अभिव्यक्ति आंदोलन मानव अधिकार शासकीय दमन

23 से 25 नवम्बर तक उड़ीसा में जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय

आज़ादी, लोकतंत्र और संविधान की हिफ़ाज़त के लिए जन आंदोलनों की अपील

आज हमारा मुल्क ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक – सामाजिक – आर्थिक – सांस्कृतिक – वैचारिक संकट का सामना कर रहा है। देश के धर्मनिर्पेक्ष चरित्र को बदलने का काम सत्ता और उससे जुड़े संगठन बेखौफ-बेलगाम होकर कर रहे हैं। ज़बरदस्त आर्थिक मंदी है। बेरोजगारी बेलगाम है। बढ़ती महॅंगाई का असर हम सब की रोजमर्रा की ज़िंदगी पर साफ़ दिखाई दे रहा है। समाज में हिंसा लगातार बढ़ रही है। भीड़ तंत्र द्वारा हमले आम बात होती जा रही है। महिलाओं पर हिंसा की हर रोज़ एक से बढ़कर एक घटना सामने आ रही है। इन घटनाओं में समाज के सबसे ताकतवर माने जाने वाले लोग शामिल दिख रहे हैं और उन्हें बचाने को सत्ता उतावली नजर आ रही है।

वंचितों, ख़ासतौर पर दलितों- आदिवासियों – मुसलमानों- ईसाइयों पर अलग-अलग रूपों में हमले हो रहे हैं। एक खास तरह के विचार और एक पार्टी की सोच और कर्म को ही देश की आवाज़ बनाने की कोशिश हो रही है। सांप्रदायिक ताकतों द्वारा हिंसक हिंदू राष्ट्र को स्थापित करने की ललक तेजी से देश पर लादी जा रही है। मौजूदा सरकारों की राय और फ़ैसले से इतर राय रखने वालों को राष्ट्र से द्रोह के दायरे में रखा जा रहा है। इनसे सहमत न होने वाली हर आवाज़ को बदनाम करने, उनका मज़ाक उड़ाने और चुप कराने की संगठित कोशिश हो रही है। ऐसे लोगों/ समूहों के लिए ‘अर्बन नक्सल’, ‘देशद्रोही’, ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ जैसे शब्दों को आम प्रचारित कर, लोगों के जेहन में डाला जा रहा है। मानवाधिकार संगठनों/कार्यकर्ताओं पर खास करके हमले तेजी से बड़े हैं। जनवरी 2018 में भीमा कोरेगांव, पुणे में दलितों पर हुई हिंसा के सन्दर्भ में, देश के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ताओं/वकीलों को साल भर से ज़्यादा जेल में रखा गया है।

विभिन्न तरीकों से जन आंदोलनों का भी दम घोंटा जा रहा है। ताज़ा उदाहरण नर्मदा घाटी में जिंदगी की जद्दोजेहद कर रहे हज़ारों लोगों को जबरन डुबाये जाने का है। एक ओर दशकों के संघर्ष से हासिल सूचना का अधिकार कानून, श्रम कानून, भू-अर्जन और पुनर्वास कानून, पर्यावरण अधिनियम आदि प्रगतिशील कानूनों को कमज़ोर किया जा रहा है और वहीं दूसरी और UAPA, NIA जैसे दमनकारी या तीन तलाक़ जैसे असंवैधानिक कानूनों को पारित किया जा रहा है| संसदीय प्रक्रियां पूरी तरीके से कमज़ोर की जा रही हैं | न्याय व्यवस्था और न्यायपालिका की स्वतंत्र भूमिका भी चिंता का विषय बन गया है |

आज़ादी के बाद बनने वाले भारत की बुनियाद पर सीधे और छिपे दोनों तरीके से हमले हो रहे हैं। भारत की वैचारिक बुनियाद यानी संविधान के मूल्यों की लगातार बेकद्री हो रही है। एक-एक कर उसके उन मूल्यों को खोखला किया जा रहा है, जिनकी वजह से हमारा देश हर मामले में विभिन्नताओं में एकता वाला देश माना जाता रहा है और हम जिन पर फ़ख़्र महसूस करते रहे हैं। देश से मोहब्बत के नाम पर बर्बर मर्दानगी वाला राष्ट्रवाद हम पर थोपा जा रहा है। यही नहीं, आज़ादी से हमें जिन चीज़ों की आज़ादी बतौर नागरिक मिली, आज उन सबको ख़त्म करने और हम सबको एक निगरानी के दायरे में रखने की कोशिश हो रही है। खान-पान, काम, नाम, लिबास, रंग-रूप, नारे … बर्बर मर्दानगी वाले समूहों/ संगठनों की तरफ़ से इन सबके आधार पर हम सबकी देशभक्ति तय करने का यहाँ-वहाँ काम शुरू हो जाता है। हिंसक गतिविधियों में शामिल ऐसे लोगों को हर जगह छूट है- चाहे वह साइबर दुनिया हो या असल दुनिया। हर मुद्दे पर बातचीत, मज़हबी बहस में बदल दी जाती है।

