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ये मेरा इस्लाम नहीं है–:क़ुर्बान अली

Monday, 25 May 2015

ये मेरा इस्लाम नहीं है:क़ुर्बान अली

“कतबनाअला बनीइस्राईलाअन्नहुमनकतालानफसनबिगैरीनफसिनऔ फसादिन फिल अल्र्दे फकअन्नामा कतलन-नासा जमींअन वमा आहयाहा फकअन्नामा आहयाहा अन्नासा जमींअन” (कुरानकी इस आयत का मतलब है कि ‘‘अगर किसी व्यक्ति ने किसी बेगुनाह इंसान को मारा तो मानो पूरी मानवता को मारा और अगरकिसी व्यक्ति ने किसी बेगुनाह इंसान की जान बचाई तो मानो पूरी इंसानियत को

बचाया”।)

इसके अलावा कुरान में खुदकुशी को हराम करार दिया गया है और कहा गया है कि खुदकुशी करना बहुत बड़ा गुनाह है। कुरान कीइन आयतों के बाद ये स्पष्ट हो जाता है कि इस्लाम में दहशतगर्द या आत्मघाती हमलों के
लिए कोई जगह नहीं है और जो लोग जेहाद के नाम पर ऐसा कर रहे हैं वे इस्लाम धर्म और कुरान का सही मायनों में अनुसरण नहींकर रहे हैं। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में आतंकवाद को इस्लामी जेहाद का पर्याय बनाने की कोशिश की जा रही है, कुरान की येव्याख्या करना जरूरी हो जाता है।
 इस संदर्भ में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि पैगम्बर मोहम्मद ने अपने जीवनकाल में कई युद्ध लड़े और उनमें से कई में उन्होंनेखुद शिरकत की और ऐसा करके जेहाद किया। यहां ये बताना जरूरी है कि पैगम्बर मोहम्मद ने उस समय तक स्वयं कोई युद्ध नहींकिया जबतक उनपर युद्ध थोपा नहीं गया। जब वे युद्ध लड़ने की स्थिति में नहीं थे तो उन्होंने हिजरत का रास्ता अपनाया औरमक्का से चुपचाप हिजरत करके मदीना चले गए। जब उनपर युद्ध थोपे गए तो आत्मसुरक्षा के लिए पैगम्बर ने बहादुरी के साथउनका मुकाबला किया लेकिन इन युद्धों के दौरान उनके बहुत ही स्पष्ट नियम, कानून होते थे यानी युद्ध के दौरान बूढ़ों, महिलाओंऔर बच्चों पर हमला नहीं किया जाएगा और अगर वे युद्धबंदी बनाए गए तो उनके साथ अच्छा सलूक किया जाएगा।
इस्लाम में पैगम्बर मोहम्मद के हर कृत्य को सुन्नत कहा जाता है और हर मुसलमान से ये अपेक्षा की जाती है कि वह पैगम्बर कीहर सुन्नत पर अमल करे, और पैगम्बर की इस सुन्नत से भी ये स्पष्ट हो जाता है कि वे किसी निरीह, बेसहारा और मासूम लोगों कीहत्या किए जाने के खिलाफ थे।
अपने जीवनकाल में जब पैगम्बर मोहम्मद ने मक्का फतह किया और वापस उस स्थान पर पहुंचे जो उनका जन्मस्थान था औरजहां से उन्हें बहुत अपमानित करके मक्का छोड़ने पर मजबूर किया गया था, तो मक्का के लोग बहुत डरे, सहमे थे और सोच रहे थेकि पैगम्बर मोहम्मद पता नहीं उनके साथ कैसा सलूक करेंगे लेकिन पैगम्बर साहब ने अपना धार्मिक उपदेश देते हुए मक्का केलोगों से कहा कि उन्हें डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं है और उनके साथ कोई बदसलूकी नहीं की जाएगी।
पैगम्बर मोहम्मद ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में केवल एक बार हज किया और इस अवसर पर अपना अंतिम उपदेश देते हुएइंसानियत और भाईचारे को बढ़ावा देने वाली बातें करते हुए कहा कि इंसान-इंसान में रंग, जाति और अमीर-गरीब के आधार परकोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और सभी इंसान बराबर हैं।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस्लाम में जान का बहुत ऐहतराम किया गया है और किसी भी स्थिति में जान न देने की बात बार-बार दोहराई गई है। साथ ही यह भी कहा गया है कि लोगों जमीन पर फितना दंगा-फसाद ना फैलाओ क्योंकि अल्लाह फितनाफैलाने वालों को पसंद नहीं करता और बार-बार अम्म-शांति को बढ़ावा देने और भाईचारा बढ़ाने की बात कही गई है। 
