कला साहित्य एवं संस्कृति

2. एक पुरात्ववेत्ता की डायरी .” हरक्यूलिस और हनुमान ” शरद कोकास .

मित्रों, ‘एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी’ के पहले भाग ‘ चम्बल के पानी में चाँद’ में आपने पढ़ा कि ‘प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व’ अध्ययनशाला विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के छात्र शरद कोकास,रवींद्र भारद्वाज,अशोक त्रिवेदी,अजय जोशी और राममिलन शर्मा उज्जैन के निकट चम्बल नदी के किनारे ‘दंगवाड़ा’ नामक पुरातात्विक स्थल पर प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता , विश्वप्रसिद्ध भीमबैठका गुफाओं के खोजकर्ता ,पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के निर्देशन में चल रहे उत्खनन शिविर में पहुँचे हैं । सभी छात्र युवा हैं ,उर्जा से भरे हुए हैं और कुछ कर गुजरने की आकांक्षा लिए हुए हैं । शिविर में पहुँचते ही उनका सामना एक ऐसे दृश्य से होता है जिसमें भूख की वज़ह से एक मजदूर स्त्री को चक्कर आ जाते हैं और उस पर प्रेत बाधा का असर माना जाता है । डॉ.वाकणकर सबके मन से यह अन्द्धविश्वास दूर करते हैं । इसके बाद छात्र टीले की ओर घूमने निकल जाते हैं और चाँद के सान्निध्य में शाम बिताते हैं । लीजिये , लीजिये अब पढ़िए आगे की दास्तान –

शरद कोकास

दंगवाड़ा की पुरातात्विक साईट पर चल रहे उत्खनन शिविर में आगमन के पश्चात सर्द मौसम की यह पहली रात हमारी प्रतीक्षा कर रही थी । आसमान साफ़ था और हमारे और तारों के बीच सीधे संवाद की पूरी पूरी संभावना थी लेकिन यह सिर्फ तम्बू के बाहर संभव था । रात तो हमें अपने तम्बू के भीतर ही बितानी थी । शिविर के व्यवस्थापकों ने यहाँ आवास हेतु चार तम्बुओं के अलावा अवशेष और उपकरण रखने हेतु एक तम्बू तथा भोजन तैयार करने हेतु एक तम्बू और लगाया है । तम्बू में स्थित इस भोजनशाला के प्रभारी भाटी जी हैं जिनका कार्य सभी शिविरार्थियों को सुबह का नाश्ता,शाम की चाय और दो समय का भोजन करवाना है । ज्यों ज्यों अँधेरा बढ़ता जा रहा था हमारी भूख भी अपना आकार बढ़ाती जा रही थी । दोपहर का भोजन हम लोग उज्जैन से लेकर निकले थे जो जीप के उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलने की वज़ह से और हमारे बेहतरीन हाजमे की वज़ह से समय से पूर्व ही हज़म हो चुका था । इधर भूख रोज़ पाठशाला आने वाले पढ़ाकू बालक की तरह लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी । हमने भूख के आग्रह पर भाटी जी को नमस्कार किया । उन्होंने ज़मीन पर पड़ी भोजन पट्टिकाओं की ओर इशारा किया । हमने तुरंत ज़मीन पर पट्टिकाएं बिछाई और पालथी मारकर बैठ गए । भाटी जी ने फिर थालियों की ओर इशारा किया । हम समझ गए, शिविर का यही अनुशासन होता है अपनी थालियाँ खुद उठानी होती हैं सो हम फिर उठे और थालियाँ और गिलास लेकर बैठ गए ।

भाटीजी ने उसके बाद भोजन परोसना शुरू किया । इतने में वाकणकर सर भी अपनी थाली और गिलास लेकर पंगत में शामिल हो गए ।भाटी जी ने आलू बैंगन की सुस्वादु सब्ज़ी बनाई थी,साथ में दाल चावल और रोटी । हम लोगों ने रोटी का कौर तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि वाकणकर सर ने इशारा किया .. रुको दुष्टों पहले मन्त्र पढ़ना है । उन्होंने आँखें बंद कीं ,थाली के सामने हाथ जोड़े और मंत्रोच्चारण शुरू किया ..ओम सहना ववतु.. सहनौ भुनक्तु .. हम लोग अपनी बेचारगी में उनके साथ साथ यह मन्त्र बुदबुदाते रहे और सर की आँख खुलने से पहले ही भोजन पर टूट पड़े । हम लोगों ने कुछ इस तरह भोजन किया जैसे कई बरसों के भूखे हों ।

