आंदोलन मजदूर

1 मई अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर विशेष मई दिवस का आह्वान – तुहिन देब


इस वर्ष मजदूर वर्ग पूरी दुनिया में मई दिवस ऐसे समय में मना रहा है जब सभी क्षेत्रों उन पर चौतरफा हमला दिन-ब-दिन तेज होता जा रहा है। द्वितीय अन्तर्राष्ट्रीय का 4 जुलाई 1889 को पेरिस में सम्मेलन हुआ था जिसमें 1890 से एक मई को अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था, क्योंकि यह वह दिन था जब अमेरिका में शिकागो शहर के मजदूरों ने ‘‘आठ घण्टे काम, आठ घण्टे आराम और आठ घण्टे मनोरंजन’’ के नारे के साथ ऐतिहासिक जुलूस निकाला था और मजदूरों ने अपने रक्त से बने लाल झण्डे को फहराया था। तब से अब तक मजदूर आन्दोलन ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं।

1 मई 1886 का शिकागो का मजदूर आन्दोलन मजदुर वर्ग के संघर्षो के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मुकाम के रूप में दर्ज है। इस दिन शिकागो (अमेरिका) के हे मार्केट में पूंजीपतियों की सरकार ने निहत्थे मजदूरों की निर्ममता से हत्या कर आन्दोलन को दबाने की कोशिश की थी। मजदुर वर्ग ने अपने संघर्ष के बलबूते पर आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटा मनोरंजन की अपनी मांग को हासिल कर दुनिया के मजदूरों कि संदेश दिया की मजदुर वर्ग संगठित होकर संघर्ष करने से पूंजीपति वर्ग से सत्ता छीन सकता है।


लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के समय से, विशेष रूप से विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन को धक्का लगने के बाद मजदूर वर्ग पर हमला काफी तेज हो गया है। नव-उपनिवेशिक व नव-उदारवादी दौर में पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था पागल सांड़ की तरह एक तरफ तो मजदूरों व्दारा जीतकर हासिल अधिकारों को खत्म करने के लिए हमला कर रही है, वहीं दूसरी तरफ उसने आक्रामक जुआड़ी बाजार कट्टरपंथ का रूप धारण कर लिया है। इसका परिणाम है कि ‘रोजगार विहीन विकास’ हो रहा है, स्थाई रोजगार खत्म हो रहे हैं और ठेका श्रमिक प्रथा का विस्तार हो रहा है। इसकी वजह से मजदूर वर्ग आर्थिक, राजनैतिक, सांगठनिक और वैचारिक रूप से कमजोर हुआ है। वर्ग संघर्ष की हकीकत पर पर्दा डालने के लिए साम्राज्यवादी चिन्तक ‘सभ्यताओं का टकराव’ जैसी प्रतिगामी विचारधाराओं का प्रचार कर रहे हैं।

पूरी दुनिया में इस्लाम-विद्वेष फैलाया गया है और सभी किस्म के धार्मिक कट्टरपंथी, नस्लवादी, जातिवादी ताकतों को बढ़ावा दिया गया है। मौजूदा पूंजीवादी जनवादी अधिकारों को भी छीन लिया गया है और पूंजीवादी राजसत्ता ज्यादा-से-ज्यादा घोर दक्षिणपंथी, नव-फासीवादी और कॉर्पोरेट राजसत्ता में बदलती जा रही है। यह मजदूर वर्ग और तमाम मेहनतकश जनता से सामने सबसे बड़ी चुनौती है। इस नव-उपनिवेशिक हमले का असर इतना गंभीर है कि इसने मजदूर वर्ग और उसके राजनैतिक अगुवा दस्ते को वैचारिक, राजनैतिक, सामाजिक और सांगठनिक रूप से निहत्था कर दिया है। नतीजे में, मजदूर वर्ग और उत्पीड़ित जनता हर जगह प्रतिरोध संघर्ष कर रही है।

