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CBA -3 . कार्पोरेट लूट का नया रास्ता .: कॉरपोरेट की अतृप्त भूख के लिए कमर्शियल माइनिंग नीति.

सरकारी कंपनियों की मिलीभगत से कोयला खदानों को पूरा विकास एवं संचालन पिछले दरवाज़े से सरकार के करीबी कॉरपोरेट घरानों को सौंपने का तरीका .

व्यापक रूप आजीविका की निर्भरता और पर्यावरणीय महत्व के कारण कोयला उत्खनन का मुद्दा हमेशा विवादों और संघर्ष का विषय हैं . कोयला उत्खनन के गंभीर पर्यावरणीय परिणामों के कारण इसके खनन और उपयोग पर वैश्विक स्तर पर बहस जारी है इन्हीं बहसों के बीच कार्पोरेट अपने भविष्य और मुनाफे को कोयला के साथ जोड़कर देख रहा है । जाहिर है , अपने लाभ लिये मनमाने तरीके से नीति और नियमों को बनवाने में वह महत्वपूर्ण भूमिका भी अदा है . कोयला में राष्ट्रीयकरण की नीति को ख़तम कर कामर्शियल माइनिंग में निजी कंपनियो अनुमति का निर्णय उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । एक लोकतांत्रिक ढांचे में औद्योगिक घराने जब नीतियों में मनमाना हस्तक्षेप करने जाये और उनकी इच्छा के अनुरुप नियम – कायदे बनने लग जाये तो यह महज पूंजी और खनन भर से जुड़ा हुआ मुद्दा भर नहीं रह जाता . इसे लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश पर देखा जाना चाहिये .

तो श्रंखला का तीसरा अंक है .” कॉरपोरेट की अतृप्त भूख के लिए कमर्शियल माइनिंग नीति. “

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20 फरवरी 2018 को केन्द्रीय सरकार ने एक अत्यंत दुर्भाज्ञपूर्ण फैसला लेकर एक नई कमर्शियल माइनिंग की नीति की घोषणा की जिसमें केवल बाज़ार में कोयला बिक्री के लिए निजी क्षेत्र द्वारा कोयला खनन को अब अनुमति मिल गई है । अब निर्धारित अंत – उपयोग की जगह केवल कमर्शियल माइनिंग के लिए निजी कंपनियों को खदानों का आबंटन किया जा सकेगा । हालांकि लगातार आबंटन नियमों और नीति में लचीलेपन से पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को कमर्शियल माइनिंग की छूट दी दी गई थी , लेकिन फिर भी यह कोयला उत्खनन के क्षेत्र में एक बड़ा कदम है जब निजी कंपनियां सीधे रूप से कोयला व्यवसाय में प्रवेश हो सकेंगी । इसके पहले 2016 में ही सरकार ने कुछ खदानों को केवल कमर्शियल माइनिंग के लिए सर्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को आवंटित किया था । तत्पश्चात सितम्बर 2017 में सरकार ने आवंटी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की खदानों को भी अंत – उपयोग परिवर्तन तथा बाज़ार में बिक्री की लचक प्रदान कर दी थी । इसके बाद से उत्खनन के अंत – उपयोग निर्धारण का प्रमुख आधार ही ख़तम हो गया थ । वैसे तो यह केवल सरकारी कंपनियों पर ही लागू थी , परन्तु जैसा हमने पिछले अध्याय में देखा MDO प्रक्रिया के चलते इनके खनन का मुख्य लाभ निजी कंपनियां ही उठा रही हैं ।

