शिक्षा-स्वास्थय

13. सवाल ईश्वर को मानने – न मानने को लेकर ‘ – धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर.

  1. जब आप यह सवाल मुझसे करते हैं कि क्या मैं ईश्वर को नकारता हूँ , तो मैं यही कहूँगा कि आपने ईश्वर की व्याख्या नहीं की है । अगर आप मुझसे पूछते कि क्या दुनिया का निर्माण करने वाले तथा उसे नियंत्रित करने वाले ईश्वर को मैं नकारता हूँ ? या चमत्कार करने वाले ईश्वर को मैं नकारता हैं या फिर मनौती को पूरा करने वाले ईश्वर को मैं नकारता हूँ ? तो निस्संदेह मैं कहता कि हाँ , मैं इस ईश्वर को नकारता हूँ । मगर यदि आप मुझे उस ईश्वर के बारे में पूछते हैं , जिसकी अवधारणा गाडगे बाबा ने प्रस्तुत की थी , तो मेरा उत्तर दूसरा होगा .
  2. शायद आप न जानते हों कि गाडगे बाबा लगातार तीस वर्षों तक आषाढ़ और कार्तिक महीने की एकादशी के दिन पंढरपुर जाते थे परंतु उन्होंने न तो कभी उपवास किया और न ही वे एक बार भी मंदिर में गए । वे सिर्फ लोगों द्वारा गंदा किया गया चंद्रभागा नदी का किनारा अपनी झाडू से साफ करते थे और रात में कीर्तन करते थे । वे अपने सामने इकट्ठा हुये श्रोताओं से पूछते थे कि ‘ ‘ क्या आपने ईश्वर को देखा है ? ‘ ‘ लोग सोते थे , कमाल है ! आखिर हम यही ईश्वर के दर्शन के लिए ही तो आए हैं । वे कहते थे देखा है , बाबा कहते थे , आश्चर्य है कि आपने ईश्वर को देखा ! आपका ईश्वर कहाँ रहता है ? लोग सोचते थे कि इस आदमी को कुछ भी पता नहीं है । वे कहते , ‘ ‘ हमारा ईश्वर मॅदिर में रहता है । वह ईट पर खड़ा है , साँवला है , कमर पर हाथ रखे हुए हैं , उसके गले में रामाई । खड़ी है । बाबा कहते थे , ‘ ‘ कमाल है , आपका ईश्वर मंदिर में रहता है , मेरा ईश्वर मेरे । मन में रहता है । लोग इस पर भी कुछ नहीं समझते थे । फिर वह पूछते थे , ‘ ‘ आपके भगवान जाते है ? ‘ ‘ लोग कहते , ‘ ‘ हाँ , नहाते हैं । ‘ ‘ बाबा पूछते , ‘ ‘ आपके भगवान को कौन नहलाता है ? वे कहते , ‘ ‘ हम ही नहलाते हैं जी ! ‘ ‘ बाबा कहते थे , आपका ईश्वर , जो खुद नहीं नही सकता , वह दूसरों को भाग्य का स्नान कैसे कर सकता है ? आगे बाबा पूछते थे , आपके ईश्वर धोती पहनते हैं क्या ? ‘ ‘ लोग कहते थे , ‘ ‘ पहनते हैं । उन्हें । जो धोती कौन पहनाता है ? वे कहते , ‘ हम पहनाते हैं । ‘ बाबा इस पर भी कहते कि , ईश्वर खुद की धोती खुद नहीं पहन पाता , वह दूसरों को भाग्य का वस्त्र कैसे देगा ? फिर से बाबा पूछते , ‘ ‘ आप अपने ईश्वर को भोग लगाते हैं या नहीं ? ‘ ‘ लोग कहते ‘ लगाते हैं । बाबा पूछते , ‘ ‘ भोग लगाकर क्या करते हैं आप ? ” लोग बताते थे , ‘ भोग लगाकर उसके पास लाठी लेकर बैठते हैं ताकि भोग को कौआ – कुत्ता न खा लें , उन्हें जो भगवान खुद भगाने के लिए ऐसा करना पड़ता है । इस पर बाबा कहते थे कि के लिए लगाए गए भोग की रक्षा नहीं कर सकता , वह आपके जीवन की रक्षा कैसे कर सकेगा ?