भोजन के पश्चात हम लोग अपने तम्बू में आ गए । इतनी जल्दी सोने की आदत नहीं थी, वैसे भी हॉस्टल में रहकर हम लोग इतने तो बिगड़ ही चुके थे कि जब तक कमरों के दरवाज़े खटखटाकर मित्रों से उनका हालचाल न पूछ लें और थोड़ी मस्ती न कर लें नींद आती ही नहीं थी सो यहाँ भी किसीको नींद नहीं आ रही थी । लेकिन बाहर ठण्ड थी और जिनके हाल जानना था वे सारे मित्र भी एक ही तम्बू में थे सो बिस्तर में घुसने के अलावा कोई चारा नहीं था । हम सब चुपचाप लेट गए और तार्पोलीन की बनी तम्बू की छत की ओर ध्यान लगाकर देखने लगे, शायद देश की शासन व्यवस्था की तरह उसमें भी कोई छेद दिख जाए ताकि हम ठण्ड का दोष उस पर मढ़ सकें । लेकिन ऐसी कोई गुंजाइश हमें दिखाई नहीं दी ।

वैसे यह फरवरी का दूसरा सप्ताह था । लम्बे समय के लिए मायके आई बेटी जिस तरह ससुराल वापस जाने की तैयारी में होती है ठण्ड भी उसी तरह अब विदाई की तैयारी कर रही थी । हालाँकि हम शहर में रहने वाले लोग इस बात की कल्पना नहीं कर पाए थे कि जंगल में ठण्ड शहर से ज़्यादा होगी । मुझे लगा था जैसे शहर में अब ठण्ड समाप्त हो गई है वैसे ही गाँव में भी हो गई होगी सो मैं अपनी बदमस्ती में रज़ाई लेकर नहीं आया था । रवीन्द्र की ठण्ड से बहुत पुरानी दुश्मनी थी सो उसका मुक़ाबला करने के लिए ज़िरह बख्तर की तरह रज़ाई उसके साथ थी । मैं किसी घुसपैठिये की तरह रवीन्द्र की रज़ाई में घुसने की कोशिश करने लगा । रवीन्द्र अकेला सोने का आदी था और रज़ाई शेयर करने में उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी …‘ मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी ‘ की तर्ज़ पर उसने कहा “ मैं अपनी रज़ाई नहीं दूँगा । “ मैंने उससे निवेदन किया..” भाई मेरे , यहाँ बहुत कड़ाके की ठण्ड होगी ऐसा मुझे पता नहीं था सो मुझसे ग़लती हो गई , मैं तो खैर कम्बल ओढ़कर सो जाऊंगा लेकिन इस अच्छे खासे उत्खनन कैम्प में तुम लोगों का एक दिन मेरे अंतिम संस्कार के लिए बर्बाद हो जायेगा “ मेरी बात सुनकर रवीन्द्र जोर से हँसा और उसे मुझ पर दया आ गई, वैसे भी वह मेरा प्यारा दोस्त है । अंततः एक ही रजाई में एक दूसरे की ओर पीठ करके सोने की बात पर समझौता हो गया ।

लेकिन रज़ाई में घुसने के बावज़ूद नींद का कुछ अता-पता नहीं था । वैसे भी नींद का समय अभी कहाँ हुआ था । सर्दियों में अँधेरा जल्दी हो जाता है लेकिन घड़ी तो अपने हिसाब से चलती है ? अचानक डॉ.वाकणकर की शाम को कही गई एक बात मुझे याद आ गई और मेरी हँसी फूट पड़ी । “ लगता है ठण्ड तेरे दिमाग़ में चढ़ गई है जो अकेला अकेला हँस रहा है ? ” मुझे हँसता देख रवीन्द्र ने पूछा । मैंने रवीन्द्र से कहा ” कुछ नहीं यार ,सर की वह कंकाल के साथ सोने वाली बात याद आ गई ..कि खोपडियाँ और कंकाल तो बिस्तर में भी मेरे साथ रहते हैं.. अच्छा बताओ, तुम कभी किसी कंकाल के साथ सोये हो ? “रवीन्द्र हँसने लगा..” कंकाल के साथ सोने के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना पडेगा माय डिअर, क्योंकि हमारे यहाँ तो कंकाल मिलने से रहा, इसलिए फ़िलहाल तो तेरे साथ सो रहा हूँ । ”

