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सरकार तू हैं कहाँ बता ? ; सन्दर्भ बस्तर – प्रभात सिंह

सरकार तू हैं कहाँ बता ? ;  सन्दर्भ बस्तर 
प्रभात सिंह 



सुरक्षा का अधिकार नहीं है ? जबकि माओवादी उसे कई बार उठाकर ले गए और जान से मारने की धमकी के बाद छोड़ दिए और अंत में वही हुआ जो हमेशा बस्तर में होता आ रहा है निर्दोषों का हमेशा गला घोंटा जाता रहा है |

अब इस दुःखद मामले पर बस्तर के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी जुलुस निकालकर अपनी नाकामयाबी छुपाने का प्रयास देश की जनता के सामने करेंगे | भाई आप ही बताओ; आसुजीत पोड़ियाम बस्तर में इकलौता शख्स नहीं है जिसे माओवादियों ने मुखबिरी के नाम पर मौत के घाट उतार दिया हो, पर इसकी कहानी औरों से जुदा है | पेशे से डाकिया कहलाने वाले सुजीत पर माओवादी गोपनीय सैनिक के रूप में मुखबिरी का आरोप लगा रहे हैं सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक फुलपाड़ इलाके से कुछ माह पहले 4 लोगों की गिरफ्तारी और सन्ना सोढ़ी की गिरफ्तारी में इसकी भूमिका का आरोप माओवादियों द्वारा लगाया गया है | सुजीत 2013 से ही माओवादियों को खटक रहा है | इस मामले में भी पत्रकारों ने भरपूर कोशिश की पत्रकार जंगलों की ख़ास छानकर कल शाम ही लौटे थे | किन्तु कोई सुखद समाचार नहीं मिला पर आज खबर आई तो फिर बस्तर की धरती लाल हो गई |
अब सवाल यहीं से उठता है कि यदि सुजीत पोड़ियाम माओवादीयों की मुखबिरी कर रहा था तो पुलिस को हर घटना की जानकारी रही होगी | फिर सुजीत और उसके घर वालों को मरने क्यों छोड़ दिया गया | जबकि एक कथित हमले या माओवादी धमकी बावत चिट्ठी के बाद जनप्रतिनिधि टाइप के ठेकेदारों को भी सुरक्षा बल मुहैया हो जाती है और तो ऐसे कथित जनप्रतिनिधियों को सालों साल सुरक्षा बाकायदा रौब के साथ मिलती रहती है | तब ऐसे गोपनीय सैनिकों को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई जो सरकारी तंत्र को मजबूत करने की सबसे बड़ी कड़ी है | जबकि गोपनीय सैनिकों के बिना माओवाद खत्म हो ही नहीं सकता है |
अब इसका दूसरा पहलु यह कि वह गोपनीय सैनिक नहीं रहा हो और पुलिस के लिए मुखबिरी भी नहीं करता रहा हो किन्तु जब माओवादी सुजीत को लगातार डरा रहे थे और सुजीत को माओवादियों द्वारा कथित गोपनीय सैनिक करार देकर जान से मारने की धमकी और चेतावनी मिल रही थी | तब बेचारे डाकिया सुजीत के साथ न्याय क्यों नहीं किया गया | क्या सत्ता लोभियों को ही छत्तीसगढ़ सरकार में केवल सुरक्षा का अधिकार है ? क्या सुजीत जैसे कर्मवीर डाकिये को प लोगों के हाथ में बन्दुक दी है क्या सरकार ने ? नहीं ना ! जिस आम जनता की सुरक्षा का जिम्मा हथियार बंद बस्तर पुलिस को दी गई है | वे चंद माओवादियों को नहीं पकड़ पा रहे हैं जो बस्तर में खून की होली सालों से खेल रहे हैं | इन्हें जुलुस निकालने के बजाय उस वीरगति को प्राप्त सुजीत कुड़ियाम की अर्थी उठने के पहले माओवादियों को सबक सिखाया जाना था | किन्तु ऐसा होगा नहीं क्योंकि सब सुनियोजित साजिस का हिस्सा है |
ये सलवा जुडूम ले कर आये हजारों मारे गए लाखों बेघर हो गए, इनकि मौजूदा स्थिति देखना हो तो चले जाइए बस्तर से सटे पड़ोसी राज्यों में करीब एक लाख लोग तो भद्राचलम की विस्थापित बस्तीयों में ही मिल जायेंगे | बस्तर में सरकारी राजनैतिक सलवाजुडूम के बाद माओवाद तो कम नहीं हुआ, किन्तु माओवाद उससे अधिक विकराल शक्ल अख्तियार कर बस्तर में लौट आया | अब सलवा जुडूम का विकल्प ढूंढने की फिराक लगाईं जा रही है | उसके वैकल्पिक नाम बदल-बदल कर सामने लाये जा रहे हैं |
माओवाद का शिकार आम बस्तरिया होता था, होता है और होता रहेगा | तब तक, जब तक कार्पोरेट्स को बस्तर में हर उस इलाके की जमीन नहीं मिल जाती जहाँ गर्भ में छुपा है बेशकीमती खनिज सम्पदा | जिसके दोहन के लिए जल और साथ में उन्हें मुफ्त में खरबों की वन सम्पदा सौगात में मिल नहीं जाते |
इतना सब सुनने के बाद भी आपको लगता है कि, सरकार है छत्तीसगढ़ में ! यदि है तो वह सरकार है कार्पोरेट्स के लिए काम करने वाली सरकार; जिसके लिए बस्तर में फोर्स की संख्या तो सालों से बढ़ती जा रही है | किन्तु नक्सलवाद का नासूर कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है |
एक तरफ बस्तर के पुलिस अफसर कहते नहीं थकते की अब तो नक्सलियों का खात्मा हम कर ही दिए हैं | बस्तर में माओवाद खत्म होने के कगार पर है | तो फिर बस्तर में फोर्स की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है | अपराध कम होने से थानों, चौकियों और पुलिस कैम्पों की संख्या कम होनी चाहिए । यदि इन सबकी संख्या बढ़ रही है तो समझ लीजिये अपराध बढ़ रहा है ।
एक बात तो साफ है बस्तर में फोर्स तब तक रहेगी जब तक कार्पोरेट्स को एक-एक इंच जमीन नहीं मिल जाता; ये कार्पोरेट्स पाइप लाईन बिछाने के लिए माओवादियों को पैसे देने तैनात खड़े रहते हैं | तो फिर इनके सामने दूसरा पक्ष उस सरकार का है जिसके उपर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों |
Prabhat Singh की खबर साभार

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