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21 . ईश्वर और धर्म के बारे में , संदर्भ डा. नरेन्द्र दाभोलकर

डॉ . दाभोलकर का मानना है कि अगर देश के संविधान ने व्यक्ति को ईश्वर और धर्म – पालन की स्वतंत्रता दी है तो मुझे यह कहने का अधिकार नहीं है कि ईश्वर और धर्म को त्यागने के बाद ही दे में अंधश्रद्धा निर्मूलन हो सकता है । दूसरी मजेदार बात यह है कि जो भी आकर असे कहता है कि ईश्वर और धर्म को त्यागने के बाद अंधश्रद्धा निर्मूलन हो सकता है , वह यह कहता है कि उसके धर्म के अलावा अन्य सभी धर्म अंधविश्वास पैदा करते है , सिर्फ उसका धर्म अंधश्रद्धा हटाने वाला है ।

इस पृष्ठभूमि पर हम क्या करते हैं , कृपया इस पर ध्यान दें । अंधश्रद्धा के बहुत लम्बे रास्ते पर ईश्वर और धर्म के जो बड़े – बड़े मंदिर है । हम उनका विरोध नहीं करते । हम बस यह कहते हैं कि आप जिस रास्ते पर चल रहे हैं । उस में अनेक गड्ढे हैं , अंधश्रद्धा और धर्मश्रद्धा के नाम के अनेक काँटे बिछे हैं , अनेक खंखार जानवर है , अनेक बड़े पत्थर हैं । अगर आप मुझसे कहें कि यह रास्ता साफ कर । दीजिए तो मैं यही कहता है कि मैं तो इतने पत्थर नहीं हटा सकता , गड्ढे नहीं भर सकता , खुखार जानवरों को नियंत्रित नहीं कर सकता । मगर मैं इतना कर सकता हैं कि आपके हाथ में एक छोटा – सा धर्म – समीक्षा का टॉर्च देता है ।

आप जिस रास्ते से जाने वाले हैं । उसके बॉई ओर मंदिर है , वहाँ ईश्वर के पास आपको जाना है या नहीं , यह आप पर है । मगर गड्ढे में मत गिरिये , खूखार जानवर के प्रति सावधान रहिए पैरों में काँटे न चभने । पाएँ , यह देखिए । पत्थर से टकराकर घायल मत होइये । इसके बाद भी अगर आप ये कहें कि इस गड्ढे में ही मुझे ईश्वर की मूर्ति का दर्शन होने वाला है या गुप्त धन मिलन वाला है – तो गड्ढे में गिरकर अपनी टाँग तुड़वा लेने का आपको पूरा अधिकार है । इस पर हम कुछ नहीं कहना चाहते । डॉ . नरेन्द्र दाभोलकर स्पष्ट करते हैं – अंतिम बात तो यह है कि , संविधान ने सबको स्वतंत्रता दी हैं । सभी धर्मों पर एक बात लागू होती है कि उनमें एकवाक्यता होती है । इसीलिए उनमें एक ताकत होती हैं ।

धर्म में चार चीजें होती हैं

  • शोषण
  • पुरोहितवाद
  • दर्शन
  • नीति
  • धर्म में सबसे बड़ी बात यह होती है कि धर्म विश्वास दिलाना चाहता है कि अंतिम विजय मंगल की ही होगी । हममें से हरेक व्यक्ति चाहता है कि अंतिम विजय मंगल की ही हो । धर्म वह शक्ति प्रदान करता है । अगर धर्म किसी को वह शक्ति प्रदान | करता है तो कुछ नहीं कहा जा सकता । जैसाकि संत तुकाराम ने कहा था , ‘ जेसि रंजले गांजले , त्यासि म्हणावे आपुले । तोच साधु ओळखावा , देव तेथेचि जाणावा । ” अर्थात , ‘ जो लोग दीन – हीन , शोषित – पीड़ित हैं , उन्हें अपनाना ज़रूरी है । जो लोग दुखियों को | अपना मानकर उनके साथ मानवोचित व्यवहार करते हैं , वे ही सच्चे साधु होते हैं , उनमें ही ईश्वर बसता है । तो इसतरह की बातें करने वाले तुकाराम से मैं क्यों झगड़ें ? मुझे अंधश्रद्धा निर्मूलन करना है , धर्म – निर्मूलन नहीं ।
  • यहाँ उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि | वे धर्म का विरोध नहीं करते , बल्कि धर्म की आड़ में अंधश्रद्धा फैलाकर अपना धंधा चमकाने वालों का विरोध करते हैं

प्रारंभिक वक्तव्य .

इप्टा रायगढ ने बहुत ही समसामयिक पुस्तक प्रकाशित की धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर. जिसका संयोजन जानी मानी रंगकर्म उषा आठले वैरागकर ने किया है .

मुझे यह पुस्तक कपूर वासनिक जी के माध्यम से मिली ,वो बिलासपुर में हम सभी को पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे है . नरेन्द्र दाभोलकर की अब और ज्यादा जरूरत भारत की मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में प्रायः धर्म और जाति के सवालों पर चर्चा कम मिलती है । धर्म और जातियों का विभेद दूर हुए बिना समाज – परिवर्तन या व्यवस्था – परिवर्तन नहीं हो सकता , भारतीय परिप्रेक्ष्य में अब इस पर विचार करने की पहल हो चुकी है और कुछ क्षेत्रों में इस दिशा में आंदोलन की नींव भी पड़ गई है । जाति – उन्मूलन की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं । भारत का समाज सिर्फ वर्गाधारित समाज नहीं है । उसमें धर्म – सम्प्रदाय जाति – उपजातियों की अनेक दृश्य – अदृश्य दीवारें खड़ी हैं । इनकी जड़े भी बहुत गहरी हैं । इसलिए इस वास्तविक परिस्थिति से जमीनी स्तर पर जूझते हुए ही वामपंथी आंदोलन आगे नए रास्ते खोज पाएगा ।

जब 2015 में नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई , उस समय से ही यह सवाल करेद रहा था कि अंध श्रद्धा निर्मुलन का काम क्या वाकई इतना अधिक अवरोधक है कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी । इस बीच रावसाहेब कसले की किताब भक्ति और धम्म का अनुवाद करते हुए मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि समूचे विश्व में ही धर्म नामक संस्था का कितना जबर्दस्त प्रभाव मध्य युग से रहा है और आज उसकी जड़े और भी फैलकर अपना रूप बदल चुकी हैं । अब धर्म की राजनीति शुरू हो गई है । ऐसे समय में धर्म की प्रचलित धारणाओं के प्रति अपनी सैद्धांतिकी पर हमें पुनर्विचार करना ही होगा । यूट्यूब पर नरेन्द्र दाभोलकर से पचीस सवालों का एक धारावाहिक , लघु जवाबों के रूप में ( हर्षल जाधव संपादित ) जब मैंने मराठी में सुना तो मुझे लगा कि उनकी अधिकांश किताबों का हिंदी अनुवाद हो चुकने के बावजूद इस सीरीज के छोटे – छोटे सवाल – जवाबों के आधार पर पुनर्विचार के लिए बिंदु प्रस्तुत किये जाने चाहिए .

उषा आठले .

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