कला साहित्य एवं संस्कृति

? दुनिया के महान कवियों में से एक नाज़िम हिक़मत की पांच कविताएँ : अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल व चन्द्रबली सिंह : दस्तक़ के लिए प्रस्तुत अंजू शर्मा .

1. तुम्‍हारे हाथ

तुम्‍हारे हाथ
पत्‍थरों जैसे मजबूत
जेलखाने की धुनों जैसे उदास
बोझा खींचने वाले जानवरों जैसे भारी-भरकम
तुम्‍हारे हाथ जैसे भूखे बच्‍चों के तमतमाए चेहरे

तुम्‍हारे हाथ
शहद की मक्खियों जैसे मेहनती और निपुण
दूध भरी छातियों जैसे भारी
कुदरत जैसे दिलेर तुम्‍हारे हाथ,
तुम्‍हारे हाथ खुरदरी चमड़ी के नीचे छिपाए अपनी
दोस्‍ताना कोमलता।

दुनिया गाय-बैलों के सींगों पर नहीं टिकी है
दुनिया को ढोते हैं तुम्‍हारे हाथ।
(‘तुम्‍हारे हाथ और उनके झूठ’ कविता का एक हिस्‍सा,1949)

2. रोशनी के धुले दिन देखेंगे

बच्चो, हम सुन्दर दिन देखेंगे, देखेंगे,
सूरज की रोशनी के धुले दिन देखेंगे, देखेंगे —
खुले हुए सागर में अपनी द्रुतगामी नौकाएँ दौड़ाएँगे।
जगमग करते हुए खुले नीले सिन्धु में नावें दौड़ाएँगे।
सोचो तो पूरी गति से उन्हें कैसा दौड़ाना !

मोटर चलती हुई !
मोटर गरजती हुई !
अहाहा, बच्चो, कौन कह सकता है
कितना अद्भुत्त होगा
चूम लेना नावें जब वे सौ मील की रफ़्तार से दौड़ें !

आज यह सच है
केवल जुमा और इतवार को फूलों के बाग़ों में हम जाते
केवल जुमा के दिन
केवल इतवार के दिन
आज यह सच है
हम आलोकित पथों के भण्डार यों देखा करते हैं,
जैसे परी की कहानी सुन रहे हों
शीशे की दीवारों वाले वे भण्डार
सत्तर मंज़िलों की ऊँचाइयों में ऐसे हैं।

सच है कि जब हम जवाब चाहते हैं तो
डायन-सी पुस्तक खुल जाती है —
कारागार।
चमड़े की पेटियों में हमारी बाँहें बँध जातीं
टूटी हड्डियाँ
ख़ून।

सच है हमारी थालियों में अभी
हफ़्ते में एक दिन ही गोश्त मिल पाता है
और हमारे बच्चे काम के बाद यों लौटा करते हैं
जैसे पीली-पीली ठठरियाँ हों।

सच है अभी —
लेकिन तुम मेरी बात गाँठ बाँध लो
बच्चो, हम सुन्दर दिन देखेंगे, देखेंगे,
सूरज की रोशनी के धुले दिन देखेंगे,
खुले हुए सागर में अपनी द्रुतगामी नौकाएँ दौड़ाएँगे।
जगमग करते हुए खुले नीले सागर में नावें दौड़ाएँगे।

3 मेरी शायरी

चांदी की काठी वाला घोड़ा नहीं है मेरे पास सवारी के लिए
नहीं है गुज़ारे के लिए कोई विरासत
ज़र न ज़मीन
कुल जमा शहद की एक हांडी है मेरे पास
आग की लपटों जैसे शहद की हांडी।

मेरा शहद ही मेरा सब कुछ है
सभी किस्‍म के कीड़े-मकोड़ों से
हिफ़ाजत करता हूं मैं अपने ज़र-ज़मीन की
मेरा मतलब अपनी शहद की हांडी की।
ज़रा ठहरो,बिरादर
मेरी हांडी में जब तक शहद है
टिम्‍बकटू से भी आएंगी
मधुमक्खियां उसके

4 बीसवीं सदी

’जानेमन आओ अब सो जाएं
और जगें सौ साल बाद’

नहीं
मैं भगोड़ा नहीं
अलावा इसके,अपनी सदी से मैं भयभीत नहीं।
मुसीबतों की मारी मेरी यह सदी
शर्म से झेंपी हुई
हिम्‍मत से भरी हुई मेरी यह सदी
बुलंद और दिलेर
मुझे कभी अफसोस नहीं हुआ
कि क्‍यों इतनी जल्‍दी पैदा हो गया।

बीसवीं सदी में पैदा हुआ
फ़ख्र है इसका मुझे
जहां भी हूं अपने लोगों के बीच हूं,काफी है मेरे‍ लिए
और यह कि एक नई दुनिया के लिए मुझे लड़ना है

‘जानेमन सौ साल बाद’
मगर नहीं,पहले ही उसके और सब कुछ के बावजूद
मरती और फिर-फिर पैदा होती हुई मेरी सदी
मेरी सदी,जिसके आखिरी दिन ख़ूबसूरत होंगे
सूरज की रोशनी जैसी खुल-खुलेगी मेरी सदी
जानेमन,तुम्‍हारी आंखों की तरह।
(1941)

5 हल्‍की हरी हैं मेरी महबूबा की आंखें

हल्‍की हरी हैं मेरी महबूबा की आंखें
हरी
जैसे अभी अभी सींचा हुआ
तारपीन का रेश्‍मी दरख्‍त
हरी
जैसे सोने के पत्‍तर पर
हरी मीनाकारी

ये कैसा माजरा, बिरादरान,
कि नौ सालों के दौरान
एक बार भी उसके हाथ
मेरे हाथों से नहीं छुए।

मैं यहां बूढ़ा हुआ
वह वहां।
मेरी दुख्‍तर-बीवी
तुम्‍हारी गुदाज़-गोरी गर्दन पर
अब सलवटें उभर रहीं हैं।

सलवटों का उभरना
इस तरह नामुमकिन है हमारे लिए
बूढ़ा होना।
जिस्‍म की बोटियों के ढीले पड़ने को
कोई और नाम दिया जाना चाहिए,

उम्र का बढ़ना
बूढ़ा होना
उन लोगों का मर्ज़ है जो इश्‍क नहीं कर सकते।
(1947)
*

???


⭕ दस्तक के लिए प्रस्तुति : अंजू शर्मा

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