          वैसे तो कोयला खदान ( विशेष उपबंध ) 2015 में ही कमर्शियल माइनिंग का प्रावधान था , लेकिन संसद में अधिनियम पर बहस के दौरान सरकार ने तब विश्वास दिलाया था की वह विकास कार्यों में अत्यंत ज़रुरत पड़ने पर ही इस प्रावधान का उपयोग कर नीति - नियम बनाएगी और जहां तक हो सकेगा निजी कंपनियों को कमर्शियल माइनिंग की अनुमति नहीं दी जायेगी । परंतु लगातार नीति में लचीलापन कर पहले आबंटन - MDO के पिछले दरवाज़े से और अब तो खुला नीलामी प्रक्रिया से ही सरकार ने पूरे कोयला उत्खनन क्षेत्र को निजी मुनाफ़े के लिए खोल दिया है जिसके गंभीर तथा दूरगामी दुष्प्रभाव होंगे । यह नीति कोयले के 1970 के दशक में किये राष्ट्रीयकरण को पूर्णतया ख़तम कर देती है और अब कोयले को निजी संपत्ति की तरह पेश करती है । यह नीति पूर्णतया 2014 में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध है जिसमें खनिज के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत का विवरण किया था - खनिज देश के जनता की बहुमूल्य सम्पदा है जिसका उपयोग केवल जन - हित में और केवल ज़रुरत के आधार पर ही किया जाना चाहिए । कमर्शियल मीनिंग नीति ने इस सिद्धांत की ना सिर्फ अनदेखी की है बल्कि मानो उसे सिरे से पलटकर सन्देश दिया है की खनिज केवल सरकार के प्रिय पूंजीपतियों की निजी संपत्ति है जिसमें देश का या देश की जनता का कोई अधिकार ही नहीं है । ।


क्या है नई कमर्शियल माइनिंग नीति ?

1974 में हुए राष्ट्रीयकरण के बाद से कोयले का उत्खनन केवल कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा देश के विकास की जरूरतों के अनुरूप किया जा रहा था । जब 1992 में इस क्षेत्र का आंशिक निजीकरण हुआ , तब भी यह महत्वपूर्ण प्रावधान रखा गया की निजी कंपनियों द्वारा कोयला खनन केवल निर्दिष्ट किये अंत उपयोगों जैसा की ऊर्जा , सीमेंट , लौह – इस्पात , या एल्युमीनियम उत्पादन के लिए ही किया जा सकता है और केवल उतनी ही मात्रा में जितना अंत उपयोग के लिए अत्यंत आवश्यक है । इस प्रावधान से यह सुनिश्चित किया गया था की राष्ट्र के बहुमूल्य कोयला संसाधन व्यर्थ ना जाए और उसके कारण हुए पर्यावरण , वन संसाधन के विनाशया जन – पलायन को सीमित किया जाए । पर इस मूल सिद्धांत के विपरीत अब कोयला केवल बाज़ार में विकत साधारण वस्तु के सामन हो गया है जिसमें देश – हित एवं जन – हित जैसे सिद्धांतों की कई जगह नहीं बची ।

1 . नयी कमर्शियल माइनिंग नीति के अनुसार अब कोयला खदानों का आबंटन निजी कंपनियों | को किया जाएगा जिसमें अंत – उपयोग का या कोयले की ज़रुरतों का कोई प्रावधान नहीं होगा । निजी कंपनियां अब बिना रोक – टोक और बिना सवाल खनन कर इस कोयले को राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में बेचकर निजी मुनाफ़ा कमा सकेंगी ।

2 . इस नीति के अन्र्तगत उत्पादित कोयले की निजी जमाखोरी एवं मुनाफ़ाखोरी रोकने के भी कोई प्रावधान नहीं हैं । इसमें ऐसा प्रावधान है कि यदि कंपनी चाहे तो अपनी मन – मर्जी से , और बिना किसी स्वीकृति प्रक्रिया के , अपने उत्पादन को 50 प्रतिशत से कम कर सकती है । इस प्रावधान का उपयोग कर जमाखोरी और कृत्रिम अभाव की स्थिति पैदा कर मुनाफ़ा कमा सकेंगी ।

3 . उत्पादित खनिज के विक्रय की कीमत पर भी कोई रोक नहीं हैं ।

4 . खनिज कर्मचारियों के शोषण को रोकने या उनके वेतन – रोज़गार सुरक्षा के लिए बनी कोल | इंडिया लिमिटेड की आदर्श नीति का भी इन कंपनियों को पालन नहीं करना होगा ।

