग़रीबों को उन्मत्त रखने के लिए धन मिलता है। धर्म की व्यवस्था हमेशा धन से खरीदी जाती रही है और अब भी ख़रीदी जाती है। डायर और ओ-डायर की क्रूरताओं का पादरियों ने और मालाबार के मोपलाओं के राक्षसी कृत्यों का मौलानाओं ने समर्थन किया। यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो सब पापों की जड़ धर्म है। इसलिए धर्म, मज़हब और ईश्वर या अल्लाह को जितनी जल्दी भूमंडल से विदा किया जाय उतना ही अच्छा।

याद रहे संसार में सामाजिक समुन्नति कभी किसी अप्राकृत शक्ति या शक्तियों से नहीं हुई, न हो सकती है और न कभी होगी। इसके सिवा विद्वानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि ईश्वर, धर्म और अनैसर्गिक शक्तियों का भाव मानव जाति में उसकी एक अनुन्नत दशा में पैदा होता है। यह इतिहास-सिद्ध बात है, फि़र विकास होने पर एक ऐसी उन्नत दशा आ जाती है कि यह भाव परिवर्तित होते-होते विनष्ट हो जाता है। जैसे लड़कियाँ जवान होने पर गुड़ियों का खेल छोड़ देतीं हैं और फि़र पसन्द नहीं करतीं; छोटे-छोटे बच्चे जवान होने पर अपने बचपन के बहुतेरे विचारों ओैर बेहूदा खेलों को छोड़ देते हैं, वैसे ही मनुष्य जाति भी एक विशेष विकसित अवस्था के प्राप्त होने पर धर्म ओैर ईश्वर के निर्मूल झगड़ों को त्याग देती है। मनुष्य और प्रकृति के संघर्ष में किसी भी तीसरी वाह्य महाशक्ति का न अस्तित्व है, न ‘कुछ नहीं’ का कोई हस्तक्षेप हो सकता है। थोड़े से स्वार्थी लोग जनता को लूटकर अपना पेट और जेब भरने के लिए उसे धर्म के अँधेरे में डाल रखने का प्रयत्न किया करते हैं। इन असद्विचार वालों और लुटेरों से बचे रहना चतुर मनुष्यों का काम है।

हम कह  चुके हैं कि केवल मूर्ख ही अनहोनी घटनाओं के घटने का विश्वास कर सकते हैं। जितने धर्म हैं सब गप्प कथाओं के आधार पर रचे गये हैं। यदि मिथ्यावादियों की होड़ा-होड़ी का आनन्द देखना हो तो हमें चाहिए हम धर्म पुस्तकों को पढ़े और धर्म नामक छल से बचें।

सांसारिक कार्य करने के समय हम देखते हैं कि सभी नास्तिक होते हैं। क्या कोई मनुष्य रात दिन जो काम करता है उसमें प्रतिक्षण धर्म का विचार रखता है? रख ही नहीं सकता । यदि रखे तो संसार का कोई काम न चले। यही बड़ा भारी प्रमाण धर्म की अव्यावहारिकता और व्यर्थता को सिद्ध करने के लिए काफ़ी है।

