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? राजगुरू शिवराम हरिनारायण /भूले बिसरे शहीद के जन्म स्थान राजगुरु नगर ( खेड ,पुणे )से .

 ⚫    70 साल से तरस रहा है सम्मानजनक स्मारक के लिए शहीद का जन्मस्थान .: पूरी पैतृक भवन को सरकार अधिग्रहित करे और उसे हेरिटेज घोषित कर संरक्षित करे राजगुरु के जन्मस्थल को : सत्यशील राजगुरु ( राजगुरु के पोते )

 ⚫  सबसे बड़ा प्रश्न कि क्या राजगुरु भगत सिंह और सुखदेव के साथ ईश्वर और धर्म के लिए कुर्बान हुये थे . यहां लिखा यो यही है .

 ⚫   क्या राजगुरु ने हेडगेवार के पास  शरण ली और उनकी रणनीति के अनुसार काम किया ।

    ⚫  चित्रों के चयन में इतिहास के साथ खिलवाड़ किया गया , जो चित्र लगे उसपर भले ही ज़्यादा प्रश्न न किये जायें लेकिन जिन चित्रों को छोड़ दिया गया उसके गम्भीर मैसेज हैं.

   ⚫  राजगुरू उपाधि उनके पूर्वजों को शाहजी महाराज ने प्रसन्न होकर प्रदान किया था.

   ⚫   भारत में एक मात्र छोटी सी मूर्ति राजगुरू नगर में.

25  मार्च 2018 ,राजगुरू नगर

डा. लाखनसिंह ,बिलासपुर छतीसगढ 

 

अभी दो दिन पहले ही इस नगर ने अमर शहीद राजगुरु का शहीद दिवस मनाया है ,मुझे जाना तो 23 मार्च को ही था लेकिन हो नही पाया . पुणे से नासिक रोड पर करीब 45 किलोमीटर पर स्थिति खेड़ गांव को ही नाम दिया गया है ,राजगुरु नगर .

राजगुरू के बड़े भाई के पोते सत्यशील राजगुरु से हमारा सम्पर्क हुआ था कुछ महीने पहले , उन्होंने ही जन्म स्थान के बारे में बताया था ,वे पुणे में रहते हैं ,उनकी छोटी सी मोटर सायकिल रिपेयरिंग की दुकान है यहीं वे रहते भी हैं .
राजगुरु नगर में प्रवेश करते ही भीमा नदी का पुल पार करते ही बाएं तरफ पुलिस थाने के पास के ही मोड़ से थोड़ी दूर पर ही हैं उनका निवास .

यह दूसरी बार था जब में किसी क्रांतकारी के जीवन से जुड़े स्थान पर जाने का अवसर मिल रहा था . इसके पहले पंजाब के हुसैनीवाला बार्डर पर जाना हुआ था जहाँ अमर शहीद भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव की समाधि बनी है और आज उनमें से एक राजगुरू के घर पहुचा था .

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिये यह बहुत भवनात्मक क्षण थे ,मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब भगतसिंह की समाधि पर पहुचे थे और मैने वहाँ इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाना चाहा था तो मेरा गला भर आया था ,और में नारा पूरा नहीं कर पाया था ,आज भी जब में राज गुरु के जन्म वाले कमरे में गया और फूल अर्पित किया तब भी भावविहल हो गया हूँ .

स्वतन्त्रा के लिए शहीद भगत सिंह ,सुखदेव ,राज गुरु हों या शहीद चन्द्र शेखर आज़ाद इनको इतना पढा और मेहसूस किया है कि लगता हैं कि वे हममे में से ही कोई एक है .

 

? जन्म स्थान

राजगुरु परिवार का बहुत बड़ा बाडा है जो 60 हजार वर्ग फीट मे है जबकि करीब 3788 वर्ग मीटर भवन निर्माण फैला है ,यह भीमा नदी के तट पर स्थित है ,मूल रूप से दो हिस्सों में बंटा है ,एक जन्म स्थान और दूसरे में उस समय रहवास रहा होगा . एक तिहाई स्थान स्मारक के रूप में है बाँकी पर अभी भी छोटे छोटे किरायेदार या दूर के रिशतेदार बसे हैं .

