कला साहित्य एवं संस्कृति

? || धर्मेंद्र : नाज़ुकी और फड़कते बाजूओं का संगम || ः दस्तक के लिए यूनुस खान

दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

कल धर्मेंद्र का जन्‍मदिन था

दिसंबर में पैदा होने वाले लोगों से हमारा विशेष लगाव रहा है, क्‍यों? इसका अंदाज़ा लगाने में आपको ज्‍यादा मशक्‍कत नहीं करनी होगी। वैसे… दिसंबर में दिलीप कुमार का भी जन्‍मदिन आता है।

धर्मेंद्र की कहानी, बचपन में जो दादी-नानी की कहानियां हम सुनते थे, उससे बहुत अलग नहीं है। धरम सिंह देओल नसराली पंजाब में 1935 में पैदा हुए थे। लुधियाने का एक जाट सिख परिवार। दिलीप कुमार की फिल्‍मों से धर्मेंद्र को बड़ा लगाव था बल्कि कहीं ना कहीं उनके अभिनेता बनने में यूसुफ साहब का बड़ा योगदान रहा है। धर्मेन्‍द्र ने बड़े मासूम से सपने देखे थे। पिता हेडमास्‍टर थे, फिल्‍मों से ज्‍यादा लगाव नहीं था। पर धर्मेंद्र खुद को सिनेमा के पोस्‍टर पर देखना चाहते थे। वो चाहते थे कि उनके पास एक फियेट कार हो और हो एक फ्लैट। इस तरह के सपने देखने वाला एक जज्‍़बाती नौजवान तलाश रहा था कि इनकी ताबीर का रास्‍ता क्‍या हो। तब जाने कैसे उनके हाथ *‘माधुरी’* लग गयी- जिसमें एक टैलेन्‍ट कन्‍टेस्‍ट का विज्ञापन था। उन्‍होंने अपनी जद्दोजेहद करके उसे भरकर भेज दिया।

जो लोग सोशल मीडिया पर धर्मेन्‍द्र को फॉलो करते हैं, उन्‍हें पता होगा कि काफी सालों से धरम जी को माधुरी के उस पुराने अंक की तलाश थी और उनके किसी दीवाने ने वो उन्‍हें उपलब्‍ध भी करा दिया। कितने जज्‍बाती हो गए थे धर्मेंद्र उसे देखकर।

देओल परिवार वैसे भी पर्दे पर अपने बाजू फड़काने और असली जिंदगी में जज्‍बात की नरमी के लिए जाना जाता है। ये वो लोग हैं जिन्‍हें अपने परिवार से प्‍यार है, अपने उसूलों से प्‍यार है। इनके लिए वो मरने-मारने पर तैयार हो जाते हैं। पर्दे पर कडियल नज़र आने वाले सनी से जब मैंने एक लंबी बातचीत की, तो देखा कि वो कितने शर्मीले हैं, कैसे कुछ सवालों पर उनके गाल लाल हो जाते हैं और कैसे वो बहुत ज्‍यादा केयर करते हैं अपने मेहमानों की।

हां तो फियेट धरम जी इसलिए खरीदना चाहते थे कि अगर फिल्‍मों में नाम नहीं कमा पाये तो टैक्‍सी ड्राइवर तो बन ही जायेंगे। धर्मेंद्र ने शुरूआत की *‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’* से। उसके बाद उन्‍होंने जद्दोजेहद करके अपनी जो जगह बनायी वो किसी से छिपी नहीं है। पर हमारे लिए धर्मेन्‍द्र क्‍या है। कौन से धर्मेंद्र हमारे वाले हैं। वो जो *‘चुपके चुपके’* में अपने चुटीले संवादों से हमें हंसाते हैं। या वो जो *‘सत्‍यकाम’* में अपने उसूलों से हमारा दिल जीतते हैं। या वो जो *‘अनुपमा’* में ‘या दिल की सुनो दुनिया वालो’ गाते हैं। या वो जो टंकी पर चढ़कर ‘कूद जाऊंगा मर जाऊंगा’ कहते हैं।

धर्मेंद्र तो वो भी हैं जो –‘कुत्‍ते कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा’ कहकर खलनायकों पर गोलियां और क़हर बरसाते हैं। पर मुझे वो धर्मेन्‍द्र भी अच्‍छे लगते हैं, जो *‘लाइफ इन अ मेट्रो’* में प्रेम के विछोह को जीते हुए नज़र आते हैं। धर्मेंद्र का एक पक्ष है शायरी का भी है। वो अपने खाली वक्‍त में लिखते हैं और अच्‍छा लिखते हैं। होती है तारीफ अहमियत की
इंसानियत की मगर क़द्र होती है
तरजीह ना दे ओहदे को इंसानियत पर बंदे पर खुदा की तब नज़र होती है।

आज के इस व्‍यस्‍त दिन इस लघु लेख के बाद मेरी गुजारिश है कि धर्मेंद्र की शख्सियत और उनकी फिल्‍मों से जुड़ी अपनी यादें शेयर करें
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यूनुस खान.

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