ला प्लेस नामक एक फ्रांसीसी विद्वान ने विश्वक्रम-ज्ञान (System of the universe) को प्रकट करने के लिए एक पुस्तक लिखी। यह पुस्तक प्रथम नेपोलियन बोनापार्ट ने पढ़ी और लेखक से कहा‘आपकी इस पुस्तक में कहीं भी ईश्वर का नाम नहीं मिला।’ पण्डित ला प्लेस ने उत्तर दिया कि मुझे ऐसी कल्पना की कहीं भी आवश्यकता नहीं मालूम हूई। उसने अपनी पुस्तक में न तो कहीं दर्शनों से काम लिया, न किसी विश्व के रचयिता की कल्पना से, साथ ही उसने गणित का भी प्रयोग नहीं किया था। लेकिन बाद में गणितज्ञों ने इसके विचारों को गणित की कसौटी पर रखा तो सत्य ही सिद्ध हुआ। आजकल विज्ञान के जितने भी महत्वपूर्ण ग्रंथ देखे जाते हैं, कहीं भी उनमें ईश्वर की ज़रूरत नहीं दिखाई देती। बिना ईश्वर के माने ही सारी की सारी समस्याओं की मीमांसा हो जाती है। मानवीय ज्ञान में कहीं भी ईश्वर को स्थान नहीं मिलात। हमने जो कुछ ऊपर लिखा है, उससे प्रकट है कि मनुष्यों को स्वातंत्रय, साम्य और बन्धुत्व विनष्ट करने में धनपात्रों, पूँजीपतियों, जबरदस्तों, राजकर्मचारियों आदि काबूयाफ्ता लोगों का जितना हाथ है, उतना ही धर्म का भी है। धर्म अत्याचारियों को सहायता देता है, ग़रीबों तथा दुखियों को और भी अधिकतर ग़रीब और दुखी बनाता है। किसी समय योरोप में धर्म के नाम पर ऐसे अत्याचार हुए हैं कि उन्हें देखकर शैतान, जिसे धर्म के। माननेवालों ने इतना बुरा चित्रित किया है, यदि सचमुच होता तो लज्जा से सर झुका लेता। योरोप का धर्म इतिहास (History of the church) इसका साक्षी है। ‘इनक्वीज़ीशन’ के कानून ने क्या कुछ अत्याचार नहीं किया? यह कानून पुरोहित-राज पोप की तृष्णा-पूर्ति के लिए धर्म-विरोधी की खोज करके उसे प्रताड़ित करने के लिए बनाया गया था। बेचारे ‘मूर’ जैसे सज्जनों की हत्या का दायित्व धर्म या ईश्वर के ही सर पर है। ग्लेंको के हत्याकाण्ड में भी पापिष्ट ईश्वर और धर्म का ही हाथ था। धर्मानधता के नाश के साथ ही साथ पाश्चात्य देशों के अभ्युदय का इतिहास आरम्भ होता है और धर्म व ईश्वर के पतन से ही सोविएट सरकार के जन्म का सूत्रपात रूस में हुआ । इतनी ऐतिहासिक घटनाओं के होने पर भी जो धर्म के नशे के मतवाले हैं, उन्हें बुद्धिमान समझें या क्या? यह हमारी समझ में नहीं आता।

भारत में भी शैवों, शाक्तों, वैष्णवों की पारस्परिक कटाछनी का पता पुराणों से मिलता है। स्मार्तों, तांत्रिकों और श्रोत्रियों के बैर भाव का हाल हिन्दू मात्र अपने ग्रंथों को पढ़कर जान सकते हैं। मुसलमानों की पारस्परिक धार्मिक दलबन्दियों और झगड़ों का हाल जानना हो तो ‘असना अशरिया’ नामक पुस्तक को पढ़कर देखिये। यह पुस्तक फ़ारसी भाषा में भारत में भी मिल सकती है। संभवतः इसका उर्दू संस्करण भी मिलता होगा। इसमें बहत्तर फि़रकों के भेदों का वर्णन है।

बौधों और वैदिक धर्मावलम्बीय ईश्वरवादियों में जो झगड़े हुए वह भी हमसे छिपे नहीं हैं। शंकर स्वामी के शिष्यों ने बौद्धों के साथ जो ज़बरदस्तियाँ कीं उन्हें हम चाहें तो अच्छी तरह पुस्तकों को पढ़कर जान सकते हैं। जैनियों में श्वेताम्बरी दिगम्बरी, तेरह पंथी, स्थानकवासी और आत्मारामी प्रभृति संप्रदायों की मोर्चेबन्दी, झगड़े-लड़ाई हमारी आँखों के सामने है। यदि धर्म की कल्पना न होती हो इन सारे झगड़ों का भूमण्डल पर नामोनिशान न होता, न इतिहास के पृष्ठ इन अमानुषिक कृत्येां से गंदे होते। इन सबका दायित्व ईश्वर और धर्म को माननेवालेां पर ही है।

