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गढ़चिरोली विनाश की ओर : स्थानीय समुदायों का पुरजोर विरोध

गढ़चिरोली विनाश की ओर : स्थानीय समुदायों का पुरजोर विरोध


देश के आदिवासी इलाकों में जमीन के नीचे दबी खनिज संपदा को विकास के नाम पर कॉर्पोरेट शक्तियों के हाथों में सौंपने का सिलसिला चल रहा है। इस प्रक्रिया में न सिर्फ उस इलाके के आदिवासी और पर्यावरण का विनाश हो रहा है बल्कि बाकि सभी मेहनतकश समुदायों को रोजी रोटी से उजाड़ा जा रहा है.. जिंदगी से उजाड़ा जा रहा है…”। इसी क्रम में अब बारी है महाराष्ट्र के गड़चिरौली जिले की जहां पर एक दर्जन से ज्यादा खदानें प्रस्तावित हैं। इन खदानों की वजह से उस इलाके के हजारों परिवारों पर बेघर होने का खतरा मंडरा रहा है साथ ही साथ वहां के पर्यावरण के नष्ट होने का खतरा भी है। वहां न सिर्फ आदिवासियों पर बल्कि एनी समुदायों पर भी सीधा प्रभाव पड़ेगा। इन खदानों का स्थानिक जनता जोरदार विरोध कर रही है। लोगो को बहकाने की, उन्हें खरीदने की हर एक कोशिश विफल होती देख विरोध करती जनता पर दमन किया जा रहा है। लोग समझ के संगठित न हो पाए इसीलिए दलाल जनप्रतिनिधियों द्वारा लोगो को गुमराह कर रहे हैं। हम यहां पर प्रस्तावित खदानों तथा उनके प्रभावों से संबंधित महेश राउत की विस्तृत रिपोर्ट साझा कर रहे हैं।

गडचिरोली विनाश की ओर…  

महाराष्ट्र के गडचिरोली जिले में वर्तमान में चल रहे या चालू करने के कोशिश वाली खदाने: सुरजागड (एटापल्ली तालुका) – १. लॉयड्स कंपनी – ३४८.०९ हेक्टर, देऊलगांव (आरमोरी तालुका) – २. तावाक्कल – ५.४१ हेक्टेयर, ३. मॉडर्न मिनरल – १.६२ हेक्टेयर, ४. कोटा मिनरल्स – २० हेक्टेयर.

गडचिरोली जिले में प्रस्तावित खदानें:

कोरची तालुका: झेंडेपार क्षेत्र – १. अमोलकुमार अग्रवाल कंपनी – १२ हेक्टेयर, २. निर्मलचंद कंपनी – २५.६२ हेक्टेयर, ३. अनुज माईन एंड मिनरल्स – १२ हेक्टेयर, ४. रमेश वाजुरकर कंपनी – ८ हेक्टेयर, ५. मनोजकुमार सरिया – ४ हेक्टेयर, भर्रीटोला क्षेत्र – १. विनायक इंडस्ट्रीज – २१.३९ हेक्टेयर, मसेली क्षेत्र – १. अजंता मिनरल्स – ६५ हेक्टेयर, २. चमन मेटालिक्स प्रा.ली. – २०० हेक्टेयर, ३. सिधावाली इस्पात – १५० हेक्टेयर, ४. सुरजागड स्टील एंड माईन्स – ५० हेक्टेयर, ५. धारीवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर – ३५३.६० हेक्टेयर हे, ६. टाटा स्टील – १३१.१० हेक्टेयर, (पूरे लोह खनिज खदान)

एटापल्ली तालुका: सुरजागड – १. गोपनी आयरन – १५३.०९ हेक्टेयर, दमकोंडवाही – १. गोपनी आयरन – २९५ हेक्टेयर, २. जे.एस.डब्लू. इस्पात – २०५० हेक्टेयर, बांडे – १. सनफ्लाग आयरन- २३६.७५ हेक्टेयर, नागलमेटा – १. ग्रेस इंडस्ट्रीज – १५६ हेक्टेयर, गुदंजुर – १. आधुनिक कोप. लिमि. – ४४९.२८ हेक्टेयर, गुन्दुरवाहीमेटा – १. सत्यनारायण अग्रवाल – ५७१ हेक्टेयर, मल्लेर मेटा – १. कल्पना अग्रवाल – ४६३ हेक्टेयर, अद्रेलगुडा- १. सिधावाली इंडस्ट्रीज – ३०७ हेक्टेयर, करमपल्ली – १. वीरांगना स्टील – ६३१.५५ हेक्टेयर, परहुर मेटा – १. इस्पात इंडस्ट्रीज – ४६३ हेक्टेयर (पूरे लौह खनिज खदान)

