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मात्राओं की गलती ने छीना आदिवासियों का हक

मात्राओं की गलती ने छीना आदिवासियों का हक

Posted:2015-05-15 10:00:08 IST   Updated: 2015-05-15 10:00:08 ISTRaipur : Quantities mistake tribesmen snatched right

छत्तीसगढ़ की आधा दर्जन जनजातियां महज मात्राओं की अशुद्धियों की वजह से आजादी के 68 साल बाद भी संविधान में प्रदत्त अधिकारों से वंचित हैं।








रायपुर. छत्तीसगढ़ की आधा दर्जन जनजातियां महज मात्राओं की अशुद्धियों की वजह से आजादी के 68 साल बाद भी संविधान में प्रदत्त अधिकारों से वंचित हैं। हैरत की बात है कि महज कुछ बिंदियों और मात्राओं ने आदिवासियों की एक बड़ी आबादी को अब तक गुलामी के अंधेरे में झोंक रखा है। न तो ये आदिवासी जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ सकते हैं और न ही शिक्षा व नौकरियों में इन्हें कोई आरक्षण मिल सकता है।
यह कहती है सरकार
राज्य के आदिवासी मामलों के मंत्री केदार कश्यप इस चूक को स्वीकारते हुए कहते हैं कि हम केंद्र सरकार से राज्य की उन 6 जनजातियों को मान्यता दिलाने की कोशिश कर रहे हैं, जो भाषाई अशुद्धियों की वजह से अब तक अपने अधिकारों से वंचित हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को पत्र लिखकर केंद्र सरकार से पहल करने को कहा है। छत्तीसगढ़ के आदिम जाति मंत्रालय ने केंद्र के आदिवासी मंत्रालय से विशेष टीम भेजकर सर्वेक्षण कराने की मांग की है।
ये जातियां हैं प्रभावित
मात्राओं की अशुद्धियों के असर का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सरगुजा में एक जाति खैरवार है, जिसे खरवार और खेरवार भी कहा जाता है। खैरवार को तो अनुसूचित जाति का दर्जा मिला है लेकिन खरवार और खेरवार को यह दर्जा नहीं मिला है। यही हाल पठारी और पथारी के बीच का है। सांवरा जाति के साथ भी यही हुआ। अंग्रेजी में इन्हें सन्वारा पढ़ा जाता है। जो अधिसूचना जारी कि गई है उसके हिसाब से परधान, पठारी और पबिया को तो अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है, लेकिन अभिलेखों में जो प्रधान, पथारी या पबिहा नाम से जाने जाते हैं, उन्हें यह अधिकार प्राप्त नहीं है ।
एेसे हुई गड़बड़ी
दरअसल यह सारा किस्सा संविधान में जनजातियों की अधिसूचना से जुड़ा हुआ है। राज्य में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अब तक दो अधिसूचना जारी की गई है। पहली अधिसूचना 1976 में और दूसरी 2000 में जारी की गई। मगर संसद ने उक्त अधिसूचना में बिना छान-बिन किए राज्य के पटवारियों ने जनजातियों के नामों की जो सूची राज्य सरकार को उपलब्ध कराई थी, उसी सूची के हिसाब से जनजातियों के नामों की घोषणा कर दी गई।

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