कुरान में सामाजिक बराबरी को बढ़ावा देने पर भी काफी जोर दिया गया है और बार-बार कहा गया है कि गरीब, यतीम, मिस्कीनऔर बेसहारा लोगों की मदद करो और उन्हें यह अहसास मत होने दो कि उनके पास कुछ नहीं है। कुरान में यहां तक कहा गया है किअपने आसपड़ोस में ये देख लो कि कोई भूखा तो नहीं रह गया है क्योंकि अगर किसी इंसान का पड़ोसी भूखा है तो उसका खानाहराम है। कुरान, इस्लाम और पैगम्बर मोहम्मद के संदेशों के बाद यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है कि आजकल इस्लाम के नामपर जो खून-खराबा, आतंकवाद और नफरत फैलाई जा रही है उसका इस्लाम के सही मायनों से कोई लेनादेना नहीं है और ऐसाकरने वाले सच्चे मुसलमान होने का दावा नहीं कर सकते। ऐसे लोगों की जितनी निंदा की जाए कम है और जरूरत इस बात की हैकि इस्लाम के सही अर्थो ं को लोगों तक पहुंचाया जाए और बताया जाए कि जो लोग जेहाद के नाम पर खून-खराबा कर रहे हैंउनका धर्म से कोई लेनादेना नही है और ऐसा वे या तो अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए कर रहे हैं या अंजाने मे ं उनराजनीतिक षड्यंत्रों का शिकार हो रहे हैं जो दशकों पहले उन्हें फंसाने के लिए रचा गया था। समूचे अरब जगत में तेल निकलने सेपहले पश्चिमी देशों या अमरीका की कोई रूचि नहीं थी लेकिन जब वहां तेल निकलना शुरू हो गया और लगने लगा कि अरब देशबहुत जल्द समृद्ध हो जाएंगे तो उन्हें दुश्चक्र में फंसाने की साजिशें शुरू हो गईं। यह सर्वविदित है कि सत्तर के दशक में जबअफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत रूस की सेनाएं काबिज थीं तो उनके खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए अमरीका ने ऐसे तत्वों कोबढ़ावा दिया जो बाद में तालिबान के रूप में सामने आए। इन लोगों में अलकायदा नामक संगठन का संस्थापक ओसामा बिनलादेन भी था। इसी दौर में ‘‘सभ्यताओं के संघर्ष” की कहानी गढ़ी गई और उसपर किताबें लिखवाई गईं। इस कहानी के जरिएप्रचारित किया गया कि अरब और मुसलमान मानवता के विरोधी हैं और पश्चिमी देशों के साथ उनका कोई तारतम्य नहीं होसकता। जिन लोगों को सोवियत रूस के खिलाफ जेहाद करने के लिए तैयार किया गया था वही लोग बाद में अमरीका और पश्चिमीदेशों के विरोधी के रूप में सामने आए और उसकी परिणति अमरीका और ब्रिटेन समेत कई देशों में हुए आतंकवादी हमलों के रूप मेंहुई और अभी भी यह क्रम रूका नहीं है। इस बीच, इराक में पश्चिमी देशों द्वारा जिस तरह एक झूठे तर्क को आधार बनाकर युद्ध लड़ागया उससे भी तथाकथित मुस्लिम चरमपंथियों को यह कहने का मौका मिला कि पश्चिमी देश मुसलमानों के खिलाफ हैं औरइसलिए उनके खिलाफ की जाने वाली कोई भी कार्रवाई जेहाद है और
बकौल उनके जायज है। यदि अमरीका और पश्चिमी देश सही मायनों में लोकतंत्र के समर्थक हैं तो उन्हें न केवल इराक बल्कि दूसरेअरब देशों में लोकतंत्र कायम करने की बात कहनी चाहिए और इसके लिए अंतर्राष्टंीय जनमत तैयार करना चाहिए लेकिन वे ऐसानहीं करना चाहते क्योंकि अरब देशों की मौजूदा सरकारों को वे अपनी कठपुतली के रूप में इस्तेमाल करते हैं और यदि अरब देशों मेंलोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारें बन गईं तो उन्हें अपनी मनमर्जी के मुताबिक काम करना मुश्किल हो जाएगा।

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