कला साहित्य एवं संस्कृति

4 . मसाला चाय में आज सुनिए शरद की व्यंग्य रचना “अतिथि तुम कब जाओगे” वाणी अनुज .


रचना के कुछ अंश इस तरह हैं :-
तुम जिस सोफ़े पर टांगें पसारे बैठे हो, उसके ठीक सामने एक कैलेंडर लगा है, जिसकी फड़फड़ाती तारीख़ें मैं तुम्हें रोज़ दिखा कर बदल रहा हूं. जिस दिन तुम आए थे, कहीं अंदर ही अंदर मेरा बटुआ कांप उठा था. मैंने पहली बार जाना कि अतिथि केवल देवता नहीं होता. वह मनुष्य और कई बार राक्षस भी हो सकता है.  यह देख मेरी पत्नी की आंखें बड़ी-बड़ी हो गईं. तुम शायद नहीं जानते कि पत्नी की आंखें जब बड़ी-बड़ी होती हैं, मेरा दिल छोटा-छोटा होने लगता है.  मैं जानता हूं कि तुम्हें मेरे घर में अच्छा लग रहा है. सबको दूसरों के घर में अच्छा लगता है. यदि लोगों का बस चलता तो वे किसी और के घर में रहते. किसी दूसरे की पत्नी से विवाह करते. मगर घर को सुंदर और होम को स्वीट होम इसीलिए कहा गया है कि मेहमान अपने घर वापिस लौट जाएं.  मेरी रातों को अपने खर्राटों से गुंजाने के बाद अब चले जाओ मेरे दोस्त! देखो, शराफ़त की भी एक सीमा होती है और गेट आउट भी एक वाक्य है जो बोला जा सकता है.

अनुज श्रीवास्तव ने मुबंई में.मसाला चाय की श्रंखला प्रारंभ की थी जिसमें वे देश के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार ,कवि और लेखकों की कहानी, कविता का पाठ करते है.यह श्रंखला बहुत लोकप्रिय हुई ,करीब 50,60 एपीसोड. जारी किये गये. सीजीबास्केट और यूट्यूब चैनल पर क्रमशः जारी कर रहे हैं. हमें भरोसा है कि अनुज की लयबद्धत आवाज़ में आपको अपने प्रिय लेखकों की कहानी कविताएं जरूर पसंद आयेंगी.

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