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बारनवापारा अभ्यारण्य से आदिवासियों का जबरन विस्थापन शुरू : वेदांता कंपनी को दी 1300 एकड़ वन भूमि

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

बारनवापारा अभ्यारण्य से आदिवासियों का जबरन विस्थापन शुरू : वेदांता कंपनी को दी 1300 एकड़ वन भूमि

  • संघर्ष संवाद से आभार सहित 

छत्तीसगढ़ सरकार वनाधिकार मान्यता कानून की धज्जियां उड़ाते हुए बारनवापारा अभ्यारण्य से आदिवासियों को जबरन विस्थापित कर रही हैं और वहीं अभ्यारण्य क्षेत्र से लगी हुई 1300 एकड़  वन भूमि वेदांता कंपनी को सोना निकालने के लिए दे दी  हैं। यह सब कुछ हो रहा है रायपर से मात्र 70 कि.मी. दूरी पर। इस अभ्यारण्य में 22 वनग्राम है जिसमें मुख्यतः आदिवासी निवास करते है। सरकार की इस तानाशाही के खिलाफ 22 अक्टूबर को दलित आदिवासी मंच के बैनर तले 24 गांवों के आदिवासियों ने सरकार को चेतावनी देते हुए संघर्ष का ऐलान किया है। पेश है देवेंद्र बघेल की रिपोर्ट; 

बलौदाबाजार जिले के बारनवापारा अभ्यारण्य में रहने वाले 24 गांव के सैकड़ो ग्रामीणों ने ग्राम बार मे विशाल सभा आयोजित कर वन विभाग की मनमानी का विरोध किया। ज्ञात हो की बारनवापारा अभ्यारण्य से 6 गांव को विस्थापित करने की प्राक्रिया वन विभाग द्वारा चलाई जा रही हैं। सभा मे मौजूद ग्रामीणों ने कहा कि हम किसी भी कीमत पर अभ्यारण्य से बाहर नही जाना चाहते हैं। पूर्व में वन विभाग ने 3 गांव रामपुर,  लाटादादर और नयापारा को विस्थापित किया हैं परंतु वो गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, यहां तक कि खेती की जमीन भी उपजाऊ नही हैं।  वर्तमान में वन विभाग पुनः वन्य प्राणी संरक्षण के नाम पर गांव का विस्थापन करने की कोशिश कर रहा हैं।


ग्रामीणों ने आरोप लगाते हुए कहा कि वन विभाग अभ्यारण्य के अंदर कोई विकास कार्य नही होने दे रहा हैं यहाँ तक कि ग्रामीणों के आवागमन में भी नाके लगाकर परेशानी पैदा की जा रही हैं जिससे ग्रामीण स्वयं गांव छोड़ने के लिए मजबूर हो जाये । सभा मे रायपुर से पहुचे छत्तीसगढ़ बचाओ  आंदोलन के संयोजक ने कहा कि वनाधिकार मान्यता कानून 2006 में स्पष्ट प्रावधान हैं कि जब तक व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकारों की मान्यता की प्राक्रिया की समाप्ति और ग्रामसभा लिखित में सहमति प्रदान नही करती किसी भी व्यक्ति को उसकी वन जमीन से बेदखल नही किया जा सकता हैं ।

इसके साथ ही अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उद्यानों से विस्थापन के पूर्व क्रिटिकल वाइल्ड लाइफ क्षेत्र का निर्धारण करने की नियत कानूनी प्राक्रिया हैं, परंतु छत्तीसगढ़ में वनाधिकार मान्यता कानून की धज्जियां उड़ाते हुए लोगों को जबरन विस्थापित किया जा रहा हैं ।  सभा मे सी पी एम के राज्य सचिव संजय पराते ने कहा की कारपोरेट मुनाफे के लिए पूरे छत्तीसगढ़ में अलग अलग परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों को उजाड़ा जा रहा हैं । सरकार स्वयं लोकतंत्र और संविधान का पालन नही कर रही हैं। दलित आदिवासी मंच की राजिम केतवास ने कहा कि सरकार एक तरफ जंगल बचाने की बात करती हैं वही दूसरी और अभ्यारण्य क्षेत्र से लगे हुए 1300 एकड़  समृद्ध वन क्षेत्र को वेदांता कंपनी को सोना उत्खनन हेतु दे रही हैं यह जंगल और वन्यप्राणियों के संरक्षण के नाम पर सरकार का दोहरा मापदंड हैं। सभा उपरांत अभ्यारण्य क्षेत्र के आन्दोलन हेतु समिति का गठन किया गया एवं  वन विभाग को ज्ञापन सौंपा गया

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