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8 घंटे की नौकरी और पगार महज 40 रुपये :कांकेर में रसोईयों का प्रदर्शन .

6.11.2017

अंकुर तिवारी की रिपोर्ट 

कांकेर / क्या आपने कभी सोचा है कि देश के प्राथमिक और मिडिल क्लास तक के बच्चों को दोपहर का खाना बनाने वाले रसोइयों को 8 घंटे के काम के एवज में कितना मेहनताना मिलता है ।

छत्तीसगढ़ के लाखों स्कूली बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन बना कर परोसने का दायित्व जिन रसोइयों पर है, उन्हें प्रतिदिन 8 घंटे की नौकरी के लिए महज 40 रुपये मिलता है । इस हिसाब से इनका हर महीने का मानदेय 1200 रूपये हुआ। ये साल के 12 महीने काम करते हैं और कोई अतिरिक्त छुट्टी भी नहीं मिलती। यानी मनरेगा के कामकारों से भी बहुत कम मेहनताना दिया जाता है।

इन रसोईयों की आपबीती बताएं उससे पहले एक नज़र डालते हैं मिड डे मिल योजना के इतिहास पर। भारत सरकार द्वारा साल 1995 में विद्यालयों में दोपहर का भोजन देने की शुरुआत की गई। मीड डे मील योजना का मुख्य उद्देश्य बड़ी संख्या में बच्चों को स्कूल तक लाना है और उन्हें कुपोषण से सुरक्षित रखना है। रसोइयों की मेहनत के बदौलत ही मीड-डे-मील योजना को अमलीजामा पहनाने का काम किया जाता है।

अब बात रसोइयों के विरोध प्रदर्शन की, कांकेर जिले के रसोइय़ों ने शहर के मिनी स्टेडिय में धरना प्रदर्शन किया। इन रसोइयों को 12 सौ रूपये महीना मानदेय दिया जाता है। रसोइयों का कहना है कि इतने कम पैसे में घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। इसलिए 250 रूपये की दर से उन्हें मानदेय दिया जाये। जबकि सरकार रसोइयों को 40 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से मानदेय का भुगतान कर रही है।

रसोइया संघ के संरक्षक जयदेव साहा कहते है कि महंगाई के इस दौर में इतने से रूपये में सिर्फ एक वक्त का नाश्ता ही मिल पाता है। ऐसे में हम लोग कैसे अपना पेट भरें, कैसे अपना घऱ चलायें।

रसोइया बजोतिन आंचला ने कहा कि सरकार हमें मनरेगा के मजदूरों से भी कम राशि दे रहीं है, स्कूलों में दिनभर का काम करने के बाद भी उचित मानदेय नहीं दिया जा रहा है। अगर यही हाल रहा तो आगे चलकर हमें अपना काम छोड़कर रोजगार के लिए दूसरा रास्ता खोजना पड़ेगा।

जिलेभर के रसोइयों ने इस धरना प्रदर्शन में हिस्सा लिया और अपनी मांगो को लेकर सरकार विरोधी नारे लगायें। रसोइयों के विरोध प्रदर्शन के कारण सरकारी स्कूलों में मीड-डे-मील की छुट्टी रहीं और स्कूलों में मध्यान भोजन नहीं पकाया गया, जिसके चलते स्कूली बच्चों को भूखे पेट रहना पड़ा।

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अंकुर तिवारी की रिपोर्ट 

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