अहेरी तालुका: देवलमारी – १. वाय एंड एम सीमेंट – २५२ हेक्टेयर, २. गुजरात सीमेंट – २७१ हेक्टेयर इसके साथ साथ धानोरा, चमोर्शी, भामरागड इस तालुका में भी खदानें प्रस्तावित होने की प्रक्रिया चल रही है. जिसमें हजारों हेक्टेयर वन भूमि और एनी भूमि नष्ट की जाएगी। सैकडों गांवो पर विस्थापन का खतरा और हजारों परिवारों को बेघर किया जा सकता है। इसमें आदिवासियों के साथ साथ एनी समुदायों पर भी सीधा प्रभाव पड़ेगा। पर्यावरण का नुकसान और भी गंभीर परिणामों को सामने लायेगा।

पिछले कई सालों से सरकार निजी कंपनियों द्वारा गडचिरोली के सुरजागड, आगरी-मसेली, बांडे, दमकोंडवाही आदि जगहों पर लौह खनन चालू करने के प्रयास कर रही है। जिसका स्थानीय जनता जोरदार विरोध कर रही है। 

“यह साफ है की विस्थापन सिर्फ आदिवासियों का मसाला नहीं है.. जल-जंगल-जमीन से सिर्फ आदिवासियों को ही नहीं उजाड़ा जा रहा है… बल्कि आदिवासियों के साथ-साथ बाकि सभी मेहनतकश समुदायों को रोजी रोटी से उजाड़ा जा रहा है.. जिंदगी से उजाड़ा जा रहा है…”

गडचिरोली, १४ नवंबर २०१६: रोजगार और विकास के नाम पर सुरजागड़ इलाके के हमारे देव, पवित्र डोंगर-पहाड़ और वनों को नष्ट करने वाले, हमारी आदिम संस्कृति को ख़त्म करने के प्रयासों, और हमें विस्थापित करने पे तुले हुए सभी खदानों को गैर कानूनन घोषित कर उन्हें तुरंत रद्द किया जाये ये स्पष्ट भूमिका ७० गावों के पारंपरिक सुरजागड़ क्षेत्र की इलाखा गोटुल समितीने प्रत्रकार परिषद् में जाहिर किया.

अधिक जानकारी देते हुए सुरजागड़ पारंपरिक इलाखा गोटुल समिति के प्रतिनिधि सैनु गोटा ने कहा की, एटापल्ली के सुरजागड इलाखे में सुरजागड, बांडे, दमकोंडवाही, मोहंदी, गुडजुर क्षेत्र के साथ-साथ अन्य ११ जगह खदाने प्रस्तावित की गयी है. वर्त्तमान में सुरजागड में लॉयड्स मेटल्स एंड इंजीनियर्स इस कंपनी को लोह खदान का आवंटन किया गया है. इन्ह सभी खनन क्षेत्रो को प्रस्तावित करते वक्त या मंजूरी देते हुए वन संवर्धन कानून १९८०, पर्यावरण अधिनियम १९८६, पेसा कानून १९९६, महाराष्ट्र ग्रामपंचायत अधिनियम १९५९ के प्रकरण ३ अ के कलम ५४, अनुसूचित जमती एवं अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन हक्क मान्यता) अधिनियम २००६, खान एवं खनन अधिनियम और अन्य कानूनन प्रावधानों का उल्लंघन खुद प्रशासन और सरकार द्वारा किया जा रहा है. जो इन खदानों को गैरकानूनी बना देती है। ये खदानें जहां प्रस्तावित हैं या जहां मंजूरी दी गयी है उन्ह जगहों पर हमारे ठाकुरदेव, तल्लोरमुत्ते, माराई सेडो, बंडापेन इन्ह देवतायो के पवित्र पहाड़ और जंगल है, जो कि यहां के स्थानिक आदिवासी एवं अन्य समुदायों की मुख्य सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासते हैं.