संसार की उत्पत्ति को धनपात्र, राज्याधिकारी और पुरोहित-मण्डल खूब बेदर्दी के साथ उड़ावेंगे, क्योंकि ईश्वर ने उन्हें दिया है। बिचवनिए दलाल, सटोरिए, छोटे व्यापारी बचे हुए को भोगने के लिए बने हैं। राज कर्मचारी और सैनिक मनमानी संपत्ति का विधवंस करेंगे। लेकिन जनसमूह को वही टुकड़ा और धक्का बदा है। इनके लिए  इनके ईश्वर का आदेश ही यह है कि निर्धन तो संसार में बने ही रहेंगे, तुम खाओ-पीओ, मज़े मारो। क्या हम लोग ऐसे ईश्वर की परवा करते पड़े रहेंगे? अब संसार के भुक्कड़ों की श्रेणी, ग़रीबों का नाम, ग़रीबों का दृश्य मिटाना होगा और इस काम के लिए ईश्वर को अद्धर्चन्द्र देकर निकालना अनिवार्य है। हमें अब पक्षपाती, निदर्य, कल्पित ईश्वर की ज़रूरत नहीं रही।

अब वह समय नहीं रहा कि मुसलमानों के बालक कुरान रटने में अपने जीवन का पवित्र और उत्तम अंश बरबाद कर डालें या ईसाई बालक इंजील की आयतों, गीतों, या भजनों में जीवन गँवावें। न अब दूसरे ही धर्मवाले अपने धर्म के नाम पर अच्छे काम करने के स्थान पर आँख बंद कर दकियानूसी रद्दी किताबों के मंत्र या आयत अगणित बार बड़बड़ावेंगे। संसार होश में आता जाता है ओैर पुरोहिती तथा कल्पित बेहूदगियों का अंत होने वाला है। अब महात्मा मसीह की यह अयौक्तिक शिक्षा कि ‘जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे उसे अपना दूसरा गाल भी फ़ेर दो’ संसार को धोखे में नहीं डाल सकती। हम देखते हैं कि गाय, भेड़, बकरी आदि सीधो प्राणियों को उनकी शान्तिप्रियता के कारण कोई नहीं छोड़ता। रोज़ बड़े-बड़े मौलवी पादरी और पण्डित उन्हें मार-मारकर हड़प करते चले जाते हैं। शेर और चीतों का न कहीं बलिदान होता है, न कुरबानी, न इनको कोई मारकर खाता है। इसलिए ऐसी उलटी शिक्षा देनेवाले अब संसार में प्रतिष्ठा नहीं पा सकते।

म0 मसीह कहते हैं- ‘Thou shalt not kill thy neighbor.’  ‘A Christian has no right to exploit his brother. ‘Turn thy right cheek when smitten on the left.’

तू अपने पड़ोसी को मत मार (यहाँ पड़ोसी का अर्थ है हरेक मनुष्य)। पर क्या जर्मनी, फ्राँस, इटली और ग्रेट ब्रिटेन के ईसाई चुपचाप बाएँ गाल पर थप्पड़ खाकर दाहिना गाल दूसरे तमाचे की प्रतीक्षा में फ़ेर देते हैं? आपस में थोड़े से आदमियों के लाभ के लिए लाखों के गले नहीं काटते-कटवाते? क्यों अपने पड़ोस के लोगों को लूटने की ही चिन्ता में ईसाईयों और मुसलमानों का समय बीतता है? फि़र हम धर्म के झूठे ढकोसलों में फ़ँसना कैसे पसन्द कर सकते हैं। लुटेरे लोग और डाकू जातियाँ धर्मउपदेश को सुन-सुनकर मन में मुसकराती और कहती हैं ‘लो मौलवीजी, पादरी साहब, पण्डित महाराज हम आपको धन देते हैं, आप दुनिया को उपदेश करें जिसमें सब सोते हुए बेहोश पड़े रहें और हम सबको खूब लूटें।’ इस दशा में क्या ईश्वर की कल्पना निर्धनों, कमजोरों और भोली-भाली सर्वसाधारण जनता के लूटने का एक ख़ासा साधन नहीं है? है, इसलिए ईश्वर और धर्म को जितनी जल्दी संसार से नेस्ताबूद कर दिया जाय उतना ही अच्छा।