जबकि जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के इलाके हमेशा से राज्य दमन का केंद्र रहे है, आज के दौर में वहाँ के लोग पूरी तरीके से वर्त्तमान सरकार के तानाशाही के निशाने बन चुके है| एक तरफ बड़ी संख्या में असम में निवासरत गरीब लोग NRC सूची से अपने आप को बाहर पाकर, अन्धकार में जी रहे हैं, वहीं दूसरे ओर भाजपा इस पूरी प्रक्रिया को अपनी राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रही है और ‘नागरिकता संशोधन विधेयक’ जैसे असंवैधानिक पहल के द्वारा, धर्म के नाम पर नागरिकता तय करने पे तुली है|

जैसे ही हम इन सवालों की तरफ ध्यान देते है, इतने में हमारे सामने दो टुकड़ों में बँटा जम्मू-कश्मीर नज़र आता है। 70 सालों की विशेष इतिहास को नज़रअंदाज़ करते हुए, एक पूरे राज्य की अस्तित्व मिटाकर, लाखों लोगों को 2 महीनों से ज़्यादा बंधक बनाकर, धोखाधड़ी के साथ अनुच्छेद 370 को समाप्त करना और ‘कश्मीरियों को अपना औकात बताना’, अपना गौरव का प्रतीक मान रही है यह सरकार| जब दूर-दूर तक कश्मीर में कोई राहत की राह नहीं दिख रही है, लगता है कि अब अगला निशाना ‘नागा इलाकों’ और ‘नागा लोगों’ पर है| अगर 22 सालों की ‘संघर्ष-विराम’ समाप्त होकर फिर से वहाँ हिंसा बढ़ेगी तो इसके लिए भाजपा की बेईमान राजनीतिक रवैय्या ही ज़िम्मेदार होगी |

आर्थिकी की गिरावट इस स्तर पर है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार रिजर्व बैंक से उसके अपने रिजर्व में से पैसा निकाला गया है, जिससे कारपोरेट जगत को टैक्सों में भारी छूट दी गई। चरमराई बैंकिंग व्यवस्था को लोगों पर अनेक कर लगाकर संभालने की नाकाम कोशिश हो रही है। आम लोग अपना पैसा सरकार से कैसे बचाएं यह प्रश्न सामने आ गया है। पहले ही भारी जीएसटी का मारा उद्योग जगत और भी चरमरा रहा है। दूसरी तरफ श्रम कानूनों को कमजोर किया गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण की हिमायत करने वाली सरकार, पर्यावरण कानूनों को कमजोर करते-करते पर्यावरण संरक्षण संस्थाओं को भी कमजोर कर रही है।

ऐसे ही माहौल में जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय यानी एन.ए.पी.एम अपना 25 साल पूरा कर रहा है। एन.ए.पी.एम, जैसा कि हम जानते हैं, लोगों की ज़िंदगी से जुड़े मुद्दों पर जद्दोजेहद करने वाली ढेर सारी आवाज़ों का साझा मंच रहा है। इसमें अलगअलग प्रगतिशील राजनीतिक विचार वाले, लेकिन धर्मनिरपेक्ष, जन पक्षधर लोग और संगठन शामिल रहे हैं। जन आंदोलनों का व्यापक मंच होने के साथ – साथ, समन्वय, संघर्ष और निर्माण की एक बड़ी प्रक्रिया भी है। आदिवासी क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों तक, बच्चों के स्कूली-शिक्षा, खेती-किसानी में लाभप्रद प्राकृतिक खेती के प्रयोग, युवाओं के बीच रचनात्मक कार्य, बिजली की कमी की पोल खोल करते हुए उर्जा के विकल्पों को सामने लाने वाले साथी, बाढ़ और सूखा दोनों की आपसी संबंध को दिखाते हुए न केवल अध्ययन बल्कि तलाब की मुहिम खड़ी करने वाले साथी संगठन समन्वय का हिस्सा है|

