कला साहित्य एवं संस्कृति

? कामरेड प्रभाकर चौबे को लाल सलाम : राजकुमार सोनी

22.06.2018

रायपुर 

छत्तीसगढ़ में लाल जोहार और लाल सलाम का नारा लगाने वालों को हिकारत की नजरों से देखा जाता है। सीधे तौर पर भक्तों का समूह यह मानझता है कि लाल सलाम कहने का मतलब माओवादी हो जाना है।

आज जब शुक्रवार को मारवाडी श्मशानघाट में प्रभाकर चौबे की अंतेष्टि के दरमियान प्रभाकर चौबे को लाल सलाम.. कामरेड प्रभाकर चौबे अमर रहे का नारा गूंजा तो वहां मौजूद बहुत से लोगों के चेहरे पर एक खास तरह का संतोष नजर आया। हालांकि कुछ इस बात के लिए बैचेन भी थे आखिर हो क्या रहा है? श्मशानघाट में भी लाल सलाम?

प्रभाकर चौबे अंतिम समय तक एक असली व्यंग्यकार तो थे ही। वे असली कामरेड भी थे। मुझे याद है। एक बार वे मुख्यमंत्री द्वारा आयोजित की गई एक पत्रवार्ता में मिले। मैं उन्हें देखते ही चहका- अरे आप? उन्होंने कहा- संपादक को भी कभी-कभी इधर-उधर आना-जाना पड़ता है। पत्रवार्ता के बाद जब नाश्ते की बारी आई तो उन्होंने कुछ भी ग्रहण नहीं किया। सारे पत्रकार उनसे आग्रह करते रहे कि कम से कम चाय- बिस्कुट तो ले लीजिए। जाते-जाते उन्होंने कहा- न तो मैं सरकार का एक रुपया किलो वाला चावल खाना चाहता हूं और न ही नमक खाने की इच्छा है। एक बार सरकार का नमक खा लो तो नमक का हक अदा करना होता है।

मैं उन्हें अंतिम समय में भी डटे रहने वाला अंतिम कामरेड इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि कामरेड रह पाना आसान नहीं होता है। मुझे भिलाई- दुर्ग के एक नहीं कई कथित साहित्यकारों के किस्से याद आते हैं। एक साहित्यकार अक्सर कहा करते थे-
आदमी 25 से 30 साल की उम्र तक कामरेड रहता है फिर थोड़ा दुनियादार होता है और 40 से 50 साल तक आते-आते सत्ता की गोद में बैठ जाता है। इसी महान साहित्यकार का एक और किस्सा मशहूर है। एक बार मीना बाजार में कुत्तों का करतब दिखाने वाला आया था। कुत्ता यह बताता था कि किसकी जेब में किस रंग का रुमाल है। किस जेब में पर्स है। कौन किस कंपनी की घड़ी पहना है। बस… साहित्यकार को लगा कि कुत्ता चमत्कारी है… उसने कुत्ते से पूछा- बताओ मार्क्सवाद का भविष्य क्या है? जब कुत्ता भविष्य नहीं बता पाया तो साहित्यकार का मोहभंग हो गया और उसने लेखक संघ से इस्तीफा दे दिया। अपने जीवन में एक नकली कामरेड यही सब करता है। वह कुत्तें से मार्क्सवाद का भविष्य पूछता है। नकली व्यंग्यकार भी यहीं सब करता है। वह अपने आसपास चापलूसों की फौज रखता और भी व्यंग्य के नाम पर चापलूसी लिखने लगता है।

प्रभाकर चौबे एक असली व्यंग्यकार थे और असली कामरेड। देहांत से कुछ पहले शायर मुमताज़ और जनकवि वासुकीप्रसाद उन्मत अस्पताल में उनसे मिलने गए थे। मुमताज ने जैसे ही कहा- कामरेड प्रभाकर चौबे को लाल सलाम…. वैसे ही उन्होंने चेहरे से आक्सीजन को खींचकर कहा- कामरेड मुमताज़ को लाल सलाम। आज श्मशानघाट में कई साथी बता रहे थे कि अपने अंतिम समय में भी वे बोल-बोलकर अपना नियमित कॉलम लिखवा रहे थे। तेजधार कविताएं सुन रहे थे।

कामरेड चौबे आपका जाना अखर गया। 
अभी आपको नहीं जाना था।

छत्तीसगढ़ में फिलहाल जो कुछ घट रहा है वह बेहद भयावह है। खौफनाक है। आप उम्र के इस पड़ाव पर भी लगातार हस्तक्षेप कर रहे थे। अब पूरी ताकत और बेबाकी से कौन यह कह पाएगा कि सरकार नकारा और निकम्मी है। नौजवानों से कौन कहेगा- सरकार की साजिश समझो। कौन कहेगा- नौजवान हो यार… जहां लात मार दोगे वहां पानी निकाल दोगे। कौन कहेगा- मैं साथ हूं तुम्हारे… तुम लिखो तो सही।

राजकुमार सोनी पत्रिका रायपुर 
98268-95207

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