महिला सम्बन्धी मुद्दे

? 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : वायदा तेरा वायदा : तुहिन देव

8 मार्च 2018

महिलाओं के लिए नरेन्द्र मोदी सरकार ने क्या किया? इसके जवाब में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने संसद में दो सफलताओं का उल्लेख किया है एक-उज्जवला योजना के तहत् खाना पकाने की गैस तथा दूसरा- स्वच्छ भारत योजना के तहत् शौचालय। सरकारी आंकड़ो के अनुसार तीन करोड़ गरीब घरों में गैस प्रदाय किया गया है। इस साल सरकार का लक्ष्य है 8 करोड़ घरों में गैस प्रदाय करना। शौचालय भी काफी बने हैं। 2022 तक सभी घरों में शौचालय हो ऐसा सरकार का लक्ष्य है।

 

मगर, दोनों वायदों में काफी छेद है। गैस सिंलिंडर की कीमत बहुत अधिक है, और मिलता भी काफी देर से है। दोनों कारणों से कई गरीब परिवार में महिलाएं सिलिंडर का कनेक्शन मिलने के बावजूद गैस का उपयोग नहीं करती हैं। शौचालय बहुत जरूरी है तथापि सरकारी आंकड़ो के अनुसार ग्रामीण भारत में आधे से भी अधिक लोगों के खुले में शौच की आदत को बदला नहीं जा सका है। लेकिन केवल योजनाओं की सीमाओं से सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करना सही नहीं होगा। किन योजनाओं पर सरकार ज्यादा जोर देती है विचारणीय मुद्दा वही है। यहां हम देखते हैं कि सरकार रसोई से जुड़ी योजनाओं को ही महिलाओं की उन्नति का मार्ग मानती है। क्योंकि सरकारी प्राथमिकता महिलाओं की जगह, घरेलू कामकाज के इर्दगिर्द है ऐसा इंगित करते हैं। क्या शत प्रतिशत महिलाओं द्वारा खुले में शौच करना बंद कर शौचालय का उपयोग करना महिला सशक्तिकरण का पर्याय है माना जाएगा ? और तो और नवउदारीकरण के तहत जुआड़ी पूंजीवाद की प्रबल पैरोकार भारत सरकार के द्वारा ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का ढोल पीटने के बावजूद कार्य क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी के क्षेत्र में भारत विश्व में अंतिम पंक्ति में है।

उच्च शिक्षा के फैलाव के बावजूद कार्य स्थल में महिलाओं का योगदान बढ़ा नहीं है, कम ही हुआ है। वास्तव में जिन योजनाओं /प्रकल्पों से किशोरियों व युवतियों की सामाजिक जीवन में भागीदारी बढ़ती या उनकी बेहतरी होती वे यहाँ उपेक्षित हैं। सुलभ सैनिटरी नैपकिनों की उपलब्धता की योजना उनमें उल्लेखनीय है। संप्रति एक अध्ययन से पता चला है कि अनियमित आपूर्ति के कारण ही यह योजना असफल हुई है।

 

ग्रामीण क्षेत्रों की मात्र 30 प्रतिशत लड़कियों को ही सैनिटरी नैपकिन मिल पाता है। भारत सरकार के एक से अधिक मंत्रालय इस योजना के अमलीकरण में जुटे हैं मगर किसी ने भी इसे महत्व नहीं दिया। कार्यशील महिलाओं की सुरक्षा की बात भी इसी तरह से उपेक्षित हैं। महिला यात्रियों की सुरक्षा के लिए भारतीय रेल्वे को निर्भया फंड से 500 करोड़ रु दिए गए थे। उस मद से रेल्वे को सी.सी.टी.व्ही कैमरा लगाने और कंट्रोल रूम को मुस्तैद करना था। लेकिन इस मद में मात्र 10 प्रतिशत ही खर्च हुआ है।महिलाओं के विरूद्ध होने वाले साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए आंबटित पैसों का आधा भी खर्च नहीं हो पाया है। गृहमंत्रालय ने महिलाओं के विरूद्ध होने वाले अपराधों की जांच के लिए एक अलग विभाग बनाया था। उसके लिए तीन सौ करोड़ रुपए आंबटित किए गए थे। लेकिन आंबटित राशि के खर्च न होने के कारण विभाग को विलोपित कर दिया गया। निर्भया फंड की राशि न तो संप्रग सरकार खर्च कर पाई और नहीं वर्तमान भाजपानीत रा ज ग सरकार सदुपयोग कर पाई।