गांधी की विकेन्द्रित ग्राम व्यवस्था पर रचनात्मक कार्य करने वाली संगठन के साथ, मार्क्स की सोच को आगे बढ़ाते हुए, मजदूरों के हाथ मे प्रबंधन व मालिकी का हक़ का संघर्ष, अम्बेडकर के जाति-निर्मूलन विचार से जुड़कर, दलितों – वंचितों को सामंतवाद के खिलाफ संगठित करने वाले साथी, भगत सिंह के सामाजिक न्याय के मूल्यों में विश्वास रखने वाले साथी, पेरियार के समता और तर्क-आधारित समाज के लिए संघर्षरत साथी समन्वय में कार्यरत हैं। इसकी साथ ही शांति-सौहार्द पर देश भर में अलख जगाने वाले संगठन भी समन्वय का मजबूत आधार हैं। समन्वय के विकास की अवधारणा में देश का अंतिम व्यक्ति पहले है। दलित, आदिवासी, मजदूर, किसान, महिला व अन्य लिंग समान अधिकार रखते हैं। समन्वय, संविधान में विश्वास रखते हुए, समता-सादगी-स्वावलंबन एवं न्याय-भेदभाव रहित समाज के मूल्यों को मानते हुए जल-जंगल-जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर वैश्वीकरण के तहत कब्जे को नकारता है।

पिछले 25 वर्षों में हमने एक साथ आकर अनेक सफल लड़ाइयां लड़ी है। भूमि अधिग्रहण कानून का सवाल हो, जंगल कानून का सवाल हो, खेती किसानी के सवाल हो, बड़े बांध, मेट्रो से उजाड़, औद्योगिक कॉरिडोर आदि से जुड़े खासकर के विस्थापन जैसे भयानक मुद्दे पर भी। समन्वय से जुड़े तमाम संघर्ष और निर्माण के साथी व संगठन साथ आकर और दूसरे समविचारी संगठन-समूह का भी सहयोग लेते हुए – करते हुए, अनेक मुद्दों पर सफलता प्राप्त की है। राजनैतिक दलों तक को अपने एजेंडे में इन सवालों को रखना पड़ा है। हम रुके नहीं है। हमारे संघर्ष चालू हैं। इसीलिए हमारे संघर्षों का पुरजोर नारा है: लड़े हैं-जीते हैं। लड़ेंगे-जीतेंगे।

हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के खतरे को समझते हैं और दक्षिण एशिया के स्तर पर इससे जूझने के लिए गठित नागरिक समूह का हिस्सा भी है । हिमालय के समाप्त हो रहे ग्लेशियरों से लेकर अमेजॉन जंगलों की आग या फिर मुंबई में ‘आरे’ जंगल की कटाई, हमारे आन्दोलनो की चिंता के विषय रहे हैं। इस महत्ती कार्य में लगे ऐसे अनेक साथी समन्वय के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। आज देश के सामने खासकर जल – जंगल – जमीन – खनिज- तटीय सम्पदा – आजीविका के मसले पर लड़ने वाले आंदोलनों को संविधान पर हमले की चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में जरूरत है कि हम समन्वय के रिश्ते अन्य नेटवर्कों के साथ भी मजबूत करें और एक साथ आकर इस चुनौती का सामना करें।

जहाँ हम इस तथ्य को भी स्वीकार करते हैं कि पिछले कई वर्षों में, देश भर में लाखों मज़दूर, आदिवासी, दलित, महिला, ट्रांस साथी, छात्र, अल्पसंख्यक, मछुआरे, किसान, शिक्षक, आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ता, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी और कई अन्य लोग वर्तमान शासन की दमनकारी नीतियों और राजनीति के खिलाफ लड़े हैं, वहीं अभी भी हमारे संविधान की रक्षा के साथ-साथ बुनियादी मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए, कई स्तरों पर और विभिन्न रूपों में, सामूहिक आयोजन की आवश्यकता है।