5 इस नीति के बाद अब निजी कंपनियां सस्ते दामों में खदानें खरीदकर , मजदरों का पूर्णतया शोषणाकर उसकी इच्छानुसार जमाखोरी कर ज्यादा मूल्यों पर राष्ट्रीय या अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में कोयला बेच सकेंगी चाहे औद्योगक परियोजनाएं कोयले के अभाव में ठप्प ही क्यूं ना पड़ जाएँ । सरकार की मानें तो इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा बहतर हो सकेगी , कोयला आयात सीमित हो सकेगा और कोल इंडिया लिमिटेड की कथित अक्षमता नियंत्रित होगी । जिससे कोयला उत्पादन बढ़ सकेगा और उत्पादन में लागत कम होगी जिससे बिजली के दाम कम हो सकेंगे । पर आइये इन दावों की थोड़ी जांच – पड़ताल करें ।

जब देश में कोयले की ज़रुरत ही नहीं तो कमर्शियल माइनिंग क्यूँ ?

जैसे हमने पहले अध्याय में देखा कि जनवरी 2018 में कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा प्रकाशित कोल विज़न 2030के अनुसार भारत के 2030 तक के कोयला की ज़रुरत की आपूर्ति करने के लिए कोई भी नए खदान के आबंटन या नीलामी की ज़रुरत ही नहीं है । इस रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेखित हैं कि कम से कम वर्ष 2022 – 25 से पहले किसी भी नई खदान की ज़रुरत नहीं है । और घरेलू मांग के आधार पर किसी भी नई खदान को आर्थिक नुकसान होना निश्चित है । ऐसे । में सरकार का नई खदानों को कमर्शियल माइनिंग के लिए आवंटित करना किसी भी प्रकार से । उचित नहीं है और इसको देश की उर्जा सुरक्षा से जोड़ना मात्र भ्रमित करने के कोशिश है । अब बात करते हैं सरकार के दूसरे दावे की कि इससे कोल इंडिया लिमिटेड की खामियों को निजी कंपनियाँ दूर कर सकेंगी जिससे उत्पादकता बढ़ेगी और कोयला के दाम कम हो सकेंगे । परन्तु यह देखा गया है की निजी कंपनियों द्वारा कोल इंडिया लिमिटेड के दामों से अधिक दर पर कोयला बेचा जाता है । जैसा की मार्च माह में छपे एक प्रमुख अंग्रेजी मैगज़ीन / दी कारवां से पता चलता है की परसा ईस्ट केते बासन कोयला खदान से अदानी द्वारा कोल राजस्थान सरकार की उर्जा कंपनी को 2267 रूपये प्रति टन पर बेचा जाता है जोकि कोल इंडिया लिमिटेड के बाज़र मूल्य ( लगभग 1992 . 96 रुपये प्रति टन ) से कहीं अधिक है । इससे साफ़ है की या तो निजी कंपनियों की लागत कोल इंडिया लिमिटेड से कहीं अधिक है या फिर निजी कंपनियों बहुत अधिक मुनाफ़ा कमा रही हैं । इन दोनों ही स्थिति में देश में कमर्शियल माइनिंग से उत्पादित कोयला का मूल्य कम नहीं बल्कि बढ़ेगा ही जिससे ना सिर्फ उर्जा महँगी होगं बल्कि सभी घरेलू उत्पाद की चीज़ों में भी महंगाई बढ़ जायेगी । साफ़ है कि सरकार का उत्पादन बढ़ाने और उत्खनन में कोल इंडिया लिमिटेड की तथा कथित अक्षमता को दूर करने के दावे झूठे और भ्रमात्मक है । इस कदम का मूल प्रभाव देश में महंगाई बढ़ाकर जनताके पैसों को निजी कंपनियों को मुनाफ़ा पहुंचायेगा ।

जिन निजी कंपनियों ने पहले नीलामी में हिस्सा नहीं लिया , वे अब कमर्शियल माइनिंग की नीलामी में बोली क्यूँ लगाएंगी ?