छोटी सी गली में सामने एक बडा दरवाज़ा है.जिसपर लिखा है ” हुतात्मा राजगुरु स्मारक समिति . अंदर प्रवेश करते हुऐ एक तरफ कुछ परिवार रहते है ,मुझे लगा कि यह राजगुरु के वंशज होंगे लेकिन वे वर्षों से रह रहे किराएदार हैं ,खैर आगे बढिये तो थोड़ा उतर कर सामने झोपड़ी जैसा मकान है ,यही उनका जन्मस्थान है .

 

? देव देश अन धर्मापाई प्राण घेतले हाती 

छोटे से दो कमरे के झोपड़ी नुमा घर मे प्रवेश करने पर दाई तरफ एक कमरा है जिसमें राजगुरु का जन्म हुआ था , एक आले ( मन्दिर नुमा स्थान ) में राजगुरु का चित्र और सामने हमेशा एक दीपक जलता रहता है . ऊनकी तस्वीर पर फूल अर्पित करते समय बहुत गम्भीर वातावरण बन गया और मन बहुत भारी हो गया ,सारा द्र्श्य आंखों के सामने घूम गया और आंखों में आँसू आ गए गला भर गया.

 

नगरनिगम की कार्यकर्ता विदुषी ने बताया कि राजगुरू धर्म के लिये बलिदान हुये , मेने सहज प्रश्न किया कि किस धर्म के लिये तो उन्होंने तत्काल कहा अपने हिन्दू धर्म के लिये .

आगे बताया कि उस  समय ब्राह्मणों में डिलेवरी घर मे नही करते थे उसके लिये अलग स्थान होता था ,इसी लिये मूल घर के पास झोपड़ी जैसा घर बनाया गया था ,यही उनका जन्म हुआ था .कमरे का बड़ा अध्यात्मिक और पवित्र सा माहौल बनाया गया है ,मानो किसी मंदिर में प्रणाम करने आये है .

देव देश अन धर्मापाई प्राण घेतले हाती ,ठीक ठीक यही उस कमरे के बाहर लिखा है , देव देश और धर्म के लिये अपने प्राण दिये . यही मूल संदेश है जो यहाँ के हर स्थान पर परलक्षित होता हैं , और यही मूल फर्क राजगुरु और भगत सिंह के परिवार में दिखता है . यही फर्क यहाँ के हर जगह दिखाई देता भी हैं .

( मुझे नही मालुम कि यह अभिव्यक्ति राजगुरू का प्रतिनिध्व करती हैं या उनके परिवार या स्मारक निर्माण समिति के सदस्यों की ,क्योकि की जितना मेने क्रांतिकारियों को खास कर भगत सिंह और उनके साथियों को उनमे से कोई धर्म या देव के लिए लड़ाई नहीं लड़ रहै थे . जो भी हो यह वाक्य मैरे लिये अचंभित करने वाला था .)

आले के ठीक सामने नीचे की तरफ गहरी एक अनाज़ कोठी बनी है ,जिसमे उस परिवार का अनाज रखा जाता होगा . 8 x 6 के कमरे में पूरी दीवाल क्रांतिकारियों के ब्लेक व्हाइट तस्वीरों से भरी है .( तस्वीरों के कन्टेंट पर बाद में बात करेंगे ) इस कमरे के पहले थोड़ा बड़ा हॉल बना है ,इसमें दाईं तरफ तांबे के कलश में हुसैनीबाला स्थित शहीदों की समाधि स्थल की पवित्र मिट्टी दर्शन के लिये रखी गई है ,और यह कमरा भी बेतरतीव चित्रों से भरा है .भगतसिंह ,सुखदेव ओर राजगुरु के बडे चित्र और समाधि स्थल के फोटो रखे हैं . जिनकी जिम्मेदारी हैं स्थल के बारे में बताने की उन्हें सामान्य जानकारी ही है .