यह बात इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि केन्द्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा आयोजित 46 वें राष्ट्रीय श्रमिक सम्मलेन का उद्घाटन स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। जिस सम्मेलन में श्रमिकों की 3 मांग सर्वसम्मति से पारित की गई थी।

 

एक – न्यूनतम मजदूरी की दर तय करने के लिए पारदर्शी पद्धति प्रयुक्त होगी। दो – संविदा नियुक्ति वाले श्रमिकों को समान काम के लिए नियमित कर्मचारियों के समान वेतन देना पड़ेगा। और तीसरा- आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व विभिन्न सरकारी योजनाओं में कार्यरत अन्य कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन देना पड़ेगा और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था करनी होगी। लगातार 4 राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में यही मांगे उठी हैं। लेकिन प्रधानमंत्री जिस श्रम सम्मेलन में उपस्थित थे और उन्होंने जिसका उद्घाटन किया उसी सम्मेलन में पारित सिफारिशों को केंद्र सरकार नहीं मान रही है। इसलिए 47 वें राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में जिसका आयोजन केन्द्रीय श्रम व रोजगार मंत्रालय कर रही है का बहिष्कार देश के प्रमुख 12 श्रमिक संगठनों ने किया है। उनका कहना है कि यह सम्मेलन एक प्रहसन है क्योंकि यह सरकार, श्रमिक कर्मचारी विरोधी है। केंद्र सरकार द्वारा इस वर्ष की आर्थिक समीक्षा में कार्यक्षेत्र में महिलाओं के योगदान पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। लेकिन बजट में इसकी छाप नहीं दिखती। ‘’स्किल इंडिया या मेक इन इंडिया’’ कोई भी केंद्रीय योजना रोजगार नहीं बढ़ा सकी है।

 

मजदूरों के आक्रोश का यही कारण है।
प्रत्येक बजट में केंद्र सरकार ऐसी ही खोखले वादे करते आ रही है। महिलाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार पैदा करने के उद्देश्य से महिला बैंक की शुरुआत हुई। फिर खत्म भी कर दी गई। क्योंकि कुछ काम नहीं हुआ। भविष्य निधि में महिला कर्मचारियों के लिए देय राशि में मिली कुछ छुट को लेकर ढाकढोल पीटकर भीषण प्रचार किया जा रहा है। लेकिन 100 दिन के काम की योजना में भी आबंटन पिछले वर्ष की तरह ही है कुछ भी नहीं बढ़ा है।पर इस पर बात नही हो रही है। जबकि इस योजना में 56 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं। गरीब महिलाओं के लिए यह योजना एक राहत प्रदान करने वाली योजना साबित हुई है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के आबंटन में भी कटौती हुई है। आंगनबाड़ी योजना में नाम मात्र बढ़ोतरी हुई है।

 

ग्रामीण भारत में आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता /सहायिका आदि प्रशिक्षित, कार्यरत महिलाएं ही तो समाज कल्याणकारी योजनाओं को घर-घर पहुंचाती हैं। तो इनके प्रति निर्दयता प्रदर्शित करके क्या भारत सरकार, भारतीय महिलाओं को कुशल गृहिणी, पतिपरायण / कर्तव्यपरायण सुशील पत्नी या बहु तथा वेदों /पुराणों में वर्णित आदर्श नारी के रूप में प्रस्तुत करना चाह रही है? भारत सरकार, जेंडर संवेदनहीन योजनाओं में पैसे डालकर कैसा जेंडर संवेदी समाज बनाना चाहती है। या क्या वास्तव में सबका साथ, सबका विकास उसकी मंशा है?

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तुहिन देव 

लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं .रायपुर छतीसगढ 

 

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