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आदिवासी नेत्री सोनी सोरी के गोमपाड़ में तिरंगा फहराने के बाद उठा सवाल
राजकुमार सोनी (17 अगस्त 2016)
कैच न्यूज
आदिवासी नेत्री सोनी सोरी के बस्तर के एक गांव गोमपाड़ में तिरंगा फहराने के बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि गांव-गांव में विकास का दावा करने वाली सरकार ने इस गांव के लोगों को मरने के लिए क्यों छोड़ रखा है? जिस गांव के लोग यह नहीं जानते कि रेलगाड़ी कैसी होती है? बिजली के एक लटटू से स्याह और घुप्प अंधेरा कैसे दूर होता है? सड़क, स्कूल और अस्पताल का मतलब क्या है? उस गांव के लोगों के हाथों में जब पहली बार सोरी ने तिरंगा थमाया तो गोड़ी बोली में सबसे पहला सवाल यही उछला कि क्या तिरंगा थाम लेने से गांव में फौजी बूटों की धमक कम हो जाएगी? क्या कैम्पों के जवान गांव की बूढ़ी औरतों और मासूम आदिवासी की इज्जत लूटना बंद कर देंगे? क्या मड़कम हिड़मे फिर से जिंदा हो जाएगी?

सोरी ने गांव वालों से कहा कि जब सरकार निर्दोष आदिवासियों की मौत को कानून सम्मत बताने के घिनौने खेल में लगी हुई हैं तो फिर हम आदिवासियों को भी उनके गलत कारनामों का जवाब सही कानून से देना है. सोरी ने कहा कि तिरंगे का साथ हमें गलत नहीं होने देगा और इस भरोसे को कायम रखेगा कि चाहे कोई कुछ भी कर लें एक दिन सच जीत जाता ह

गोमपाड़ में मड़कम हिड़मे नाम की एक युवती की सुरक्षाबलों के द्वारा की गई हत्या के बाद सोरी ने यह ऐलान किया था कि बस्तर में लोकतंत्र की बहाली के लिए तिरंगा यात्रा निकालेगी। यात्रा इसी महीने 9 अगस्त को दंतेवाड़ा से शुरू हुई थी जो 14 अगस्त को गोमपाड़ पहुंची. यात्रा का जगह-जगह स्वागत हु्आ लेकिन 14 अगस्त की रात पास के जंगल में बैठक ले रहे माओवादियों की ओर से तिरंगा न फहराने का संदेश भिजवाया गया.

यात्रा में शामिल लोगों को पास एक गांव से आए कुछ लोगों ने बताया कि दादा लोगों (बस्तर में माओवादियों को दादा कहा जाता है) ने आदिवासियों पर हो जुल्म के लिए संघर्षरत सोनी सोरी की कोशिशों का स्वागत किया है, लेकिन वे देश की आजादी को आधा-अधूरा मानते हैं इसलिए यह अनुरोध भी भेजा है कि सोरी तिरंगे की जगह काला झंड़ा फहराए. सोरी ने कहा कि उन्होंने अपनी यात्रा दिखावे के लिए नहीं ब्लकि यह बताने के लिए निकाली है कि आदिवासी भी इस देश के नागरिक हैं। उन्हें भेड़-बकरी समझना बंद करना होगा। उनके भी कुछ अधिकार है। उन्हें भी खुली हवा में सांस लेने का पूरा हक है.

तिरंगे में लिपटकर नहीं आ पाएगी लाश

यात्रा में शामिल सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों को कोन्टा और मुरलीगुड़ा कैम्पों में तैनात सुरक्षाबलों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा. यात्रियों को पहले यह कहकर रोकने की कोशिश की गई कि यदि जंगल में माओवादी हमला कर देते हैं तो कैम्प के लोग उनकी कोई मदद नहीं कर पाएंगे. यात्रियों को इस बात का भय दिखाया गया कि जंगल में कई जगह पर बारूदी सुरंग बिछी हुई हैं यदि किसी तरह का कोई विस्फोट हो गया तो सब लोग जान से हाथ धो बैठेंगे और जिस तिरंगे को लेकर जा रहे हो उस तिंरगे में लाश भी लिपटकर नहीं आ पाएगी. सुरक्षाबलों ने यात्रा में शामिल लोगों की तस्वीरें भी खींची. महिला यात्रियों पर बंदूके तानी गई. यात्रियों ने कैम्पों के सामने आदिवासियों की हत्या के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की. विरोध के बाद पदयात्रियों को जंगल के भीतर प्रवेश की इजाजत दी गई.

ग्रामीणों को सौंपा तिरंगा

15 अगस्त की सुबह ग्रामीणों और पदयात्रियों ने पास के जंगल में मौजूद मड़कम हिडमे की समाधि स्थल पर श्रद्धाजंलि दी. इस दौरान आसपास के गांव वालों के अलावा हिडमे की मां लक्ष्मी और पिता कोसा भी मौजूद थे. यात्रा में शामिल लोगों ने ग्रामीणों को एक तिरंगा यह कहते हुए सौंपा कि वे उनके संघर्ष में साथ रहेंगे.

कल्लूरी ही असली सीएम

इधर सोनी सोरी ने बस्तर के आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी को असली सीएम कहा है. सोनी का कहना है कि कल्लूरी अपने गुर्गों के जरिए गांव-गांव में यह संदेश फैलाने में कामयाब हो गए हैं कि एक दिन बस्तर अलग राज्य बनेगा तब वे सीएम बनेंगे. जो आदिवासी माओवादियों का साथ देते हैं उन्हें साथ उनका साथ छोडऩा होगा अन्यथा परेशानी होगी.

सरकार नाकाम

इधर माओवाद प्रभावित गांव गोमपाड़ के लोगों को राशनकार्ड व अन्य बुनियादी सुविधाओं से महरूम रखें जाने को सामाजिक कार्यकर्ताओं ने साजिश करार दिया है. पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष लाखन सिंह का आरोप है कि ग्रामीणों का राशनकार्ड और आधारकार्ड इसलिए नहीं बनाया गया है ताकि किसी को भी माओवादी बताकर मौत के घाट उतारना आसान हो. छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला ने कहा कि जब सोनी सोरी माओवादियों के गढ़ में तिरंगा फहरा सकती है तो फिर सरकार लोगों की जरूरत के हिसाब से गांव का विकास क्यों नहीं कर सकती? सरकार कब तक माओवादियों की आड़ लेकर ग्रामीणों को बदतर जिन्दगी जीने के लिए विवश रखेगी
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