शिक्षा-स्वास्थय

22.पाखण्ड की समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए ? संदर्भ डा. नरेन्द्र दाभोलकर .

अनेक लोगों का तर्क होता है कि बाबा लोग भले ही प्राखंड रचें परंतु प्राप्त धन से वे अस्पताल , शिक्षण संस्था के निर्माण जैन समाजोपयोगी कार्य भी करते डॉ . नरेन्द्र दाभोलकर का मानना है कि बाबा लोग पाखंड अधिक करते हैं , काम के लिए , सत्य साई बाबा ने बड़े पैमाने पर अस्पताल बना पानी के कएँ खुदवाए , अच्छे शिक्षा संस्थान स्थापित किए – इसके लिए चार सी को रूपये खर्च किए परंतु उनकी मृत्यु के वक्त घोषित हुआ कि उनकी कुल जमा सम्पन्न चालीस हजार करोड़ की थी । सोचने की बात है कि जिसे चालीस हजार करोड़ 5 हजार गुना रूपये प्राप्त होते हैं और वह उसकी सिर्फ एक प्रतिशत रकम सामाजिक कार्य खर्च करता है तो इसमें कितना सयानापन है ।

आपको भी अगर एक करोड़ रूपये मिलते हैं तो आप लोग भी उसे बैंक में नहीं रखेंगे । आप सोचेंगे कि लोगों की नजर में आ जाएगा इसलिए एक – दो लाख रूपये का कुछ कर देते हैं । शेष राशि अपने लिए खर्च करते । दूसरी बात , ये सभी बाबा लोग जो सामाजिक कार्य करते हैं , स्कूल – अस्पताल खोलते , पेयजल की व्यवस्था करवाते हैं , इनकी तुलना में हजारों गुना ज़्यादा काम किसी भी राज्य का शासन करता है । आप कहेंगे , क्या वह हम पर उपकार करता है ? तो हमारा ही पैसा होता है । मेरा सवाल यह है कि फिर बाबा लोग भी किसके पैसे से करते हैं ? आप उस सरकार को पाँच साल बाद तो पूछ ही सकते हैं जिसे आपने वोट दिया था ! उनसे कह सकते हैं कि , ” आपने जब पर्याप्त काम नहीं किया है , तो अब हम आपको सत्ता से हटा देंगे , नई सरकार बिठा देंगे । ”

मगर क्या बाबा सवाल करते हैं ? इसका मतलब यह कि , उससे हज़ार गुना ज़्यादा काम करने वाली सरकार की तो आप समीक्षा करते हैं परंतु बाबा की समीक्षा । करने आपकी जुबान तालु से चिपक जाती है । इसीलिए उनके द्वारा किये गये काम उनके द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से आपको गुलाम बनाए रखने का साधन हैं । ‘ इस व्यापक परिप्रेक्ष्य पर ध्यान दिया जाना जरूरी है तथा उनके द्वारा रचे गये पाखंड की समीक्षा करना । ज़रूरी है । समीक्षा से वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है । समीक्षा कारण – कार्य संबंधों पर आधारित होनी चाहिए ।

**

प्रारंभिक वक्तव्य .

इप्टा रायगढ ने बहुत ही समसामयिक पुस्तक प्रकाशित की धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर. जिसका संयोजन जानी मानी रंगकर्म उषा आठले वैरागकर ने किया है .

मुझे यह पुस्तक कपूर वासनिक जी के माध्यम से मिली ,वो बिलासपुर में हम सभी को पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे है . नरेन्द्र दाभोलकर की अब और ज्यादा जरूरत भारत की मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में प्रायः धर्म और जाति के सवालों पर चर्चा कम मिलती है । धर्म और जातियों का विभेद दूर हुए बिना समाज – परिवर्तन या व्यवस्था – परिवर्तन नहीं हो सकता , भारतीय परिप्रेक्ष्य में अब इस पर विचार करने की पहल हो चुकी है और कुछ क्षेत्रों में इस दिशा में आंदोलन की नींव भी पड़ गई है । जाति – उन्मूलन की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं । भारत का समाज सिर्फ वर्गाधारित समाज नहीं है । उसमें धर्म – सम्प्रदाय जाति – उपजातियों की अनेक दृश्य – अदृश्य दीवारें खड़ी हैं । इनकी जड़े भी बहुत गहरी हैं । इसलिए इस वास्तविक परिस्थिति से जमीनी स्तर पर जूझते हुए ही वामपंथी आंदोलन आगे नए रास्ते खोज पाएगा ।

जब 2015 में नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई , उस समय से ही यह सवाल करेद रहा था कि अंध श्रद्धा निर्मुलन का काम क्या वाकई इतना अधिक अवरोधक है कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी । इस बीच रावसाहेब कसले की किताब भक्ति और धम्म का अनुवाद करते हुए मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि समूचे विश्व में ही धर्म नामक संस्था का कितना जबर्दस्त प्रभाव मध्य युग से रहा है और आज उसकी जड़े और भी फैलकर अपना रूप बदल चुकी हैं । अब धर्म की राजनीति शुरू हो गई है । ऐसे समय में धर्म की प्रचलित धारणाओं के प्रति अपनी सैद्धांतिकी पर हमें पुनर्विचार करना ही होगा । यूट्यूब पर नरेन्द्र दाभोलकर से पचीस सवालों का एक धारावाहिक , लघु जवाबों के रूप में ( हर्षल जाधव संपादित ) जब मैंने मराठी में सुना तो मुझे लगा कि उनकी अधिकांश किताबों का हिंदी अनुवाद हो चुकने के बावजूद इस सीरीज के छोटे – छोटे सवाल – जवाबों के आधार पर पुनर्विचार के लिए बिंदु प्रस्तुत किये जाने चाहिए .

उषा आठले .

सभी चित्र आजतक टीवी के सहयोग से आभार सहित

Related posts

CRPF के जवानों पर डेंगू का डंक, कोंटा में मिले 17 मरीज, स्वास्थ्य विभाग ने राजधानी से भेजी टीम

Anuj Shrivastava

चोरों ने तोड़े आठ मंदिरों के ताले ,चुरायी भगवान की आंखें,वस्त्र और घंटी.

News Desk

इंदौर की सफाईकर्मी ने सोना गिरवी रख बेटी को पढ़ाया, अब उसे 1 करोड़ की स्कॉलरशिप मिली, अब जायेगी विदेश पढने.

News Desk