मैंने कहा “ मज़ाक मत उडाओ ..इतना भी दुबला पतला नहीं हूँ यार । वैसे यह बात तुम सही कह रहे हो कि कंकाल तो दक्षिण अफ्रीका में ही मिलेगा , हमारे यहाँ के डरपोक अन्द्धविश्वासी लोग कंकाल तो क्या खोपडी या कहीं पड़ी हुई हड्डी देखकर ही डर जाते हैं..लेकिन एक बात है ….।” अंतिम संस्कार यह शब्द मेरे अवचेतन में अब भी विद्यमान था और मैं पहले मनुष्य के अंतिम संस्कार के विषय में सोच रहा था । मेरी बात सुनकर रवीन्द्र ने शतुर्मुर्ग की तरह रज़ाई से बाहर गर्दन निकाल कर पूछा .. “क्या ? ” मैंने कहा “ हमने शव जलाने की प्रथा शुरू कर इतिहास का बडा भारी नुकसान किया है । ” “ वो कैसे ? ” रवीन्द्र ने पूछा । मैंने बताया “ कंकाल ही तो मनुष्य का इतिहास तय करते हैं यार, वे कितने पुराने हैं यह विज्ञान से पता चलता है उसीसे मानव सभ्यता की प्राचीनता तय होती है । गनीमत सभी जगह शव को नष्ट कर देने की यह प्रथा नहीं है , अगर दक्षिण अफ्रीका और योरोप में गाड़ने की बजाय शव जलाने की प्रथा होती तो हमें लाखों साल पहले के पृथ्वी के पहले पहले मनुष्य के दर्शन ही नहीं होते ।“

अशोक अब तक चुपचाप था और सिगरेट का आनन्द ले रहा था । उसने एक लम्बा कश लेकर छत की ओर धुआँ फेंका और धुएँ के केंद्र में अपनी निगाहें स्थिर करते हुए कहा ” मैं सोच रहा हूँ …पहली बार जब कोई इंसान मरा होगा तो उसे गाड़ा गया होगा या जलाया गया होगा..। ” मैंने कहा “ ना गाडा गया था , ना जलाया गया था । पहली बार जब मनुष्य ने मनुष्य की मृत देह देखी होगी तो उसकी समझ में आया ही नहीं होगा कि उसके जैसे दिखने वाले इस जीव को आखिर हुआ क्या है । वह बहुत देर तक उसके पास चुपचाप बैठा रहा होगा फिर उसकी आँख खोलकर देखी होगी, उसे हिलाया-डुलाया होगा ,यह सोचकर कि शायद इस तरह यह फिर से चलने लगे या बोलने लगे , फिर उसका मुँह खोलकर देखा होगा ,शायद वह फिर से बोलने लगे । लेकिन इन प्रयासों के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ होगा तो उसे उसके हाल पर छोड़कर वह अपनी भूख का इंतज़ाम करने निकल गया होगा । फिर कुछ समय बाद वह फिर उसके पास लौटा होगा लेकिन तब तक तो जंगली जानवर मृत देह को खा चुके थे । हो सकता है उसे देह की यह दुर्दशा देख कर अच्छा नहीं लगा होगा । आखिर था तो वह उसके जैसा ही मनुष्य जो उसके साथ रहता था, उसके सुख दुःख में उसका साथी था । यहीं पर पहली बार मनुष्य को आत्मा का ख्याल आया होगा । उसे लगा होगा कि उसके भीतर कोई चीज़ थी जिसकी वज़ह से वह चलता-फिरता था, हँसता- बोलता था जो अब उसकी देह से निकलकर बाहर चली गई है । यही उसकी अवधारणा भविष्य में उसके धर्म की नींव बनी ।”

“लेकिन फिलहाल तो सवाल उस मृत देह के सम्मान का था ।” मैंने अपनी बात जारी रखी ” सो अगली बार जब उसके मित्र या परिजन की मृत्यु हुई उसने मृत देह को जानवरों से बचाने के लिए उसके चारों ओर, और उसके मृत शरीर के ऊपर बड़े- बड़े पत्थर रख दिये । इस तरह यह मनुष्य की पहली कब्र बनी और इसी तरह मनुष्य का पहला अंतिम संस्कार हुआ । ज़मीन में गाड़ना , शव को बहाना या जलाना जैसे काम तो जल और लकड़ी की उपलब्धता और भौगोलिक आधार पर बाद में शुरू हुए ।” “वाह वाह ..’पहला अंतिम संस्कार’ .. तेरे ‘पहला’ और ‘अंतिम’ का जवाब नहीं भाई । ” रवीन्द्र ने उबासी लेकर कहा ” लेकिन अब सो जाओ भाई .. नहीं तो सपने में कंकाल ही कंकाल दिखेंगे । “ठीक है । ” मैंने कहा “ चलो सोने की कोशिश करते हैं । ”