दोस्तों , इसके बाद बाबा एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल करते थे कि , ‘ ‘ क्या आपने जीवित ईश्वर देखा है ? किसी ने भी जीवित ईश्वर को नहीं देखा था । लोग बगले झाँकने लगते थे .
गाडगे बाबा के बगल में मेहनतकश चेहरे , सफेद दाढ़ी , खादी का मोटा – झोटा कपड़ा पहने , नंगे पैर एक आदमी खड़ा था , बाबा उसकी ओर इशारा करते हुए कहते थे , ये भाऊराव पाटिल हैं , इन्हें देखो । ये महार – माँगों के बच्चों को पढ़ाते हैं . ये ही सचमुच के ईश्वर हैं । उस गांधी बाबा को देखो , जो देश के लिए जी – जान से जुटे हुए हैं , उन्हें ईश्वर कहो । अर , अनपढ़ को शिक्षा दो , बीमारों को दवा दो बेघर को धर दो , दीन – दुखियों की सेवा करो , मूक जानवरों पर दया करो । दोस्तों , ईश्वर उनमें रहता है , मंदिर में नहीं रहता । भगवान अपने मन में होता है मंदिर में सिर्फ पुजारी का पेट होता है ।

इस उदाहरण के बाद डॉ . दाभोलकर निष्कर्ष रूप में कहते हैं कि , ‘ अर्थात् आप ईश्वर किसे मानते हैं , इस पर अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का जवाब निर्भर करता है । अगर आप कहेंगे कि नैतिकता के पुतले के रूप में ईश्वर को देखते हैं तो मेरा कहना है कि मेरा विवेक मुझे आदेश देता है नैतिकता का पालन करने का । अगर आपका ईश्वर भी यही आदेश देता है तो मैं उसका स्वागत करूंगा । ‘ डॉ . दाभोलकर ने धर्म में ईश्वर और नैतिकता की पाखंडभरी व्याख्या पर प्रश्नचिन खड़ा किया है ।

**

प्रारंभिक वक्तव्य ः

इप्टा रायगढ ने बहुत ही समसामयिक पुस्तक प्रकाशित की * धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर.* जिसका संयोजन जानी मानी रंगकर्म उषा आठले वैरागकर ने किया है .

मुझे यह पुस्तक कपूर वासनिक जी के माध्यम से मिली ,वो बिलासपुर में हम सभी को पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे है . नरेन्द्र दाभोलकर की अब और ज्यादा जरूरत भारत की मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में प्रायः धर्म और जाति के सवालों पर चर्चा कम मिलती है । धर्म और जातियों का विभेद दूर हुए बिना समाज – परिवर्तन या व्यवस्था – परिवर्तन नहीं हो सकता , भारतीय परिप्रेक्ष्य में अब इस पर विचार करने की पहल हो चुकी है और कुछ क्षेत्रों में इस दिशा में आंदोलन की नींव भी पड़ गई है । जाति – उन्मूलन की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं । भारत का समाज सिर्फ वर्गाधारित समाज नहीं है । उसमें धर्म – सम्प्रदाय जाति – उपजातियों की अनेक दृश्य – अदृश्य दीवारें खड़ी हैं । इनकी जड़े भी बहुत गहरी हैं । इसलिए इस वास्तविक परिस्थिति से जमीनी स्तर पर जूझते हुए ही वामपंथी आंदोलन आगे नए रास्ते खोज पाएगा ।

जब 2015 में नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई , उस समय से ही यह सवाल करेद रहा था कि अंध श्रद्धा निर्मुलन का काम क्या वाकई इतना अधिक अवरोधक है कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी । इस बीच रावसाहेब कसले की किताब भक्ति और धम्म का अनुवाद करते हुए मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि समूचे विश्व में ही धर्म नामक संस्था का कितना जबर्दस्त प्रभाव मध्य युग से रहा है और आज उसकी जड़े और भी फैलकर अपना रूप बदल चुकी हैं । अब धर्म की राजनीति शुरू हो गई है । ऐसे समय में धर्म की प्रचलित धारणाओं के प्रति अपनी सैद्धांतिकी पर हमें पुनर्विचार करना ही होगा । यूट्यूब पर नरेन्द्र दाभोलकर से पचीस सवालों का एक धारावाहिक , लघु जवाबों के रूप में ( हर्षल जाधव संपादित ) जब मैंने मराठी में सुना तो मुझे लगा कि उनकी अधिकांश किताबों का हिंदी अनुवाद हो चुकने के बावजूद इस सीरीज के छोटे – छोटे सवाल – जवाबों के आधार पर पुनर्विचार के लिए बिंदु प्रस्तुत किये जाने चाहिए . – उषा आठले

Related posts

सुकमा मुख्यालय के पास तक नहीं मिल रहा है शुद्ध पानी . आयरन युक्ति पानी पीने को मजबूर .

News Desk

17.महिलाओं के मंदिर – प्रवेश पर केन्द्रित अंधविश्वास क्या उचित है ? संदर्भ : धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार – नरेन्द्र दाभोलकर.

News Desk

योगीराज में : विमल भाई का लेख

Anuj Shrivastava