इसी कमरे के बाहर नीचे उतर कर नदी के किनारे तरफ दालान है , जहां कुछ रंगीन झंडे लगे हैं .
वे कहती हैं ,की आपको परसों आना था (23 मार्च ) हर साल 23 मार्च ( शहीद ) और 24 अगस्त ( जन्म दिन ) को यहां बड़ा आयोजन होता है . बस स्टेंड पर राजगुरु की मूर्ति के पास समारोह होता है और शाम ठीक 7.30 बजे पूरे शहर की बिजली बंद कर दी जाती हैं (इसी समय तीनो को लाहौर में फांसी दी गईं थी ) मूर्ती स्थल से मशाल जुलूस निकल कर उनके घर तक आता है और यहाँ उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किये जाते हैं . इस समारोह के चित्र भी रखें है यहां पर .यहां उनके इस घर के पुराने चित्र भी रखे हैं .

 

जन्म स्थान खोली के बाएं तरफ और मुख्य द्वार के दाएं तरफ इनका मुख्य बाड़ा है ,जो किले नुमा दीवाल के पास खुलता है , डिंडी दरवाजा बड़ा और नक्काशीदार हैं , मुख्य बाडा थोरला बाडा नाम दिया हे .पडोस से चाबी मिलने के बाद दरवाजा खुला ,घुसते ही एक छोटासा मन्दिर का कमरा और बाद में लकड़ी से मढा हुआ दो लम्बे बारादरी जैसे कमरे है थोड़ी ऊंचाई पर ,कमरे का बाहरी हिस्सा खुला हुआ है .तीन दिशा से कवर यह कमरे पूरे खाली हैं ,दोनो कमरों में शहीदों और ऐतिहासिक लोगों के फोटो लगे हैं ,निश्चित ही अनाकर्षक और बेतरतीव इनमे आपस मे कोई तारतम्य नही है .लगता है जैसे एतिहासिक पुस्तकों से चित्र निकाल कर शीट में बनवा लिए है . दोनो कमरों के बीच एक लकड़ी की सीढ़ी से ऊपर जाकर ऐसे ही दोनों दिशाओं में बारादरी बनी है ,सड़क तरफ लकड़ी से खिड़की बना दी है जिससे नीचे देखा जा सकता हैं ।यहाँ भी एक तरफ कुछ कार्यक्रम के फ़ोटो और दूसरी तरफ़ खाली जगह पड़ी है .

देखने से कहीं भी न एतिहासिक भवन का और न अंग्रेजों से संघर्ष का एहसास होता है ,कमसे कम अंग्रेजों के लिये गुस्से का एहसास तो न के बराबर .
मूल भवन चटक रंग और आधुनिक डिजाइन से बनाया गया लगता हैं .
जिनको इसके पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी दी गई यही उन्हें समय काल और स्थिति का ज्ञान न के बराबर था .)

? हेडगेवार और राजगुरु

एक कहानी और स्थापित की गई है कि सांडर्स के हत्या के बाद वे नागपुर आ गए थे और वहाँ संघसरसंचालक डा. केबी हेडगवार के पास आ गये थे ,और यहां अंडर ग्राउंड रहे तथा हेडगेवार की रणनीति पर ही आगे काम किया था .
यह कहानी एसे हेडगेवार की जीवनी में दर्ज है

जब 1928 में लाहौर में उप कप्तान सांडर्स की हत्या के बाद भगतसिंह ,राजगुरु और सुखदेव फरार हुए तो राजगुरु फरारी के दौरान नागपुर में डा.हेडगेवार डा. केशव राव बलीराम हेडगेवार (Keshav Baliram Hedgewar) के पास पहुचे थे जिन्होंने उमरेड में एक प्रमुख संघ अधिकारी भय्या जी ढाणी के निवास पर ठहरने की व्वयस्था की थी 

अब थोडा घटनाक्रम को देखें तो पायेंगे कि अंग्रेज अफसर को गोली मारने के दूसरे दिन.राजगुरु पूणे में गिरफ्तार कर लिये गये ,तो वे कब हेडगेवार के यहां अंडर ग्राउंड रहे .
घटनाक्रम कुछ यह था .