लेकिन सोने की हमारी कोशिश असफल रही । वैसे भी ठण्ड का समय था और हम लोग नौ बजे लगभग बिस्तरों में घुस गए थे उस हिसाब से ज़्यादा समय भी नहीं हुआ था । मैंने कहा ‘चलो समय काटने के लिए जिस तरह वेताल पच्चीसी में राजा विक्रमादित्य को उसके कंधे पर लदे हुए बेताल ने कहानियाँ सुनाई थीं मैं भी तुम लोगों को बेताल की तरह एक कहानी सुनाता हूँ । “ रवीन्द्र बोला ” भैये, पहले तय कर ले हम में से विक्रमादित्य कौन है जो तेरी कहानी सुनेगा क्योंकि बाद में तू उसीसे सवाल पूछेगा । अशोक ने उसका समर्थन करते हुए कहा ” और हाँ बेताल तू ही बन हम लोग तो फ़िलहाल ज़िन्दा हैं ।” “ चुप बे..बड़ा आया ज़िन्दा कहींका ” अजय ने उसे झिड़कते हुए कहा ” ये जीना भी कोई जीना है …लल्लू । ”

मैंने दोनों की ओर मुस्कुराकर देखा और कहा ” भाई, जिंदा-मुर्दा बात में तय कर लेना फिलहाल तो यह कहानी सुनो । इतना कहकर मैंने अपना आख्यान शुरू कर दिया..” चलो ..मैं तुम्हें यूनान ले चलता हूँ । योरोप और बाल्कन प्राय:द्वीप के दक्षिण में इजियन सागर से लगा प्रदेश है यूनान, वही प्रदेश जिसे वर्तमान में ग्रीस कहते हैं । यहाँ दक्षिण यूनान के पेलोपोनेसस क्षेत्र में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्खनन किया गया जिससे माइसीनी नगर में प्राचीन सभ्यता का पता चला । इस तरह हमें यूनान के इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त हुई । पुरातात्विक सामग्री के अलावा यूनान के प्राचीन इतिहास के बारे में जानने का स्त्रोत वहाँ की पौराणिक कथायं भी हैं । यद्यपि विश्व की अधिकांश पौराणिक कथाओं की भांति इन कथाओं के नायक व घटनायें भी काल्पनिक हैं लेकिन इन कथाओं में प्राचीन यूनानियों के काम धन्धे,औज़ारों, रीति -रिवाज़ों आदि के बारे में बहुत सारी जानकारियाँ मिलती हैं । यह यूनानी किन देशों की यात्रायें करते थे और किन किन देवी-देवताओं में विश्वास करते थे यह जानकारी भी इनमें है।

“तू कहानी सुना रहा है या यूनान का इतिहास ? ” अजय जोशी ने ऊबकर पूछा । रवीन्द्र ने उसे छेड़ते हुए कहा “अबे गधे ,इतना भी नहीं जानता कि कहानी और इतिहास में फर्क होता है ।“ । “ जानता हूँ यार, लेकिन यह इतनी देर से बोर कर रहा है.. ठीक है ..चल आगे सुना…। “ अजय बोला । “ चलो ठीक है..” मैंने कहा ” भाई हम लोग पुरातत्व के छात्र हैं अब हिंदी के कथाकार की तरह कहानी थोड़े ही सुना सकते हैं । चलो फिर भी कोशिश करता हूँ ,तुम्हें हर्क्यूलिस या हेराक्लीज़ की कहानी सुनाता हूँ ।“

” प्राचीन यूनान में अनेक देवी देवता हुए हैं जिनमें हेराक्लीज़ नामक एक प्रसिद्ध देवता था । जैसे कि होता आया है यूनान के कई देवी देवता कुछ बदले हुए नामों के साथ रोम में भी पाए जाते हैं अतः इस तरह यूनान का हेराक्लीज़ रोम का देवता हरक्युलिस हो गया । हरक्युलिस के बारे में कहा जाता है कि वह आधा देवता और आधा मनुष्य था और उसके पास अद्भुत शक्तियाँ थीं । यूनान और रोम के लोग पराक्रमी हर्क्यूलिस के कारनामों को बहुत पसन्द करते थे । ऐसा ही उसका एक कारनामा मैं तुम्हें सुनाता हूँ ।”

