राजनीति

रमन सरकार में बदनाम अफसरों ने दी थीं दागी कंपनियों को क्लीन चिट ःः राजकुमार सोनी 

 

 अपना मोर्चा.काम  के लिये राजकुमार सोनी 

24-Dec-2018

रायपुर / भले ही अब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चिटफंड कंपनियों के अभिकर्ताओं के खिलाफ केस वापस लेने और निवेशकों को राहत देने के लिए कवायद कर रहे हैं, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि रमन सरकार में भाजपा के एजेंट के तौर पर काम करने के लिए बदनाम हो चुके अफसरों ने कई दागी कंपनियों को छत्तीसगढ़ में कारोबार करने की छूट दे रखी थीं. ऐसे सभी अफसरों को लेकर छत्तीसगढ़ अभिकर्ता एवं उपभोक्ता सेवा संघ ने कई स्तरों पर शिकायत भी कर रखी हैं.

 

संघ के महासचिव नंदकुमार निषाद ने बताया कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ( सेबी ) ने देशभर की लगभग 91 कंपनियों को चिटफंड का कारोबार करने के लिए प्रतिबंधित किया था, लेकिन छत्तीसगढ़ में कई दागी कंपनियां आईएएस अफसरों के संरक्षण की वजह से फल-फूल रही थीं. कई मौकों पर ऐसा भी लगता था कि अफसर ही कंपनियों को संचालित कर रहे हैं. कंपनी से जुड़े अभिकर्ताओं के संज्ञान में जैसे ही यह जानकारी आती थीं कि अमुक कंपनी डिफाल्टर है तो उसकी शिकायत वे उच्चाधिकारियों से करते थे. कंपनी के प्रमुख कर्ताधर्ताओं से थोड़े समय के लिए पूछताछ की जाती थीं और फिर बाद में कंपनी को प्रदेश के भोले-भाले लोगों को लूटने की छूट प्रदान कर दी जाती थीं.

 

दागी कंपनियों को था इन अफसरों का संरक्षण

अभिकर्ता एवं उपभोक्ता सेवा संघ ने उच्च न्यायालय के समक्ष लगभग 20 हजार शपथ पत्रों के साथ एक याचिका प्रस्तुत की है. इस याचिका में इस बात का उल्लेख है कि प्रदेश में चिटफंड का गोरखधंधा अफसरों के संरक्षण में फल-फूल रहा था. बहराल संघ ने अपनी शिकायत में लिखा है कि कलकत्ता वेयर इंडस्ट्री को आर संगीता, जयप्रकाश कश्यप, बीआर ठाकुर, अनबलगन पी, राम सिंह ठाकुर, राजपाल त्यागी, अलरमेल मंगई डी का संरक्षण प्राप्त था. सांई प्रसाद ग्रुप पर रीना बाबा साहेब कंगाले, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, नीलकंठ टेकाम, तीरथराज अग्रवाल, बीएस जागृत, रितु सेन, भीमसेन, जीएल भारद्वाज और रतनलाल डांगी की नजरें इनायत थीं. निर्मल इन्फ्राहोम कार्पोरेशन लिमिटेड और मिलियन माइल्स ग्रुप को राजेश टोप्पो, विनायक ग्रुप को ओपी चौधरी ( अब भाजपा में शामिल ) सनसाइन और श्रीराम रियल एस्टेट ग्रुप को अमृतलाल ध्रुव, पीआईसीएल ग्रुप को संजीव कुमार झा और रोज वल्ली ग्रुप को सौम्य चौरसिया का वरदहस्त हासिल था. संघ ने लिखा है कि जो अफसर प्रतिबंधित कंपनियों को प्रदेश में फलने-फूलने का अवसर दे रहे थे दरअसल वे पार्टी विशेष के लिए फंड की व्यवस्था में लगे थे.

 

काम नहीं करने दिया गया चिटफंड प्रकोष्ठ को

छत्तीसगढ़ विधानसभा में जब कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में थी तब  चिटफंड कंपनियों की लूट और फरारी को लेकर विधायक मोतीलाल देवांगन ने कई सवाल उठाए थे. कांग्रेस के हमले के बाद सरकार ने दुर्ग, बिलासपुर और रायपुर में चिटफंड प्रकोष्ठ का गठन किया था. इसको अस्तित्व में लाने के पीछे का मकसद यह था कि प्रकोष्ठ चिटफंड कंपनियों के प्रमुख कार्यकर्ताओं की धरपकड़ करेगा, निवेशकों को पैसा वापस दिलाने में मदद करेगा, लेकिन इस प्रकोष्ठ को सरकार के आला अफसरों ने ढंग से काम ही नहीं करने दिया. सरकार ने प्रकोष्ठ में एक उप पुलिस अधीक्षक को तैनात किया, लेकिन उसके साथ किसी भी तरह का स्टाफ नहीं दिया. चिटफंड प्रकोष्ठ के गठन से पहले चिटफंड कंपनियों के प्रमुख कर्ताधर्ताओं की धरपकड़ का काम विशेष अनुसंधान शाखा द्वारा किया जाता था. वस्तुस्थिति यह है कि विशेष अनुसंधान शाखा में पर्याप्त स्टाफ है. अगर कोई कमी है तो स्थापित प्रभारी अधिकारी की. जैसे दुर्ग रेंज में ही अनुसूचित जाति- जनजाति थाने के प्रभारी मौखिक आदेश से कार्य कर रहे हैं. रायपुर और बिलासपुर में तबादले से प्रभावित अधिकारी कामकाज कर रहे हैं.पुलिस महकमे से जुड़े अफसरों का मानना है कि अगर सभी जगहों के चिटफंड प्रकोष्ठ में पदस्थ उप पुलिस अधीक्षकों को विशेष अनुसंधान शाखा में पदस्थापना देकर काम लिया जाता तो चिटफंड कंपनियों के धोखे के शिकार लोगों को न्याय मिल सकता था.

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