कला साहित्य एवं संस्कृति

? || रफ्ता रफ्ता देखो क्‍या हो रहा है…|| ० यूनुस ख़ान

28.01.2019

० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

हिंदी सिनेमा में बीते कई सालों से एक अजीब-सा चलन सामने आया है और ये चलन है पुराने गानों को नये अंदाज़ में पेश करने का. ये गाने सत्‍तर या अस्‍सी के दशक के भी हैं और बाद के यानी नब्‍बे के दशक के भी. कई बार पुराने गाने उठाए जाते हैं—तो उनका मुखड़ा वैसा का वैसा रखा जाता है जबकि अंतरे नए लिखवा लिए जाते हैं. ऐसे गाने आने चाहिए या नहीं आने चाहिए—दोनों मुद्दों पर लोगों के अपने-अपने तर्क हैं.

हाल ही में रोहित शेट्टी की फिल्‍म ‘सिम्‍बा’ में तनिष्‍क बाग़ची ने एक गीत तैयार किया है—‘आँख मारे लड़की आँख मारे’. ये गीत सन 1996 में अमिताभ बच्‍चन की कंपनी ABCL की फिल्‍म ‘तेरे मेरे सपने’ में आया था और तब इसके संगीतकार थे वीजू शाह. यहां आनंद बख्‍शी के मूल बोलों पर गाने के नये अंतरे शब्‍बीर अहमद ने लिखे हैं. वीजू शाह के ही संगीत वाला फिल्‍म ‘त्रिदेव’ का गाना फिल्‍म ‘के.जी.एफ’ के हिंदी संस्‍करण के लिए तनिष्‍क बाग़ची ने ही रीमिक्‍स किया है. ‘गली गली में फिरता है’ के नये संस्‍करण को गाया है नेहा कक्‍कड़ ने. आनंद बख्‍शी के लिखे गाने पर नये अंतरे रश्मि विराग ने लिखे हैं. इसी तरह से फिल्‍म ‘चाइना गेट’ के गाने ‘छम्‍मा छम्‍मा’ का भी नया रूप आ गया है. फिल्‍म ‘फ्रॉड सैयां के लिए’ इसे शब्‍बीर अहमद ने लिखा है और संगीत तनिष्‍क बाग़ची का ही है. इसी तरह फिल्‍म ‘यमला पगला दीवाना फिर से’ के लिए ‘रफ्ता रफ्ता देखो आँख मेरी लड़ी है’ का रीमिक्‍स तैयार किया गया है. ‘कहानी किस्मत की’ फिल्‍म के इस गाने का संगीत कल्‍याण जी आनंद जी का था. यहां विशाल मिश्रा ने इस गाने को नया रूप दे दिया है. इस तरह के गानों की एक लंबी फेहरिस्‍त है.

अगर आप खोजें तो आपको तरह तरह के गीत मिल जाएंगे जिन्‍हें या तो रिलीज़ हो चुकी फिल्‍मों के लिए जारी किया जा चुका है या उन्‍हें जारी किया जाने वाला है। इससे साफ है कि आने वाले समय में ये सिलसिला और लंबा चलने वाला है। गानों के नये रूप आते ही चले जायेंगे। जब बीते दौर के बहुत ही मीठे और कर्णप्रिय गीत को नया रूप देने के नाम पर उसमें हाइ-बीट्स और शोर भर दिया जाता है तो बहुत कष्‍ट होता है। हालांकि बनाने वालों का कहना है कि ये उनकी कोशिश है जिससे आज के ज़माने के बच्‍चे पुराने संगीत से परिचित हो रहे हैं। वरना उन गानों को पुराना, धीमा और बोरिंग मानकर बच्‍चों ने परे हटा दिया है। पर हमारा सवाल ये है कि क्‍या सचमुच इससे संगीत का या किसी पीढ़ी का कोई भला हो रहा है। ज़रा सोचिए पुराने सुनहरे दौर के गीत हैं जो हमारे सुख-दुःख के साथी हैं। संगीत प्रतियोगिताओं और टीवी शोज़ में भी बच्‍चे उन्‍हीं गानों को गाते हैं। उन गानों से लगाव पैदा करने के नाम पर खिलवाड़ करने से बेहतर ये हो कि बच्‍चों में उन गानों को सुनने के संस्‍कार पैदा किए जाएं। आज भी तमाम रेडियो चैनल पुराने गाने बजा रहे हैं क्‍योंकि उनकी मांग हैं। श्रोता उन्‍हें सुनना चाहते हैं। आप रीमिक्‍स को कितना जायज़ मानते हैं।
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