“यूनान में एक राजा था जिसका नाम ऑजियस था । यह राजा बहुत संपन्न था ,उसका राज्य भी काफी विशाल था और उसकी गौशाला में पाँच हज़ार से अधिक गाय और बैल थे । अब इतनी बड़ी गौशाला होगी तो उसके लिए गौसेवक भी उतने ही होने चाहिए लेकिन ऐसा नहीं था । उसने सारे गौसेवकों को युद्ध और दूसरे कामों में लगा दिया जैसे कि वे राजस्व की वसूली भी करने लगे । स्वाभाविक था कि गौशाला की व्यवस्था बिगड़ गई और वहाँ कई दिनों तक सफाई व्यवस्था ठप्प हो गई । इसका परिणाम यह हुआ कि गौशाला गोबर से भर गई , उसे साफ करने वाला कोई ना था । तब राजा ऑजियस को हरक्युलिस की याद आई । अब वह देवता भी था और मनुष्य भी और शक्ति संपन्न तो था ही । हरक्युलिस ने गोबर के इस पहाड़ को साफ़ करने की एक योजना बनाई ।उसने अपनी शक्ति से सबसे पहले पास की दो नदियों पर बांध बना दिया, जल्द ही नदियाँ ऊपर तक भर गईं और फिर उसके बाद उसने वह बांध एक झटके में तोड़ दिया बस पानी की तेज़ धार छूटी और सारा गोबर अपने साथ बहा ले गई ।”

“तू भी यार सोते समय क्या गन्दी गन्दी कहानी सुना रहा है..तेरे दिमाग में भी लगता है यही भरा है ” अजय ने हँसते हुए कहा । “ सुनो तो ..“ मैं अपने प्रवाह में था “ यह हरक्युलिस के साथ अनेक बार हुआ कि उसे अपनी शक्ति की परीक्षा देनी पड़ी । ऐसे ही एक बार क्या हुआ कि यूनान के राजा यूरीस्थेयास ने उससे कहा कि मैं तुम्हे शक्तिमान तब मानूंगा जब तुम मेरे लिए सोने के तीन सेब लेकर आओगे । राजा का आदेश पाकर हरक्यूलिस सोने के सेब की खोज में निकला । यह सेब यूनान से पश्चिम में इजियन महासागर के किनारे या पृथ्वी के सुदूर उत्तर में किसी बाग में किसी पेड़ पर लगे थे जो देवताओं की संपत्ति थे । हरक्युलिस अनेक दैत्यों और देवताओं से लड़ते हुए आखिर उस बाग़ तक पहुँचा । वहाँ पहुँचने से पूर्व उसने प्रोमेथ्यूस को ज़िगर खा जाने वाले भयानक गरुड़ दैत्य से भी मुक्ति दिलाई । हरक्युलिस जब वहाँ पहुँचा तो उसने देखा कि वहाँ वीर अटलांटिस या एटलस उस बाग़ में सोने के सेब की रक्षा कर रहा था । वह अपने काँधे पर आकाश को थामे हुए था और पृथ्वी पर खड़ा था । अब उस समय यूनानियों को आकाश की वास्तविकता तो मालूम नहीं थी । वे सोचते थे कि आकाश पृथ्वी पर गिर रहा है और वीर अटलांटिस उसे अपनी पीठ पर थामे हुए है जिसकी वज़ह से पृथ्वी बची हुई है ।

“इसी के नाम पर अटलांटिक महासागर का नाम पड़ा है ना ? ” अशोक ने पूछा “ हाँ । “ मैंने कहा “ अब आगे सुनो । हरक्यूलिस ने वीर अटलांटिस से सेब की मांग की और उसे बताया कि राजा यूरीस्थेयास के सामने उसे अपनी शक्ति की परीक्षा देनी है । एटलस के मन में विचार आया की वह स्वयं ही सोने के सेब लेकर राजा के सामने क्यों न चला जाए ताकि हरक्युलिस से ज़्यादा बड़ा वीर वह खुद को साबित कर सके । उसने हरक्युलिस से कहा ‘मैं सेब तोड़ता हूँ तब तक तुम अपने कंधे पर यह आकाश थामे रखो ।’ जितनी देर में अटलांटिस ने सेब तोड़ा हरक्यूलिस ने अपनी पीठ पर आकाश को थामें रखा। यूनानी कहते हैं कि आकाश का वज़न इतना अधिक था कि हरक्यूलिस के पाँव घुटनों तक पृथ्वी में धंस गए ,बोझ से उसकी हड्डियाँ चरमराने लगीं और पसीने की नदियाँ बहने लगीं । “

