शिक्षा-स्वास्थय

18. अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा लोगों के धार्मिक विधि – विधानों में हस्तक्षेप | क्यों किया जाता है ? नरेंद्र दाभोलकर .

सवाल के जवाब में डॉ . नरेन्द्र दाभोलकर कहते – अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति जिन धार्मिक विधि – विधानों में हस्तक्षेप करती है , उसका अधिकार उसे भारतीय संविधान ने दिया है . संविधान में कहा गया है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना हरेक नागरिक का कर्तव्य है It is duty of every Indian ( Citizen to promote scientific temperament ,spirit of reform and humanos. अनुच्छेद 51 एच के अनुसार , सिर्फ वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही नहीं , बल्कि धर्म – समीक्षा का अधिकार भी दिया गया है ताकि मानववाद का विकास हो सके .

वे एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं – ‘ प्रत्येक वर्ष प्लास्टर ऑफ पेरिस की डेढ़ करोड़ मूर्तियाँ विसर्जन के नाम पर पानी में डाली जाती हैं , इस पर मैंने अनेक महानगरपालिकाओं के ,आयुक्तों से चर्चा की , उनका भी कहना है कि वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में अनेक डबरे बनाए जाएँ तो भी उन मूर्तियों का क्या होगा ? वे तो घुलेंगी नहीं . यह बड़ी समस्या है . हमने एक सीधा – सादा उपाय सुझाया , जिसे केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड ने भी मंजूर किया है . मिट्टी की मूर्ति बनाइये , डबरे में डालते ही वह अपने आप घुल जाएगी । खुद के घर में टब में डालने पर वह मिट्टीयुक्त पानी पौधों को दिया जा सकेगा । सार्वजनिक टब में डालने पर वह सार्वजनिक उद्यानों में काम आएगी । ये सारी बातें पर्यावरण के अनुकूल हैं ।

इसलिए इन बातों में एक व्यापक परिवर्तन निहित है । मैंने पूर्व में ही अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के चार उद्देश्य – सूत्रों का उल्लेख किया है । उसमें से चौथा सूत्र है – व्यापक परिवर्तन के आंदोलन से स्वयं को जोड़ना । ‘

इसके बाद वे दूसरा उदाहरण देते हैं , “ आज हम स्त्री भ्रूण – हत्या के बारे में बात करते हैं । ठीक भी है । परंतु लड़की कन्यादान करते हैं । वह क्या है ? मूलतः लड़की दान करने वाली वस्तु नहीं है । वह एक स्वतंत्र व्यक्ति है , एक अन्य ध्यान देने की बात है , कन्यादान के वक्त अगर लड़की की माँ का देहान्त हो चुका हो तो पिता कमर में सुपारी खोंसकर कन्यादान करता है । मगर यदि लड़की का पिता मर चुका हो तो माँ को अधिकार नहीं है वह भी कमर में सुपारी खोंसकर कन्यादान करे । उसके बदले भाई या मामा कन्यादान करता है ! ! लड़की को अपने गर्भ में रखकर नौ महीने किसने पाला है ? माँ ने न ? फिर माँ को अधिकार क्यों नहीं है ? कायदे से तो कन्यादान करना ही गलत है मगर करना ही हो तो वह माँ के द्वारा किया जाना चाहिए – यह सकारात्मक धर्म – समीक्षा है । यह सुधारवाद है । इस पर अमल करने का अधिकार हमें संविधान ने प्रदान किया है । संविधान को छोड़िये , देखिये मराठी के संत तुकाराम क्या कहते हैं – ‘ तीर्थस्थल पर क्यों जाते हो ? वहाँ तीर्थ नहीं पानी है , ईश्वर नहीं , पत्थर है । अगर आप सचमुच ईश्वर के पास जाना चाहते हैं तो किसी सज्जन आदमी के पास जाइये ।