” लाला की  के शहीद होने के ठीक एक माह बाद 17 दिसंबर 1928 दिन  स्कॉट की हत्या के लिए निर्धारित किया गया. लेकिन निशाने में थोड़ी सी चूक हो गई. स्कॉट की जगह असिस्टेंट सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस जॉन पी सांडर्सक्रांतिकारियों का निशाना बन गए.

सांडर्स जब लाहौर के पुलिस हेडक्वार्टर से निकल रहे थे, तभी भगत सिंह और राजगुरु ने उन पर गोली चला दी. भगत सिंह पर कई किताब लिखने वाले जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर चमन लाल के मुताबिक, ‘सांडर्स पर सबसे पहले गोली राजगुरु ने चलाई थी, उसके बाद भगत सिंह ने सांडर्स पर गोली चलाई.’

राजगुरु ने भगत सिंह के साथ मिलकर सांडर्स को गोली मारी थी। राजगुरु ने 28 सितंबर, 1929 को एक गवर्नर को मारने की कोशिश की थी। जिसके अगले दिन उन्हें पुणे से गिरफ्तार कर लिया गया था.

राजगुरू के पोते सत्यशील राजगुरु भी कहते हैं कि सांडर्स की ह्त्या के बाद वे बनारस कलकत्ता और लाहौर में छिपकर रहे, और दूसरी बार अंग्रेज अधिकारी पर हमले के दूसरे दिन पूणे से गिरफ्तार हो गये..

वैसे भी संध का इतिहास आज़ादी के आंदोलन मे कभी भी अंग्रेजो के विरोध का नहीं रहा .बल्कि हिंदू नौजवानों को आजा़दी आंदोलन से.अलग रखने का था.

 

? कुछ तसवीरों का न होना गंभीर संदेश देता हैं.. 

वैसे तो पूरे निवास में धरोहर जैसी कोई चीज नही है .लेकिन चित्रों की भरमार है, जो मुझे लगता हैं बिना किसी खास अध्यन के लगा दिए गए है ,अधिकतर चित्र् सस्ते फ्लेक्स पर बने हैं और चटक रंग के है मानो किसी झांकी या मंच के लिये बनाये गये है .
बाड़ा की मुख्य दीवाल पर आठ फोटो हैं .शिवाजी, सावरकर , चंन्द्र शेखर आजा़द , लोकमान्य तिलक , रानी लक्ष्मी बाई , स्वामी विवेकानंद ,सुभाषचंद्र बोस , तात्या टोपे और चापेकर बंधु .

लगभग एसे ही चित्र जगह जगह लगे है , मुझे इनके फोटो लगाये जाने में कोई समस्या नही लगी , लेकिन कुछ फोटो न लगाये जाने के गंभीर संकेत लगे . आप कह सकते हैं कि सावरकर और लोकमान्य तिलक के साथ महात्मा गांधी क्यों नहीं , चन्द्रशेखर के साथ भगत सिंह भी होते तो ठीक होता ,सुभाष के साथ नेहरू के योगदान को कैसे भूल सकता है भारत , झांसी की रानी लक्ष्मी बाई है तो 1857 की क्रांति में विद्रोह के नायक बहादुर शाह जफ़र को कैसे कोई भूल सकता हैं ,जिनके बेटों का सर काट कर अंग्रेजों ने बादशाह को पेश किया और जिनकी मौत रंगून मे अंग्रेजों की कैद में हुई. तात्या टोपे को जरूर याद करना चाहिये लेकिन अंग्रेजो से लडते हुए अपने प्राण गँवाने वाले टीपू सुल्तान को भी याद किया जाना था. शिवाजी और स्वामी विवेकानंद का आजा़दी के आंदोलन मे जरूर कोई योगदान इन्होंने खोज लिया होगा .