“फिर क्या हुआ यार ?” अजय ने उत्सुकता से पूछा । ” बस फिर क्या होना था ” मैंने कहा ” एटलास सेब तोड़ लाया और उसे लेकर जाने लगा । हरक्युलिस समझ गया कि उसके साथ धोखा हुआ है । लेकिन उसे प्रोमेथ्युस ने पहले ही बता दिया था कि एटलास तुम्हारे साथ ऐसा करेगा सो उसने एटलास से कहा ‘ भाई , मेरे कन्धों में बहुत दर्द हो रहा है वे छिल न जाएँ इस लिए मैं कंधे पर कोई नर्म पैड रखना चाहता हूँ ,सो एक मिनट के लिए तुम यह भारी भरकम आकाश थाम लो, मैं फिर वापस अपने कंधे पर ले लूँगा ।एटलस उसकी बातों में आ गया और उसने फिरसे आकाश अपने कंधे पर ले लिया । बस हरक्युलिस को मौका मिला गया और वह सोने के सेब लेकर भाग गया ।

“वाह ! वाह ! अच्छी कहानी है ..लेकिन सारे वीर यूनान में ही नहीं हुए हैं ” हमारे हनुमान भक्त मित्र पंडित राममिलन शर्मा इलाहाबादी बहुत देर से हरक्युलिस का किस्सा सुन रहे थे और मन ही मन नाराज़ हो रहे थे । उन्होंने गुस्से से कहा ” होगा हरक्युलिस बहुत बड़ा वीर लेकिन हमरे यहाँ के वीर हनुमान भी उनसे कुछ कम नहीं हैं , उन्होंने तो सूरज को निगल जाने और संजीवनी बूटी का पहाड़ उठा लाने जैसे बड़े बड़े कारनामे किये हैं ई हर्क्यूलिसवा भी तो उन्हीं का यूनानी अवतार है ।” मैंने कहा ” हाँ राममिलन भैया ,यूनानियों की तरह पुराणकथायें तो हमारे यहाँ भी हैं और उनमें भी अनेक किस्से हैं जो दुनिया की अनेक सभ्यताओं के किस्सों जैसे ही हैं । और कई पात्र तो हमारे मिथकीय पात्रों से मिलते जुलते भी हैं जैसे उनका हरक्युलिस तो हमारे हनुमान, उनका ज्यूस और हमारा इंद्र । जैसे हमारे यहाँ गांधारी के आँख की पट्टी खोलकर देख लेने पर दुर्योधन के शरीर के वज्र के हो जाने की कथा है वैसे ही उनके यहाँ एकिलिस की माँ द्वारा उसके शरीर को वज्र करने के लिए उसे स्टिक नामक नदी में डुबोये जाने की कथा है ।”

“ भाई अब तेरी कथा बाद में सुनेंगे ।” रवींद्र ने कहा । ” अब नींद आ रही है ..लेकिन यार यह योरोप ,बाल्कन द्वीप, पेलोपोनेसस ..लगता है अगली बार तेरी बातें समझने के लिए प्राचीन विश्व का नक्शा लेकर बैठना पड़ेगा “। ” बिलकुल ।” मैंने कहा । वैसे भी रात काफी हो चुकी थी और नींद से सबकी ऑंखें बोझिल हो रही थीं । पूस की ठंडी हवा तम्बू के छेदों से भीतर प्रवेश कर रही थी । जाने क्यों मुझे इस ठण्ड में इन काल्पनिक कहानियों के बरक्स यथार्थ के धरातल पर लिखी प्रेमचंद की कहानी ‘ पूस की रात ‘ याद आ रही थी । इससे पहले कि हम लोगों की हालत ठण्ड में कांपते किसान हल्कू की तरह हो जाए हम लोगों ने सो जाना उचित समझा । वैसे भी अब कोई कहानी सुनाने का वक्त नहीं बचा था और आज के लिए काफी कहानियां हो चुकी थीं । अंततः मैं उस हवा में पृथ्वी के पहले मनुष्य की देहगन्ध महसूस करता हुआ जाने कब नींद के आगोश में चला गया ।

_ शरद कोकास _
8871665060

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