कई जगह जनविद्रोह इतना ताकतवर रहा है कि उसने जन-विरोधी ताकतों को सत्ता से बेदखल भी कर दिया है। किन्तु मौजूदा प्रतिक्रियावादी शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने और उसकी जगह एक प्रगतिशील साम्राज्यवाद-विरोधी शासन कायम करने में अब तक कामयाबी नहीं मिली है। दुनिया को नियंत्रण में रखने वाली कॉर्पोरेट ताकतें इन विद्रोहों को कुचलने में सफल रही है या फिर उसने इन नवोदित ताकतों को अपनी वैश्विक व्यवस्था के अन्दर समाहित कर लिया है। साम्राज्यवाद अपनी बनाई हुई नीति के कारण स्वंय संकट में है। वह इसका समाधान निकाल पाने में असमर्थ है। इसलिए इसका भार मजदूरो और किसानों के कंधे पर डाला जा रहा है। पुरे देश में गरीबी एवं बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ रहा है। मजदूरों के साथ आम जनता संघर्ष के लिए मैदान में आ रही है। पूंजीवादी शक्तियों व्दारा एक तरफ की लफ्फाजी की जा रही तो दूसरी तरफ धर्म ,जाति जैसी फुटपरस्त भावनाओं को भड़काया जा रहा ताकि मुख्य समस्या से जनता का ध्यान भटकाया जा सके। हमारे देश में मेक इन इण्डिया के नाम पर नया रोजगार पैदा करने का झांसा देकर श्रम कानून एवं फैक्ट्री एक्ट तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम में बदलाव किया जा रहा है। मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में रोजगार पैदा होने की दर सबसे कम रही है।

सरकारी संस्थाओं में विनिवेश कर एवं सार्वजनिक क्षेत्रों को निजी हाथों में सौंपकर विदेशी एवं देशी बड़े औधोगिक घरानों को लाभ पहुँचाया जा रहा है।


हमारे देश में संसदीय चुनाव कई चरणों में जारी है। सत्तारूढ़ भाजपा एक नया नारा ‘’मोदी है तो मुमकिन है‘’ लेकर आई है। अच्छे दिन हवा हो गये, पंद्रह लाख जाने किसके खाते में गये, दो करोड़ रोजगार की जगह हर वर्ष करीब एक करोड़ बेरोजगार हो हुए हैं ,किसानो की आय दुगनी नहीं हुई तो हर दिन एक परिवार को 17 रूपए का लालीपॉप पकड़ा दिया है। उसने खाया हो या नहीं, मगर ललित मोदी, विजय माल्या ,मेहुल चौकसी और नीरव मोदी खाकर हजम हो गये। असली चौकीदार तो न्यूनतम वेतन से भी कम पर खटते रहे, नकली चौकीदार अमीरजादों की रखवाली की करता रहा। आखिर यह सब मोदी के होने से ही मुमकिन हुआ।


हाल में हुए खुलासों से एक बात साबित फिर से हुई और वह यह की मोदी ने देश में केवल और केवल तबाही और विनाश को मुमकिन बनाया। जहाँ हिंदुस्तान एयरोनाटिकल्स लिमिटेड (HAL) और भारत दूरसंचार निगम (BSNL) जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कर्मचारियों को वेतन देने में कठिनाई महसूस कर रहा है,वहीँ सूचना अधिकार कानून के तहत हासिल की गई जानकारियों यह पता चलता है की भारतीय रिजर्व बैंक को नोटबंदी पर भारी आपत्ति थी। इसके बावजूद मोदी ने यह किया और अर्थव्यवस्था को अस्त – व्यस्त कर लाखों लोगो की आजीविका को ख़त्म कर दिया।

अब लगता है की नोटबंदी एक विशाल आकार का घोटाला था और संभव है की इस तरह के और सबूत निकट भविष्य में सामने आयेंगे। नोटबंदी से असंगठित क्षेत्रों के करीब 50 लाख मजदूरों की नौकरी क्षीन गई। यह अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के एक अध्ययन से पता चला है।