मेंने वापस आकर शहीद राजगुरू के पोते सत्य शील राजगुरू से पूछा भी कि दीवारों पर तस्वीरों के चयन के लिये क्या प्रक्रिया अपनाई गई थी . उन्हीने बड़े भोलेपन से कहा कि यदि कोई फोटो नहीं लग पाया है तो आप बता दीजिए में लगवा दूंगा .मेने फिर चयन प्रक्रिया की बात कही तो वे बोले कि स्मारक समिति के अध्यक्ष गांव के सरपंच है उन्होंने ही तय किये हैं .

में लगाये गये चित्रों पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ ,निश्चित ही उनका योगदान है , लेकिन जिन चित्रों को छोड़ दिया गया वो भले ही जानबूझकर न हो लेकिन एक व्यक्ति विकृत राजनीतिक इतिहास को जरूर इंगित करता है .

 


? राजगुरु की एक मात्र मूर्ति .

कोई यह कहे कि राजगुरू की पूरे देश मे यह एकमात्र मूर्ति है ,तो सचमुच आशचर्य तो होता ही हैं . राजगुरु नगर के व्यस्तम बस स्टैंड पर छोटे से सर्किल में राजगुरु की छोटीसी प्रतिमा लगी है , इस मूर्ति 1978 में अनावरण किया था यशवंत राव चव्हाण ने बसंत दादा पाटिल की अध्यक्षता में. मूर्ती के आसपास न कोई गार्डन है और न ही कुछ खास स्पेस .आप कल्पना कर सकते है , बस की भारी आवाजाही में धूलधूसरित मूर्ति की . सही में यह क्रांतकारी शहीद जिन्होंने इंकलाब के नारे लगाकर फांसी का फंदा चूमा हो और उसके पहले अंग्रेज गवर्नर को लिखा हो कि हमे फांसी नही गोली से उडा दिया जाये , एसे महान राजगुरु के लिये कांग्रेस और राष्ट्र्वाद
राजनीति करने वाली भाजपा या शिवसैना ने यथा उचित सम्मान तक नहीं दिया .
आज भी मूर्ति पर जो रंगरोगन या मंडप दिखाई दे रहा था वो दो दिन पहले 23 मार्च को नगरवासियों द्वारा मनाया गया समारोह था.

 

? 71 साल से राष्ट्रीय स्मारक की बाट जोहता शहीद का घर .

शहीद राजगुरु के बडे भाई के पोते सत्य शील राजगुरू पुणे में रहते हैं ऊनकी एक मोटर साईकिल के रिपेयरिंग की छोटी सी दुकान हैं .उनसे परिचय मेरी पुत्रवधु शर्मिष्ठा से बैंक की वज़ह से परिचय था ,उन्होंने ही राजगुरु के जन्मस्थान और गाँव में होने वाले सालाना जलसे के बारे में बताया था ,इसी वजह से हमें वहाँ जाने का अवसर मिला .

मैने उनसे बहुत बातें की ,उन्होंने बताया कि हमारे सभी पूर्वज संयुक्त परिवार में ही रहते थे ,इसलिये हमारा घर बहुत बडा करीब 3330.वर्ग मीटर का था ,हवेली नुमा और मजबूत .1995 में हमारे पूरे परिवार ने.तय कीरा कि हमसब अपने छोटे मोटे हिस्से को जोडकर सरकार को दे देंगे ताकि वह हमारे दादाजी की स्मृति में स्मारक बना सके. यह पहल हमारे ही परिवार ने की कभी सरकार ने हमसे यह सम्पत्ति की मांग नही की. काफी भागदौड़ के बाद केन्द्र सरकार ने हमारी अर्ज़ी स्वीकार कर भी ली ,और आरकोलोजी विभाग ने कहा कि पहले जैसा भवन था हमे वैसा बना कर दे दीजिये .

काफी भागदौड के बाद 10,12 लाख रूपये स्वीकृत भी किये गए . हमने स्थानिय स्तर पर हुतात्मा राष्ट्रीय स्मारक समिति का गठन कर लिया जिसके अध्यक्ष पंचायत के.सरपंच बने और नगर के गणमान्य लोग शामिल हुये .
हमारा परिवार चाहता था कि पूरे मकान का अधिग्रहण सरकार कर ले ,क्यों कि करीब 70 फीसदी घर पर अभी भी पुराने किरायेदार रहते है, किसी के पास एक खोली हैं तो किसी के पास दो खोली . यह सभी लोग उनकी स्मृति के लिए मकान खाली भी करना चाहते है ,लेकिन वे चाहते है कि उनके रहने की वैकल्पिक व्यवस्था सरकार कर दे .और इस मकान को हेरीटेज घोषित कर दे .