न्याय और लोकतंत्र की सामूहिक संघर्ष- निर्माण यात्रा के 25 चुनौतीपूर्ण और महत्त्वपूर्ण साल पूरे करते हुए, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय अपने 12वें द्विवार्षिक अधिवेशन के लिए आपको निमंत्रित कर रहा है!  राष्ट्रीय अधिवेशन पुरी, ओडिशा में 23 से 25 नवंबर, 2019 को आयोजित होगा। देश के मौजूदा माहौल ने जो ऐतिहासिक चुनौती पेश की है, उनसे हम मुँह नहीं मोड़ सकता है। इसीलिए हम एन.ए.पी.एम के इस अधिवेशन को देश के सामने मौजूद चुनौतियों से मुक़ाबला करने की तैयारी के लिए विचारविमर्श का मौ़क़ा बनाना चाहते हैं।

एन.ए.पी.एम ने हमेशा से विभिन्न प्रगतिशील विचारधाराओं और विषयों पर कार्यरत साथियों – समूहों को साथ लाने की प्रयास की है | आज के दौर में ऐसे प्रयासों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हैं ताकि हम अपने छोटे-छोटे मतभेदों को फिलहाल परे रख दें। यह वक़्त उन मतभेदों को दीवार की तरह साथ लेकर चलने का नहीं है। अगर हमें आज़ादी से प्यार है, संविधान के मूल्यों, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की व्यवस्था में यक़ीन है तो हमारे पास इकट्ठा एक आवाज़ बनने की ढेर सारी वजह है। क्योंकि हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती तो इन्हीं मूल्यों की हिफ़ाज़त की है। आज़ादी बचाने की है। 23-25 नवंबर 2019 को डूडवावाला धरमशाला, ग्रैंड रोड, जगन्नाथ मंदिर के पास, पुरी, उड़ीसा में सम्मेलन की शुरुआत सांस्कृतिक आंदोलन की पहचान “जन गीतों” के साथ होगी। देश के हालात पर चर्चा, उसमें जनआंदोलनो की भूमिका, नई ऐतिहासिक चुनौती का सामना कैसे हो, इस पर रणनीति और भविष्य का कार्यक्रम बनाएंगे।

इसीलिए हम एन.ए.पी.एम के इस अधिवेशन के मौके पर देश के अलग-अलग हिस्सों में इज़्जत वाली ज़िंदगी-जल-जंगल-जमीन के लिए संघर्षरत हज़ारों लोगों की तरफ़ से सभी जनपक्षधर आवाज़ों से पुरज़ोर अपील कर रहे हैं ! आइये और अपने साथ अपने आंदोलन के इतिहास, संघर्ष की कहानियां, किताबे, बैनर, पर्चे, फिल्में लाइये। यह एक समागम होगा विभिन्न विचारधाराओं के साथ संविधान में विश्वास रखने वाली सभी आंदोलन साथियों/संगठनों/ समूहों का।

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (संयोजन समिति)
संपर्क दिल्ली : 7337478993 | 9718479517 | संपर्क उड़ीसा : 7008619254 | 7325998210 ईमेल: napmindia@gmail.com

व्यवस्था सम्बन्धी नोट
कृपया अपने भागीदारी की सूचना हमे व्हाट्सप या ईमेल के द्वारा जल्द भेजें, जिसमें आप आपका नाम, आपके संगठन/काम के बारे में संक्षिप्त जानकारी और आपकी यात्रा का विवरण हो, ताकि हम स्थानीय स्तर पर उचित व्यवस्था कर सकें। 

दिशा निर्देश:-
रेल से आने वाले साथियों के लिए: पुरी रेलवे स्टेशन से डूडवावाला धर्मशाला की दूरी 2.5 कि.मी हैं| आप साइकिल रिक्शा या ऑटो रिक्शा करके धर्मशाला तक पहुँच सकते हैं|
हवाई जहाज से आने वाले साथियों के लिए: भुवनेश्वर के बिजु पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से डूडवावाला धरमशाला की दूरी 60 कि.मी हैं| आप बस या प्रीपेड टैक्सी के माध्यम से सम्मलेन स्थल पर पहुँच सकते हैं| बस से आने के लिए आपको हवाईअड्डे से मास्टर कैंटीन स्क्वायर बस डिपो के लिए सिटी बस मिल जाएगी | वहां से पुरी बस स्टैंड के लिए सीधी बस मिलती है| पूरी बस स्टैंड से डूडवावाला धरमशाला की दूरी 1.5 कि.मी है, जिसे साइकिल रिक्शा या ऑटो रिक्शा के माध्यम से पूरा किया जा सकता है|

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