मोदी राज में भारत में बेरोजगारी की दर पिछले 45 वर्षो में सबसे अधिक है। इस बीच, नीरव मोदी और उसके परिवार के सदस्यों ने पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में 13000 करोड़ रूपए की जालसाजी की। उसने भारत से भाग कर लंदन में हीरों का नया व्यापार शुरू कर लिया | असल में,ब्रिटिश अधिकारीयों ने नीरव मोदी के खिलाफ कार्यवाही में मदद करने का प्रस्ताव किया था, मगर भारत सरकार ने इसकी अनदेखी की। स्पष्ट है की अपने पांच साल के शासनकाल में मोदी सरकार ने मजदूरों और किसानों को ,छात्रों और नौजवानों को, अल्पसंख्यकों और एतिहासिक रूप से दबे – कुचले और पीडित जनता को ही निशाना बनाया है, समाज को साम्प्रदायिक और जाति के आधर पर बांटा है। उसने अपने भारी-भरकम जुमलों से छली गई जनता का ध्यान बटाने के लिए सांप्रदायिक राजनीति का इस्तेमाल किया है। पिछले पांच वर्षो में यह स्पष्ट हो गया है की मोदी सरकार के अच्छे दिन के वादे अंबानी अडानी एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए हैं, जिन्हें इस सरकार ने देश को खुलेआम लूटने की छुट दे राखी है।

विकास के नाम पर नव – उदारवादी नीतियों को जनता के ऊपर जबरन थोपा जा रहा है। श्रम एवं प्राकृतिक संसाधनों की लुट के लिए श्रम कानूनों में बड़ा फेरबदल करके कारपोरेट राज कायम किया जा रहा है। मजदूरो ने कुर्बानी देकर संगठित होने के अधिकार समेत जो भी जनवादी और ट्रेड यूनियन अधिकार हासिल किये थे, आज उन्हें ख़त्म किया जा रहा है।


133 वें श्रमिक दिवस के अवसर पर प्रगतिशील मजदुर संगठनो की मांग है कि सरकार द्वारा मौजूदा श्रम कानूनों का पालन करवाया जाय, श्रम कानूनों में कॉर्पोरेट घरानों के हितों में किये जा रहें संशोधनों को रद्द करवाया जाय, सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण रद्द करवाया जाय, ठेका प्रथा बंद करवाया जाय, मारुती, डाईकिन, नीमराना सहित तमाम मजदुर आंदोलन में गिरफ्तार साथियों को निशर्त रिहा करवाया जाय, सबके लिए रोजगार की गारंटी हो सभी क्षेत्रों और प्रतिष्ठानों में छह घंटा काम और पांच दिन का सप्ताह हो, समान काम के लिए समान वेतन के उसूल के आधार पर महिलाओं के प्रति वेतन में लैंगिक भेदभाव का अंत व महिलाओं के लिए अनुकूल कार्य परिस्थितियों सुनिश्चित करना, बेरोजगारी की स्थिति में निधार्रित वैधानिक न्यूनतम वेतन के सममूल्य अनिवार्य बेरोजगारी भत्ता प्रदान करना, मजदूरों को ट्रेड यूनियन बनाने व हड़ताल करने का अधिकार, वैधानिक पेंशन, सेवानिवृत्ति लाभ, भविष्य निधि प्रबंधन को सुनिश्चित करना तथा सभी क़िस्म की बन्धुआ मजदूरी और बाल श्रम का उन्मूलन हो।


इसलिए, जब हम मई दिवस मनाने जा रहे हैं तो आज मजदूर वर्ग के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम इन चुनौतियों का मुकाबला करते हुए आगे कैसे बढ़ सकते हैं? इसके लिए अब तक के भटकावों और खामियों को स्वीकार करने का साहस करना होगा और वर्तमान समय की ठोस परिस्थितियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर क्रान्तिकारी सिद्धान्त का विकास करना होगा और उस पर अमल करना होगा। निश्चित रूप से, यह एक कठिन काम है। किन्तु मौजूदा चुनौतीभरे समय में हर मोर्चे पर जुझने के लिए साहस करने की जरूरत है। आइए, इस मई दिवस के अवसर पर हम इस चुनौती को स्वीकार करने का साहस करें और नई दिशा के साथ संघर्ष करने का साहस करें, ताकि हम एक बार फिर से हमारे विजय पथ पर आगे बढ़ सकें।

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