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चमकते छत्तीसगढ़ का सच, दिवाली बाद गांव में बचते हैं सिर्फ बूढ़े, बच्चे और बेबस

चमकते छत्तीसगढ़ का सच, दिवाली बाद गांव में बचते हैं सिर्फ बूढ़े, बच्चे और बेबस

2016-11-26 11:18:52



चमकते छत्तीसगढ़ का सच, दिवाली बाद गांव में बचते हैं सिर्फ बूढ़े, बच्चे और बेबस

बिलासपुर. मुडपार का तीजराम पिछले एक महीने से रोजी-रोटी के लिए अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर उत्तर प्रदेश गया हुआ है। पिछले दिनों उसके कच्चे घर का छप्पर गिर गया। जब तीज राम आएगा तो घर की मरम्मत कराएगा। यह कहानी तीज राम जैसे यहां के दर्जनों गांव के हजारों लोगों की है जो धान की फसल के बाद अपने गांव-घर को छोड़कर रोजी-रोटी के लिए प्रदेश चले गए हैं। 

बुधवार को छत्तीसगढ़ से मजदूरी के लिए उत्तर प्रदेश जाने वाले साढ़े पांच सौ से अधिक परिवारों का खुलासा होने के बाद पत्रिका ने जिले के मस्तूरी विकासखण्ड के मुडपार सहित कुछ एेसे गांव का दौरा किया, जहां लगभग आधे से ज्यादा गांव के नौजवान अपने परिवार को लेकर रोजी कमाने परदेश जाते हैं। इससे भी गंभीर बात तो यह है कि श्रम विभाग को इसकी सब जानकारी होते हुए भी रोजी-रोटी के लिए अपना गांव-घर छोडऩे वाले इन ग्रामीणों को रोक नहीं पा रहे हैं। इस क्षेत्र के लोग ज्यादातर इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, बस्ती सहित उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में काम करने जाते हैं। वहां पर यह ईंटभ_ों में काम करते हैं। 

गांव के लव कुमार केवट, नरोत्तम सिदार, शिव नारायण पटेल ने बताया कि अपनी पत्नी के साथ पांच से छह महीने तक वहां काम करते हैं, जिससे उन्हें 60-70 हजार रुपए मिल जाते हैं। ठेकेदार मजदूरों को एक सप्ताह में डेढ़ हजार रुपए खर्च के लिए भी देता है। एडवांस के बाद आखिरी में पांच महीने बाद काम के आखिरी में हिसाब होता है। चूंकि ठेकेदार एडवांस में पैसे देता है, इसलिए वहां पूरे समय (साढ़े पांच माह) काम करना अनिवार्य रहता है। इसके पहले मजदूर वहां से नहीं आ सकता, हालांकि छग के सीधे-सीधे मजदूर बदमाशी न कर राजी खुशी वहां अपना काम करते हैं, जब तक कि उनके घर पर या स्वास्थ्य पर कोई विपरीत असर न पड़े। रोजी मजदूरी के लिए परदेश जाने वाले अधिकांश ग्रामीण पांचवीं-छठवीं तक ही पढ़े लिखे हैं। वहीं इनके पास खेती के लिए तीन-चार भाइयों में दो या चार एकड़ जमीन है, जो गुजारे के लिए नाकाफी है। 

इसलिए जाते हैं
वैसे तो सरकार ने प्रदेश और क्षेत्र के विकास के लिए मस्तूरी क्षेत्र में एनएमडीसी जैसी बड़ी विद्युत उत्पादन इकाई को लगा रखा है, लेकिन रोजगार के लिए सबसे ज्यादा लोग इसी क्षेत्र से बाहर जाते हैं। यहां के राम गोपाल, लक्ष्मी गिर, गोरेलाल सिदार, श्रवण यादव ने बताया कि एनटीपीसी में मजदूरों का काम भी होता है लेकिन वहां के ठेकेदार को काम के पहले 2 हजार रुपए देना होता है, तब वह काम पर रखता है। प्लांट में मजदूरी करने के लिए ठेकेदार ने बिहार या अन्य जगह से लेबर लाए हुए हैं। यहां मजदूरी भी कम मिलती है। 

मजदूर अपनी मर्जी से जाते हैं। समय-समय पर विभाग द्वारा इसका सर्वे कर मजदूरों को कौशल विकास के माध्यम से उन्हेंे स्थानीय रोजगार से जोडऩे का कार्य किया जाता है। 
अनीता गुप्ता, सहायक श्रम आयुक्त, बिलासपुर

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