जैसा हमने तीसरे अध्याय में देखा कि वर्ष 2015 – 17 के बीच कोयला खदानों की नीलामी प्रक्रिया बार – बर विफल रही और इसमें निजी कंपनियों ने कोई रूचि नहीं दिखाई । ख़ास तौर से अगस्त 2015 के बाद से नीलामी के तीसरे , चौथे और पांचवे चरण लगभग पूर्णतया ही विफल रहे क्यूंकि इनमें निजी कंपनियों ने भाग ही नहीं लिया । इसका कारण भी कई विश्लेषकों और निजी कंपनियों के मालिकों ने साफ़ बताया की कोयले की मांग में अनिश्चितताएं हैं जिससे इन खदानों से जुड़ी अंत – उपयोग परियोजनाओं में हानि होना अत्यंत संभावित है । वहीं दूसरी ओर पिछले 3 वर्षों में कोल इंडिया लिमिटेड की 72 खदानें बंद कर दी गयी हैं । ऐसे में सवाल यह है की सरकार को क्यूँ लगता है की जिन निजी कंपनियों को पूर्व में हुई नीलामी प्रक्रियाओं में । रूच ही नहीं थी , वे अब कमर्शियल माइनिंग के लिए सामने आएँगी ? जवाब शायद कमर्शियल माइनिंग के नियमों में ही का है । पहले नीलामी की गई खदानों में प्रावधान था की इनका उपयोग केवल पर्वनिर्धारित अंत – योग परियोजना के लिए ही किया जा सकेगा । अब क्यूंकि कमर्शियल माइनिंग में ऐसी कोई रोक नहीं हैं तो निजी कंपनियों को अंतराष्ट्रीय बाज़ार में कोयले की सट्टेबाज़ी , खनिज संग्रह पर कब्जा , या सस्ते दामों पर केवल ज़मीन और जंगल की जमाखोरी में तो रूचि हो ही सकती है

पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों में व्यापार हेतु कोयला उत्खनन :

सबस दुर्भाग्य पूर्ण बात यह है कि कमर्शियल माइनिंग के लिए अधिकाँश खदानें सघन वन क्षेत्रों , जैव – विविधता से परिपूर्ण इलाकों , और आदिवासी बाहुल क्षेत्रों में ही खोली जायेगी । इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है की जब सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को 2016 में कमर्शियल माइनिंग की अनुमति मिली तो आवंटित 7 खदानों में से 6 खदान घने जंगलों और आदिवासी बाहुल क्षेत्रों में ही हैं जिनमें हसदेव अरण्य क्षेत्र की मदनपुर साउथ खदान भी शामिल हैं । हसदेव अरण्य क्षेत्र जैसे पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र को पिछली सरकार की ‘ नों – गो ‘ नीति का संरक्षण प्राप्त था । परन्तु वर्तमान नई नों – गो या इनवायलेट नीति को घोषित नहीं किया गया , इसलिए इन सभी क्षेत्रों में नई खदानें आवंटित की जा रही है । इससे जैव विविधता , पर्यावरण एवं वन – संपदा का विनाश तो सुनिश्चित हैं ही , साथ ही मानव – जानवर संघर्ष बढ़ेंगे ।

साथ ही इससे आदिवासी संस्कृति , आजीविका और सामाजिक अवस्था पर भी गंभीर ठेस पहुंचेगी । मात्र कमर्शियल माइनिंग से होने वाले निजी लाभ के चलते इतने महत्वपूर्ण क्षेत्रों के विनाश का कोई पर्यावरणीय , आर्थिक या मौलिक औचित्य नहीं हैं । यदि ज़रुरत ही नहीं तो क्यूँ ऐसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों का और वन – समुदायों का विनाश किया जा रहा है । शायद इसका जवाब भी अन्तराष्ट्रीय बाज़ार से ही सम्बंधित है । विश्व के सभी बड़े देशों में कोयला खनन के स्थानीय एवं क्षेत्रीय दुष्प्रभावों को देखकर उस पर नियंत्रण लगाया जा रहा है और वहां भूमि – अधिग्रहण , पूनर्वास , जैव – विविधता संरक्षण इत्यादि के लिए कड़े । कानन हैं जिससे कोयला उत्खनन में संसाधनों , पर्यावरण तथा स्थानीय लोगों का शोषण वर्जित है इससे कोयले की उत्पादन की लागत बढ़ जाती है । शायद सरकार और निजी कंपनियां इसी बाज़ार पर निशाना साधे हैं और लगातार जन – पक्षीय कानूनों को लचीला करके और पर्यावरणीय कानूनों को अनदेखा कर कोयला उत्खनन को अधिक लाभकर बनाने के प्रयास कर रही है । जिसका सीधा फायदा कमर्शियल माइनिंग के ज़रिये निजी मुनाफे में वृद्धि में देखा जा सकेगा ।

