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बाल दिवस: वर्धा विश्वविद्यालय में आंदोलन फ्रंट व प्रगतिशील छात्रों ने किया नेहरू को याद

महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में बाल दिवस के अवसर पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को राष्टीय आंदोलन फ्रंट एवं समस्त प्रगतिशील छात्र छात्राओं द्वारा स्मरण किया गया। मुख्य अतिथि और मुख्य वक्ता के बतौर राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संस्थापक संयोजक डॉ. सौरभ वाजपेयी हमारे बीच थे। विश्वविद्यालय के समाजकार्य विभाग के प्रमुख मनोज कुमार जी की अध्यक्षता में यह कार्यक्रम सम्पन्न किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग के शोधार्थी शुभम जायसवाल के स्वागत वक्तव्य से हुआ, उन्होंने पंडित नेहरू के जन्मदिन पर आयोजित व्याख्यान की मुकम्मल प्रस्तावना रखी।
तत्पश्चात प्रो. वाजपेयी ने नेहरू को याद करते हुए उनकी स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका, विपरीत परिस्थितियों में देश का विकास, राष्ट्र निर्माण के समय साम्प्रदायिकता सेे निडर होकर लड़ने तथा उस समय की राजनीति एकता बनाएं रखने में नेहरू का किस प्रकार का योगदान रहा है, वह सब कहानियों, घटनाओं के वर्णन के जरिये छात्रों के समक्ष रखा। नेहरू के व्यक्तित्व में जनतंत्र का कितना महत्व था, यह उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया, 1937 में जब संभावना थी की वो तीसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए जाएंगे, तो उन्होंनेे चाणक्य के छद्म नाम से मोर्डन टाइम्स में प्रेसिडेंट के नाम पत्र लिखना शुरू कर दिया, उन पत्रों में नेहरू खुद अपनी आलोचना करते थे, अपने तानाशाही हो जाने की संभावनाओं को बताते थे।

इसके अलावा प्रो. वाजपेयी बताते हैं कि नेहरु ने अपनी सोशलिस्ट इंडस्ट्रियल पॉलिसी के तहत भारी मशीनरी से संबंधित कारखानों का निर्माण कराया। जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत हैवी इंडस्ट्री से संबंधित तकनीकी एवं कलपुर्जों के निर्माण में लगभग स्वावलंबी हो गया था। परंतु सन 91-92 के बाद से आने वाली सरकारों द्वारा ऐसी नीतियों को अपनाया गया जिससे आज के दौर में भारी मशीनरी से संबंधित तकनीकी और कलपुर्जों का लगभग 97% भारत आयात करता है।

उन्होंने बताया कि जब भारत आजाद हुआ तब करोड़ों लोग विस्थापित हुए थे ,हर तरफ दंगे हो रहे थे, गरीबी भुखमरी और अकाल की समस्याएं अलग से थी। वैसे दौर में नेहरू ने हिंदुस्तान को खड़ा करने का काम किया। अगर हम वर्तमान परिस्थिति से उन परिस्थितियों की तुलना करें तो हम पाएंगे कि वह परिस्थितियां आज की तुलना में लगभग 1000 गुना अधिक विपरीत और संकटग्रस्त परिस्थितियां थीं।

नेहरू भारतीय राजनीति के प्रोमिथीसियस हैं। जिन्हें आज के भारतीय राजनेता गिद्ध की तरह नोच नोच कर खा रहे हैं।

उन्होंने आगे कहा कि अगर भारत को पाकिस्तान बनने से बचाना है तो हमें अपने दो स्तम्भों को बचाना पड़ेगा पहला लोकतंत्र और दूसरा सेक्युलरिज्म।

उन्होंने नेहरू के शिक्षा क्षेत्र में योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि नेहरू देश के उत्थान के लिए शिक्षा के महत्व को समझते थे इसीलिए उग्र भीड़ जब जामिया को फूंकने जा रही थी तब वे स्वयं अपनी कार चलाते हुए भीड़ के बीच पहुंचे और उन्होंने कहा कि तुम्हें जामिया को जलाने से पहले नेहरू को जलाना होगा। जब नेहरू ऐसा बोल रहे थे तब वह जामिया को नहीं बचा रहे थे बल्कि वह भारत के सेक्युलरिज्म को बचा रहे थे और भारत को पाकिस्तान बनने से बचा रहे थे। आज भी जेएनयू और उसी की तरह अन्य संस्थानों के विद्यार्थी शिक्षा को बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं।

प्रो. वाजपेयी ने वर्तमान सरकार की कुनीति,कुदृष्टि की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये चाहते हैं कि अगर नेहरू द्वारा निर्मित किये गए लोकतांत्रिक संस्थानों को समाप्त करना है तो सबसे पहले नेहरू को मिटाना होगा, इसके लिए उनको जनता के बीच बदनाम करना होगा, मनगढंत इतिहास प्रस्तुत करना होगा। वाट्सअप यूनिवर्सिटी इसी कुनीति का परिणाम है।

प्रो. मनोज कुमार ने अपने व्यक्तव्य में कहा कि किसी की तुलना व्यापक और संपूर्णता में उस समय के उपरांत ही होती है। और नेहरू, गांधी और लोहिया के सपनों के भारत से छात्रों का परिचय करवाया।
मंच संचालन भाषा अभियांत्रिकी से परास्नातक कर रहीं कुनुप्रिया ने किया। धन्यवाद ज्ञापन मानवविज्ञान विभाग के शोधार्थी पलाश किशन ने दिया। और अंत में तुषार और अन्य साथीयों द्वारा एक जनगीत गाकर कार्यक्रम का समापन किया। कार्यक्रम के आयोजन में हिन्दीविश्वविद्यालय के बहुत से छात्रों का योगदान रहा जिनमे चंदन सरोज, तुषार, ऋषभ, अनिल, निखिल, साहिल, राजेश यादव, देशदीपक, शुभम तन्मय, प्रेरित, केशव, कनुप्रिया, आदर्श, देवेंद्र मौर्य, पवन, पीयूषकांत आदि प्रमुख हैं।

Cgbasket.in के लिए चंदन सरोज की रिपोर्ट

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