शिक्षा-स्वास्थय

17.महिलाओं के मंदिर – प्रवेश पर केन्द्रित अंधविश्वास क्या उचित है ? संदर्भ : धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार – नरेन्द्र दाभोलकर.

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश आंदोलन का फाईल फोटो.

संविधान द्वारा प्रदत्त स्त्री – पुरूष समानता पर बात शुरू करते हुए डॉ . नरेन्द्र दाभोलकर ने कहा कि , हमें ध्यान देना होगा कि , भारतीय संविधान द्वारा लोगों को प्रदत्त अधिकारों को नकारा न जाए । हम इस बात को लेकर जागरूक हैं कि उनमें से लोगों को नुकसान पहुंचाने वाली बातें घटित न हों । शनि शिंगणापुर में महिलाओं के प्रवेश के लिए हमने जो सत्याग्रह किया , उसमें शनि शिंगणापुर तो नहीं , मगर शहर के लोगों में इतना प्रक्षोभ था कि हमें शहर में गिरफ्तार किया गया । आरोप लगाया गया कि महिलाओं को जिस जगह पर नहीं जाना चाहिए .

उसकी माँग करके आपने हमारे हिंदू धर्म को धक्का पहुँचाया है । मजेदार बात यह है कि तब जिन लोगों ने हमारा विरोध किया था , उनमें से भाजपा की वरिष्ठ महिलाओं ने मात्र ग्यारह वर्षों बाद कोल्हापुर के अंबाबाई मंदिर में महिलाओं का प्रवेश क्यों नहीं हो सकता पूछते हुए भीतर गर्भगृह में प्रवेश किया । इसका अर्थ यही है कि उनको देर से अक्ल आई । किसतरह धर्म में राजनीति मिलाकर अपनी स्वार्थ – सिद्धि की जाती हैं , उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट होता है ।

वे आगे कहते हैं , सवाल यह भी है कि जब सभी को सार्वजनिक स्थानों पर जाति – धर्म – लिंग निरपेक्ष प्रवेश का अधिकार है , तो महिलाओं को मंदिर – प्रवेश के अधिकार से वंचित कैसे किया जा सकता है ? महिला मंदिर जाए या नहीं , यह वह खुद तय करे । मगर तुम औरत हो इसलिए यहाँ मत जाओ – यह बताने का किसी को भी अधिकार नहीं है । ‘ संविधान में व्यक्ति – स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों में शामिल है ।

प्रारंभिक वक्तव्य .

इप्टा रायगढ ने बहुत ही समसामयिक पुस्तक प्रकाशित की धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर. जिसका संयोजन जानी मानी रंगकर्म उषा आठले वैरागकर ने किया है .

मुझे यह पुस्तक कपूर वासनिक जी के माध्यम से मिली ,वो बिलासपुर में हम सभी को पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे है . नरेन्द्र दाभोलकर की अब और ज्यादा जरूरत भारत की मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में प्रायः धर्म और जाति के सवालों पर चर्चा कम मिलती है । धर्म और जातियों का विभेद दूर हुए बिना समाज – परिवर्तन या व्यवस्था – परिवर्तन नहीं हो सकता , भारतीय परिप्रेक्ष्य में अब इस पर विचार करने की पहल हो चुकी है और कुछ क्षेत्रों में इस दिशा में आंदोलन की नींव भी पड़ गई है । जाति – उन्मूलन की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं । भारत का समाज सिर्फ वर्गाधारित समाज नहीं है । उसमें धर्म – सम्प्रदाय जाति – उपजातियों की अनेक दृश्य – अदृश्य दीवारें खड़ी हैं । इनकी जड़े भी बहुत गहरी हैं । इसलिए इस वास्तविक परिस्थिति से जमीनी स्तर पर जूझते हुए ही वामपंथी आंदोलन आगे नए रास्ते खोज पाएगा ।

जब 2015 में नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई , उस समय से ही यह सवाल करेद रहा था कि अंध श्रद्धा निर्मुलन का काम क्या वाकई इतना अधिक अवरोधक है कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी । इस बीच रावसाहेब कसले की किताब भक्ति और धम्म का अनुवाद करते हुए मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि समूचे विश्व में ही धर्म नामक संस्था का कितना जबर्दस्त प्रभाव मध्य युग से रहा है और आज उसकी जड़े और भी फैलकर अपना रूप बदल चुकी हैं । अब धर्म की राजनीति शुरू हो गई है । ऐसे समय में धर्म की प्रचलित धारणाओं के प्रति अपनी सैद्धांतिकी पर हमें पुनर्विचार करना ही होगा । यूट्यूब पर नरेन्द्र दाभोलकर से पचीस सवालों का एक धारावाहिक , लघु जवाबों के रूप में ( हर्षल जाधव संपादित ) जब मैंने मराठी में सुना तो मुझे लगा कि उनकी अधिकांश किताबों का हिंदी अनुवाद हो चुकने के बावजूद इस सीरीज के छोटे – छोटे सवाल – जवाबों के आधार पर पुनर्विचार के लिए बिंदु प्रस्तुत किये जाने चाहिए .

उषा आठले

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