स्मारक के लिए जो 10,12 लाख रुपये मिले थे उसमे के करीब 6 लाख एक अधिकारी ने गडबड कर दिये थे .इसके लिये भी एक बडा आदोलन करना पडा ,नगर तक बंद हुआ तब जाकर पैसा वापस मिल पाया ।
इस पैसे से राजगुरू का मूल जन्म स्थान की मरम्मत की गई और जसका तस बनाया भी गया ,साथ ही बाड़े में एक तरफ लकड़ी का काम हुआ ,सीढ़ी बनी और ऊपर की दो तरफ़ की बारादरी को बनाया गया
सत्यशील राजगुरु कहते हैं कि अभी दो साल पहले राज्य सरकार ने 5 करौड रुपये स्वीकृत किये हैं ,लेकिन वे अभी तक समिति को मिले नहीं हैं.

आज भी शहीद राजगुरु का मूल भवन न तो हेरिटेज घोषित हो सका और न राष्ट्रीय स्मारक जैसा कुछ बन सका ,परिवार उनकी एक आदमकद मूर्ति भी लगवाना चाहता हैं ,उनका कहना है की शायद मूर्ति लगाने की कार्यवाही चल रही हैं .

 

? पाकिस्तान मे भगतसिंह कि घर हैरीटेज घोषित और उसे संरक्षित भी किया गया .

भगत सिंह का जन्म पाकिस्तान में फैसलाबाद के बंगा गांव में चाक नंबर 105 जीबी में हुआ था। और आपकी जानकारी के लिए बता दें कि करीब 4 साल पहले इस जगह को हेरिटेज साइट घोषित कर दिया गया था। इस जगह को सरंक्षित करने के बाद करीब 2 साल पहले ही इसे पब्लिक के लिए भी खोल दिया गया है। वहीं फैसलाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर ऑफिसर नुरुल अमीन मेंगल ने फरवरी साल 2014 में इसे संरक्षित घोषित करते हुए। इसकी मरम्मत के लिए 5 करोड रुपए की राशि भी खर्च की थी.

लेकिन आज़ादी के 71 साल मे कई सरकारे आई गई ,कांग्रेस की भी और राष्ट्र्वाद का ढोल पीटती भाजपा और शिवसैना की भी . किसी ने भी शहीद के परिवार की नहीं सुनी ,न उनका नाम पर सम्मानजनक स्मारक ही बना पाया.

परिवार की मांग हैं कि संपूर्ण मकान का अधिग्रहण करे सरकार और जो लोग अभी भी वहाँ रह रहे है उन्हें वैकल्पिक भवन उपलब्ध कराये ,इसे हैरीटेज घोषित किया जाये तथा संपूर्ण भवन का पूर्व की भांति पुनर्निर्माण किया जाये ,साथ ही परिवार को यथा उचित सम्मान दिया जाये ,.

? शहीद  के स्थान पर हुतात्मा

हो सकता हैं यह भाषा संस्कृति या धर्म का प्रभाव हो ,पूरे स्मारक में कहीं भी राजगुरु को शहीद या बलिदानी नही लिखा है ,जहां भी उनका नाम है उन्हें हुतात्मा से सम्बोधित किया है .मुझे लगता हैं कि हुतात्मा से शहीद कि एहसास नहीं होता .खैर

 

? कोई भी स्मृति चिन्ह नहीं है यहां .