इन्हें सभी प्रस्तावित खदानों से लगभग १५,९४६ एकड़ और लगभग ४० हजार एकड़ जंगल-जमीन खदान पूरक कामों के लिए नष्ट किया जायेगा। इससे सिर्फ सुरजागड़ क्षेत्र ही नहीं बल्कि एटापल्ली, भामरागड और अन्य तहसील के ग्रामसभाओं के लोगो का वनों पर आधारित शाश्वत रोजगार प्रभावित और ख़तम हो जायेगा। इन्ही कारणों से प्रस्तावित एवं आवंटित खदानों को ७० गावो के पारंपरिक सुरजागड़ इलाखा गोटुल समिति का पुरजोर विरोध है। और इसीलिए ग्रामसभाओं ने कानूनन ग्रामसभा प्रस्ताव पारित कर एवं निवेदनों द्वारा खदानों को रद्द करने की पक्की भूमिका ली है ये बात उन्होंने पत्रकारों के समक्ष रखी।

सुरजागड़ क्षेत्र की कल्पना आलाम और अन्य उपस्थित जनसमुदाय प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया की, विकास और रोजगार के जुमलो द्वारा लोगो की सहानभूति पाकर राजनैतिक व्यक्ति एवं प्रशासन के अधिकारी सिर्फ दलाली कमाने हेतू पूंजीपतियों को गडचिरोली के बहुमूल्य संसाधन बेच रहे हैं। जनता ने ये मांग रखी की अगर सरकार को स्थानिक युवायों को अगर सचमे रोजगार मुहैया करना है तो गडचिरोली जिल्हे में रिक्त सभी पदों को भरकर रोजगार के अवसर खोले जाये।

उपस्थित प्रनिधियो ने सरकार को इशारा दिया की, आदिवासी जनता के पूजा स्थानों-पवित्र पहाड़ो और शाश्वत रोजगार को बचाने हेतु खनन विरोधी ग्रामसभा प्रस्तावों की तरफ ध्यान देकर तुरंत सभी खदानों के आवंटन रद्द किये जाये। अगर सरकार ऐसा नहीं कराती है तो हम अपने जंगल को, वनों से मिलने वाले रोजगार को, हमारी संस्कृति-हमारे देव और पूजा स्थल बचाने के लिए ऐतिहासिक आन्दोलन खड़ा किया जायेगा ये इशारा स्पष्ट करते हुए सुरजागड़ इलाखा समिति ने “जान देंगे पर पहाड़ नहीं देंगे” की आर पार की लड़ाई का ऐलान किया।

इस पत्रकार परिषद् में खदान के विरोध में उतरे सुरजागड़ इलाके की जनता और पारंपरिक गोटुल समिति के समर्थन में गडचिरोली जिले के अलग अलग क्षेत्रों से आए लोगों ने भी अपनी बात रखी। एटापल्ली तहसील के तोडसा पट्टी के ४० ग्रामसभाओं के तरफ से नंदू मट्टामी, वेनहारा (कसनसुर) क्षेत्र से ६८ ग्रामसभाओँ के तरफ से कोत्तुराम पोटावी, बेज्जुर (भामरागड) पट्टी के १२६ ग्रामसभायो के तरफ से अड़. लालसु नरोटी, झाडापापड़ा इलाके की ४० ग्रामसभाओँ के तरफ से बावसू पावे, खुटगाव इलाके की ६५ ग्रामसभाओं के तरफ से बाजीराव उसेंडी, के साथ साथ कोरची क्षेत्र (९० ग्रामसभाये) और तिपागड़ क्षेत्र (३० ग्रामसभाएं) के प्रतिनिधियों ने प्रस्तावित एवं मंजूर सभी खनन प्रक्रिया का विरोध किया और सुरजागड़ के खनन विरोधी संघर्ष को अपना समर्थन जारी करते हुए सुरजागड़ क्षेत्र की स्थानीय जनता के संघर्ष में पूरा सहयोग देने का ऐलान किया। सुरजागड़ क्षेत्र के साथ साथ अन्य क्षेत्रों से भी ग्रामसभा प्रस्ताव और निवेदन भेजे जायेंगे।

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