जल जंगल ज़मीन नीतियां

2. वन अधिनियम में संशोधन .जंगलों को एकल कृषी भूमियों में बदल देने और उधोगों को सोंप देने के लिये .बेहद खतरनाक .

मानवाधिकारों की मान्यता अब समाप्त हो जाएगी

मसौदे का उद्देश्य विभिन्न जंगलों को एकल कृषि भूमियों में बदल देने और उद्योगों को सुविधा प्रदन करना है । यह बेहद खतरनाक है ।

नीमा पाठक ब्रूम ( लेखिका पुणे स्थित सामाजिक एवं पर्यावरण संगठन , कल्पवृक्ष , के साथ जुड़ी हैं )

भारतीय वन अधिनियम , 1927 में प्रस्तावित संशोधन किसी वन अधिकारी की औपनिवेशिक भावना से ओत – प्रोत एक काल्पनिक उड़ान जैसा है । यह वन विभाग को अर्धन्यायिक शक्तियों से लैस करता है और जंगलों को कॉर्पोरेट हित में उजाड़ सकता है । संशोधन को अमल में लाने से पहले वनों की मौजूदा श्रेणियों की समीक्षा की जानी चाहिए और पूर्ववर्ती श्रेणियों ( आरक्षित , संरक्षित , और ग्राम वन ) को बदलकर उन श्रेणियों को शामिल करना चाहिए , जिनमें निवास स्थान और सामदायिक वन संसाधन अधिकारों को मान्यता प्रदान की गई है । इसके उलट , यह नया मसौदा आरक्षित जंगलों , पंचायत वनों और संयुक्त वन प्रबंधन समिति जैसे संस्थानों को ही सशक्त करता है ।

पंचायतों के प्रावधान ( अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार ) अधिनियम ( पैसा ) , 1996 और वन अधिकार । अधिनियम , 2006 जैसे लोकतांत्रिक कानूनों के परस्पर विरोधी मौजूदा औपनिवेशिक प्रावधानों को समाप्त करने की बजाय प्रस्तावित मसौदे का मूल अभिप्राय वनवासियों को अपराधियों के रूप में । दर्शाकर उनके अधिकारों की मान्यता रद्द करना और उन्हें पूरी तरह नष्ट करना है । मसौदा यह भी सुनिश्चित करता है कि आगे भी कभी इन अधिकारों को उन इलाकों में मान्यता न प्राप्त हो , जहां अब तक इनको मान्य नहीं किया गया है ।

एफआरए और पेसा के अमल में आने के बाद से ग्राम सभाएं जंगलों के स्थायी प्रबंधन , जिसमें विनियमित फसल और गैर – इमारती लकड़ी वन उत्पाद के व्यापार शामिल हैं , के कार्य में संलग्न हो गई हैं । मसौदा इसे नजरअंदाज करता है ।

इस मसौदे का उद्देश्य विभिन्न जंगलों को एकल कृषि भूमियों में बदल देने और उद्योगों को सुविधा प्रदान करना है । यह बेहद खतरनाक है । इस संशोधन को वनाधिकार और पेसा के उन प्रावधानों , जिसके अंतर्गत वन व्यपवर्तन के लिए ग्राम सभाओं से पर्वसंचित सहमति की आवश्यकता होती है , की । कमजोर करने के लिए प्रायोजित अन्य कानूनी और नीतिगत बदलाव के सापेक्ष देखना विशेष तौर पर महत्वपूर्ण है । अगर यह नया कानून पारित हो जाता है , तो यह भारतीय वनों को न सिर्फ प्रभावित | करेगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और संरक्षण प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन भी करेगा ।

{ डाउन टू अर्थ हिंदी के म ई 2019 के अंक से आभार सहित. फील्ड में कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को और ज्यादा सक्षम बनाये रखने के लिये .)

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