मनुष्य का कल्याण इसी में है कि वह नैसर्गिक नियमों के अनुसार चले, क्योंकि उनको उसी ने प्रत्यक्ष किया है। उसके सर पर किसी व्यक्ति या समष्टि ने उन्हें ज़बरदस्ती नहीं लादा। जो ऐसे नियमों को मानते हैं, जिन्हें किसी डाकू या डाकुओं के गिरोह ने बनाकर अपने या कल्पित ईश्वर के नाम से जारी किया है वह क्या बज्र मूर्ख नहीं है? वह बिना सींग और पूँछ के पशु है और जो इस तरह नियम बनाकर धर्म या अधिकार के नाम पर उन्हें लोगों से मनवाते हैं वह जंगल के हिंसक पशुओं के मसौरे भाई हैं। अधिकार प्राप्त पुरोहितों,शासकों और धनपात्रों का यह स्वाभाविक लक्षण है कि वह जनसमूहों के दिल और दिमाग़ को- मन और बुद्धि को- मुर्दा बनाकर छोड़ देते हैं। इसलिए अधिकार प्राप्त लोगों के हृदय और मस्तिष्क दोनों कुत्सित होते हैं। यह कुत्सित हृदय लोग विद्वानों, वैज्ञानिकों, बड़े-बड़े लेखकों और वक्ताओं को धन देकर अपना गुलाम बना लेते हैं। हम तो रोज बड़े-बड़े सिद्धान्त की डींग मारनेवालों, सन्यास का झंडा उठानेवालों, राजनीति में बाल की खाल खींचनेवाले, दंभपूर्ण नेताओं को धनिकों के सामने कठपुतली की तरह  नाचते देखते हैं। इनमें से एक भी  निर्धन और ग़रीबों में रह कर, उनका सा जीवन व्यतीत करके उन्हें उनके स्वत्वों से सावधान वा जानकार करने नहीं जाता। मैं नहीं समझता कि ईश्वर और धर्म किस मर्ज की दवा है? धर्म ज्ञान किस खेत की मूली या बथुआ है? संप्रदायों और समुदायों के नेता किस जंगल की चिड़िया हैं? आज यदि हम इस अंधविश्वास को छोड़ दें, ईश्वर, धर्म और धनवानों के एजेटों व नेताओं से मुँह मोड़ लें अपने पैरों पर खड़े हों, तो आज ही हमारा कल्याण हो सकता है। हम किसी की प्रतिष्ठा करने के लिए नहीं पैदा हुए, हम सबके साथ समान भाव से रहने के लिए जन्मे हैं। न हम किसी के पैर पूजेंगे न हम अपने पैर पुजवायेंगे,न हमें ईश्वर की ज़रूरत है, न पैगम्बर और अवतार की, गुरु बननेवाले लुटेरों की।