कमर्शियल माइनिंग नीति से उठते प्रमुख सवाल :

उपरोक्त तथ्यों से कमर्शियल माइनिंग नीति पर कई गंभीर सवाल उत्पन्न होते हैं । क्या सरकार यह मानती है की कोल इंडिया द्वारा प्रकाशित कोल इंडिया विज़न 2030 का आंकलन गलत है की हमें कोई नई खदान के आबंटन की जरुरत नहीं है ? क्या सरकार इस बात से भी झुठला रही है की कोयला खदान नीलामी के पिछले तीन चरणों में 26 में से 24 खदानों की नीलामी को केवल इसलिए रद्द करना पड़ा था क्यूंकि उसमें निजी कंपनियों की कोई रूचि ही । नहीं थी ? यदि ये तथ्य सही हैं तो क्यूँ ना माना जाए की कमर्शियल माइनिंग से उत्पादित कोल का उपयोग देश की जरूरतों के लिए नहीं बल्कि दूसरे देशों में कोयला निर्यात या निजी कंपनियों द्वारा जमाखोरी और मुनाफाखोरी के लिए किया जाएगा ? क्या सरकार की नयी कोयला नीति यही है कि कोल इंडिया लिमिटेड द्वारा परिचालित कोयला खदानों को बंद कर निजी खदानें खोली जाएँ ? और ऐसी क्या ज़रुरत आन पड़ी की पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण सघन वन क्षेत्रों और आदिवासी बाहुल इलाकों में भी कमर्शियल माइनिंग की जाए जिसके लिए इनवायलेट नीति की घोषणा का भी इंतेज़ार ना किया जा सके ? इस कमर्शियल माइनिंग नीति की घोषणा से सरकार ने यह पूर्णतया सिद्ध कर दिया है । की उसे जनता के औद्योगिक या सामाजिक विकास की , देश की बहुमूल्य खनिज संपदा की , सघन दुर्लभ वन्यक्षेत्रों के संरक्षण की , या जनता के संवैधानिक अधिकारों की कोई चिंता नहीं हैं । अपितु मानों चुनिन्दा कॉर्पोरेट को लाभ पहुंचाना जैसे सरकार का एकमात्र उद्देश्य बन गया है । वैसे तो सरकार विश्वास दिलाना चाहती है की देश के विकास की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है , परन्तु इस नीति से जुड़े तथ्यों पर प्रकाश डालें तो सरकार की मंशा साफ़ दिखाई देती । है की यह केवल चुनिन्दा निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की व्यवस्था है जिसका विकास से कोई लेना देना नहीं बल्कि शायद इसका एकमात्र उद्देश्य सत्तारूढ़ पार्टी के लिए आगामी चुनावों में प्रचार प्रसार के लिए धन एकत्रित करना है ।

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छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने गहन अध्यन करके ” कमर्शियल कोल माइनिंग और एमडी़ओ कार्पोरेट लूट का नया रास्ता ” नाम से एक पुस्तिका प्रकाशित की है.जिसमें कोयला
खदानों के आवंटन की प्रक्रिया में हो रही लूट को सिस्टमेटिक तरीके से समझाया गया हैं .छत्तीसगढ़ के संदर्भ में.कोयला खदानों के आवंटन और लूट का विस्तार से लिखा गया हैं ,कि कैसे केन्द्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के ठीक विपरीत नीतियां बनाकर देश के पूरे कोयले को अपने चहते कारपोरेट अदानी को सोंपने का षड्यंत्र रचा
हैं.

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