पूरे घर मे सिवाय फोटो की भरमार के अलावा कुछ नहीं हैं , मेने उनके पोते सत्यजीत से पूछा भी तो उन्होंने बताया कि राजगुरु का एक बैग ,कलम और कुछ सामान था उसे उनकी गिरफ्तारी के बाद घर के लोगों ने जला दिया था .अर्थात उनके परिवार के पास कोई सामान उनके पास नहीं हैं .
फिर भी सरकार को चाहिए कि राजगुरु के बनारस स्थित होस्टल और उनके केस सम्बन्धी दस्तावेज़ तो रखे ही जा सकते है .
भले ही उनकि फ़ोटो कॉपी ही क्यों न हो . कोर्ट में दिये गये बयान ,उस समय के फ़ोटो आदि .
अभी यहां उनका एक मात्र ओरिजनल फोटो है जो पहले भी हर जगह उपलब्ध हैं .

? राजगुरु ने भी कहा था कि उन्हें फाँसी की जगह गोली से उड़ा दिया जाए .

फाँसी पर लटकाए जाने से 3 दिन पूर्व- 20 मार्च, 1931 को- सरदार भगतसिंह तथा उनके सहयोगियों श्री राजगुरु एवमं श्री सुखदेव ने पत्र के द्वारा सम्मिलित रूप से पंजाब के गवर्नर से माँग की थी की उन्हें युद्धबन्दी माना जाए तथा फाँसी पर लटकाए जाने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाए। यह पत्र इन राष्ट्रवीरों की प्रतिभा, राजनीतिक मेधा, साहस एव शौर्य की अमरगाथा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है.

? राजगुरू नाम की कहानी

उनके पिता शिवराम हरिनारायण अपने नाम के पीछे राजगुरु लिखते थे। यह कोई उपनाम नहीं है, बल्कि एक उपाधि है। इनके पिता पण्डित हरिनारायण राजगुरु, पण्डित कचेश्वर की सातवीं पीढ़ी में जन्मे थे। इनका उपनाम ब्रह्मे था.

एसा कहा जाता है कि एक बार जब महाराष्ट्र में भयंकर अकाल पड़ा तो पण्डित कचेश्वर एक यज्ञ किया। लगातार 2 दिनों तक घोर यज्ञ करने के बाद तीसरे दिन सुबह बहुत तेज़ बारिश शुरू हुई। जो कि बिना रुके लगभग एक सप्ताह तक चलती रही। इससे पण्डित कचेश्वर की ख्याति पूरे मराठा रियासत में फैल गई। जब इसकी सूचना शाहू जी महाराज तक पहुंची तो वह भी इनकी मंत्र शक्ति के प्रशंसक हो गए

इस समय मराठा सम्राज्य में शाहू जी महाराज और तारा बाई के बीच राज गद्दी को लेकर टकराव चल रहा था। इसमें शाहू जी महाराज की स्थिति कमजोर थी। क्योंकि मराठा सरदार ताराबाई की सहायता कर रहे थे। इसी घोर विकट परिस्थिति में शाहू जी महाराज को पण्डित कचेश्वर एक आशा की किरण लगे। इसी के चलते शाहू जी महाराज इनसे मिलने चाकण गाँव पहुंच

शाहू जी महाराज ने अपने राज के खिलाफ हो रहे षडयन्त्रों से अवगत करवाते हुए उनसे आशीर्वाद माँगा। पण्डित कचेश्वर ने आशीर्वाद देते हुए युद्ध में इनके जीतने की घोषणा की। जिसके बाद शाहू जी महाराज की अंतिम युद्ध में जीत हुई। शाहू जी ने इस जीत का श्रेय पण्डित कचेश्वर को दिया और उन्हें अपना गुरु मानते हुए राजगुरु की उपाधि दी। तभी से इनके वंशज अपने नाम के पीछे राजगुरु लगाने लगे।

 

? जीवनी ( विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी )

शिवराम हरि राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् 1965 (विक्रमी)  पुणे जिला के खेडा गाँव में हुआ था। 6 वर्ष की आयु में पिताका निधन हो जाने से बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे।

इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदो का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था

 

वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ। चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नही , चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स को मारने मेंभगत सिंह तथा सुखदेव के साथ थे , जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी।

23 मार्च 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को भारत के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया.

 

डा. लाखन सिंह ,छतीसगढ बिलासपुर 

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