आदिवासी दलित राजनीति सांप्रदायिकता

छत्तीसगढ़ में रायगढ़ से सुकमा तक रावणको जलाये जाने का विरोध ,कलेक्टर को लिखकर जताई आपत्ति .


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रायगढ.के खरसिया के सात सरपंच से लेकर बालौद के कई पंचायतों ने पत्र लिखकर शासन को चेतावनी दी हैं, कि भारत देश के मूलनिवासी आदिवासी प्रकृति को मानने वाले हैं हमारे पूर्वज भी इसी पर विश्वास रखते थे.जो आज भी इसी परपंरा को निभाते हैं ,भारत.एक धर्म निरपेक्ष देश है यहां सबको अपना अपना धर्म मनाने की आजादी हैं ,किन्तु हम.आदिवासी हिन्दू नहीं है ,यह.निर्णय भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने निर्णय में माना है,
कि आदिवासी हिंदू नहीं है.
चूकिं हमारे पूर्वज रावण ,कुभकरण ,महिशासुर को अपना पूर्वज मानते है ,इसलिए उनका दहन हमारा अपमान है .यह हक सविधान ने किसी को नहीं दिया कि किसी दूसरे धर्मों कि अपमान करें और उन्हें जलाया जाये.
भारतीय सविधान की पांचवी अनुसूचि के भाग 10 और 244 A के तहत आदिवासी समाज को यह अधिकार है कि अनूसूचित क्षेत्र मे किसी भी प्रकार से रावण कुभकरण आदि जिन्हें वे अपने आराध्य. मानते हैं उन्हें वो लोग दानव कहते हैं ,यह सरासर अपमान है हमारे पुरखों का, कि जिसे हम अपना आराध्य मानते है उसका दहन हिन्दू करते हैं.जो हमारी संस्कृति पर आघात है और देशद्रोह की श्रेणी मैं आता है.
यह पांचवीं अनुसूची की मे यह एट्रोसिटी एक्ट धारा आईपीसी 124 A के तहत अपराध है , हम लोग उन पर मुकदमा भी दर्ज कर सकते है. इस धारा में जिम्मेदार अधिकारियों को बर्खास्त करने का प्रावधान हैं .

समुदाय ने कलेक्टर को लिखित शिकायत मैं कहा है कि किसी भी तरह किसी समुदाय को हमारे पूर्वज को दहन करने की अनुमति न दी जाये .
आवेदन पत्र की प्रति उन्होंने थाने और कलेक्टर को दी हैं ,इस पर सात सरपंच के भी हस्ताक्षर है ,एसी ही शिकायत
मोहला मानपुर राजनांदगांव के कई जनप्रतिनिधियों ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को लिखा है ,इसमे अन्य के अलावा पूर्व विधयाक जनक लाल ठाकुर के भी हस्ताक्षर हैं.

 

ऐसा ही एक आवेदन सुकमा में सरपंच संघ ने कलेक्टर को दिया है .

 

 

 

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