‘ ‘ डॉ नरेन्द्र दाभोलकर अपनी बात स्पष्ट करते हुए आगे कहते हैं कि , ‘ ‘ किसी विशेष मुहूर्त पर गोदावरी नदी में डुबकी लगाकर बारह वर्षों के पापों का बैंक बैलेंस क्लियर करने के लिए सिंहस्थ के लिए एक करोड़ रूपये की मंजूरी दी जाती है ! ! ! अब इसकी हम आलोचना नहीं करेंगे क्या करेंगे ? हमारा धार्मिक विधि – विधानों पर कतई कोई आक्षेप नहीं है परंतु जब जहाँ वह भारतीय संविधान की सीमा लाँघने लगते हैं , सामाजिक विषमता और शोषण का हिस्सा बनने लगते हैं , वहाँ तो हस्तक्षेप करना ही होगा । ‘ यहाँ भी किसतरह लोगों की धार्मिक श्रद्धा को राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए भुनाते हैं , इस पर प्रकाश डाला गया है । धार्मिक कर्मकांडों के लिए करोड़ों की स्वीकृति दी जाती है मगर शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में धन की कमी का रोना रोया जाता है ।

डॉ . नरेन्द्र दाभोलकर ने इसतरह की सैकड़ों घटनाओं का अंतर्विरोध सामने लाया है । सत्ताधारी वर्ग कभी नहीं चाहता कि लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हो । क्योंकि इससे लोग सवाल उठाने लगेंगे , समीक्षा करने लगेंगे और सत्ताधारियों को अपनी सत्ता बरकरार रखने में दिक्कत होगी |

प्रारंभिक वक्तव्य .

इप्टा रायगढ ने बहुत ही समसामयिक पुस्तक प्रकाशित की धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर. जिसका संयोजन जानी मानी रंगकर्म उषा आठले वैरागकर ने किया है .

मुझे यह पुस्तक कपूर वासनिक जी के माध्यम से मिली ,वो बिलासपुर में हम सभी को पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे है . नरेन्द्र दाभोलकर की अब और ज्यादा जरूरत भारत की मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में प्रायः धर्म और जाति के सवालों पर चर्चा कम मिलती है । धर्म और जातियों का विभेद दूर हुए बिना समाज – परिवर्तन या व्यवस्था – परिवर्तन नहीं हो सकता , भारतीय परिप्रेक्ष्य में अब इस पर विचार करने की पहल हो चुकी है और कुछ क्षेत्रों में इस दिशा में आंदोलन की नींव भी पड़ गई है । जाति – उन्मूलन की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं । भारत का समाज सिर्फ वर्गाधारित समाज नहीं है । उसमें धर्म – सम्प्रदाय जाति – उपजातियों की अनेक दृश्य – अदृश्य दीवारें खड़ी हैं । इनकी जड़े भी बहुत गहरी हैं । इसलिए इस वास्तविक परिस्थिति से जमीनी स्तर पर जूझते हुए ही वामपंथी आंदोलन आगे नए रास्ते खोज पाएगा ।

जब 2015 में नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई , उस समय से ही यह सवाल करेद रहा था कि अंध श्रद्धा निर्मुलन का काम क्या वाकई इतना अधिक अवरोधक है कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी । इस बीच रावसाहेब कसले की किताब भक्ति और धम्म का अनुवाद करते हुए मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि समूचे विश्व में ही धर्म नामक संस्था का कितना जबर्दस्त प्रभाव मध्य युग से रहा है और आज उसकी जड़े और भी फैलकर अपना रूप बदल चुकी हैं । अब धर्म की राजनीति शुरू हो गई है । ऐसे समय में धर्म की प्रचलित धारणाओं के प्रति अपनी सैद्धांतिकी पर हमें पुनर्विचार करना ही होगा । यूट्यूब पर नरेन्द्र दाभोलकर से पचीस सवालों का एक धारावाहिक , लघु जवाबों के रूप में ( हर्षल जाधव संपादित ) जब मैंने मराठी में सुना तो मुझे लगा कि उनकी अधिकांश किताबों का हिंदी अनुवाद हो चुकने के बावजूद इस सीरीज के छोटे – छोटे सवाल – जवाबों के आधार पर पुनर्विचार के लिए बिंदु प्रस्तुत किये जाने चाहिए .

उषा आठले .

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