न्यायनुमोदित, धर्मानुमोदित या उचित वही है जो बुद्धि-ग्राह्य हो, विज्ञानानुमोदित हो, मनुष्य-स्वातंत्रय का संरक्षक हो। इसके विरूद्ध सारे अधिकार, सारी व्यवस्थाएँ मिथ्या हैं, त्याज्य हैं, अत्याचाराश्रित और घातक हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘हमारा अवतार और पैगम्बर विज्ञान है, हमारा धर्म विवेक है, हमारा खुदा संसार के मनुष्यों का समूह है।’ ईश्वर ओैर उसके आश्रित धर्म और राज्य दोनों ही मनुष्य के प्रधान शत्रु हैं। जहाँ अधिकार के नाम पर काम होता है वहीं ईश्वर और शैतान की पैदाइश होती है। दोनों ही अजीबुलखिलकत जीवों को धक्का देकर सुखी होने के लिए हमें इनके पिता ‘अधिकार’ का नाश करना ही श्रेयस्कर है। आज तक धर्म के नाम पर हमें लुटेरों ने जितना लूटा है, वह सब हम वापस लेने का प्रयत्न करें और सबसे प्रधान डाकू ‘ईश्वर’ के पैरों को महीमंडल पर जमने न दें, यही हमारा इस समय प्रधान कर्तव्य है।

ईश्वर के पूजनेवाले, दासवृत्ति का समर्थन करनेवाले कहते हैं कि यदि धार्मिक बुद्धिवालों को देश का या और किसी संस्था आदि का काम सौंपा जाय तो वर्तमान समाज भी बुरा नहीं है। कानून बुरा नहीं होता, बरतने वाले ही बुरे होते हैं। ईश्वर बुरा नहीं है, उसकी आज्ञा को न माननेवाले ही बुरे है। राजा अच्छा भी होता है, बुरा भी। बुरा राजा बुरा है। बुराई बुरी है, न कि राजा का पद ही बुरा है।

यह हमारे भोले भाइयों की नादानी है। भाँग बुरी नहीं है, हाँ, भाँग पीकर होश खो देनेवाले बुरे हैं। वाह वा। मैं कहता हूँ कि कानून हो ही क्यों? न कानून होगा न कोई उसे बुरी तरह से बरतेगा। न खुदा होगा, न उसके नाम पर हज़ारों लाखों टन कागज़ रद्दी किया जायेगा। मनुष्य यदि सोचकर अपने समाज का संगठन करें, तो वह ईश्वर, राजा, कानून के बिना भी बहुत आनंद के4 साथ रह सकते हैं। ख़ास कर खुदा जैसी पहेली तो नितान्त ही अनावश्यक और व्यर्थ है।मैंने गत 27 वर्षों से खुदा की परवा नहीं की, इससे मेरा कुछ भी हर्ज नहीं हुआ, उलटे सब काम बहुत अच्छे हुए हैं। मैं पहले से अधिक संयमी, मनुष्य-भक्त और समाज-सेवा का प्रेमी बन गया हूँ, क्योंकि मैं अपने कामों को ही प्रधानता देता हूँ। हिन्दू महासभा के सभापति की तरह में यह नहीं कहता कि ‘ईश्वर हमें शक्ति से भर दें, हमें हिम्मत दें और हे सरकार हमारी रक्षा कर, हम तुझे चेतावनी देते हैं कि यदि तू ने हमारी रक्षा न की तो हम रो देंगे। तेरे परदादा ईश्वर का नाम ले-लेकर हाय-हाय मचावेंगे।’

मैं कहता हूँ कि मनुष्य बल से पूर्ण है, वह उसी से काम ले। भीख माँगना, प्रार्थना करना, हमें नीच और कायर बनाता है, जो ज्यादा गायत्री जपी जायेगी तो हिन्दू भी चोरी, डकैती, लड़कों, औरतों का चुराना आदि नीचता सीख लेंगे। ईश्वर मूर्खों के लिए अन्धेरे का घर है। बस, इस सम्बन्ध में इस समय मैं अपना वक्‍तव्य समाप्त करता

(‘माधुरी’ नवम्बर 1925 से फ़रवरी 1926 तक)

*ये व्याख्यान ahwanmag.com से लिया है।*
*दस्तक के लिए अमिताभ मिश्र*

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