कला साहित्य एवं संस्कृति

० नीता पोरवाल की कविताये  :  ० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले

आज प्रस्तुत हैं समूह की साथी *नीता पोरवाल* की कविताएँ. एक कवि, एक कथाकार होने के साथ वे अच्छी अनुवादक भी हैं। २०१८ में उन्होंने चीनी साहित्य की सौ कविताओं का हिंदी अनुवाद भी किया, जिसके लिए उनकी टीम को DJS Translation Award से सम्मानित किया गया है। साथ ही वे बांग्ला बाउल गीतों और रवीन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं के साथ देश-विदेश के अनेक कवियों और कथाकारों की रचनाओं को हिंदी में रूपांतरित कर चुकीं हैं।
कविताएँ पढ़ें और चर्चा ज़रूर करें.
|| भला कह सकोगे क्या? ||
बाजुओं की ताकत
और ज़ज्बा देख
उद्व्गिन रहते हो न तुम?
फक्क पड़ जाता है
तुम्हारे चेहरे का रंग
जब पीठ पर दुधमुंहा बांधे
ईंटों के चट्टे उठाये हुए
गूँज उठते हैं गीत
हमारे सूखे पपड़ाए होठों से
हमारी जिजीविषा के साक्षी
हवा में झूलते इतराते
हमारे चुटीले के फुंदने,
रंग बिरंगी चूडियाँ कसे
भट्टी में ईंधन झोंकती हमारी कलाइयाँ
भर देती हैं न तुम्हे घोर अचम्भे से?
यहाँ तक कि
इस परम सत्य से भी किंचित
अपरिचित नही हो तुम
कि हमारे क़दमों की आहट बिना
तुम्हारे घरों की
सुबह नही होंती?
मूर्तिवत रह जाते हो न तुम
जब हमारे बच्चे
पाठशाला की चौखट छुए बगैर
झट बता जाते हैं
हवाओं और मौसमों के मिजाज़
और दुनियादारी के तमाम जोड़ घटाव?
हमें पथरीली जमीन पर
खर्राटे लेते देख
आलीशान भवनों में
हिम शिला खण्डों से तैरते
तो कभी साहिल पर
फैन उगलती लहरों से तुम
सफ़ेद-लाल-पीली गोलियाँ निगलते
गुदगुदे गद्दों पर भी रतजगे करते
अपने शुष्क हुए कंठ को
बार बार तर करते 
हमारी बेफिक्री से घबराते हो न तुम?
भला कह सकोगे क्या?
|| मरजानी लड़कियां ||
न जाने कहाँ से
ले आती हैं अपने हिस्से की
हवा और धूप
और पलक झपकते ही
घर-आँगन में महक उठती हैं हरे धनिया सी
ये मरजानी लड़कियाँ
गोल-मटोल नन्ही कलाइयों में
झमक कर पहन लेती हैं चूड़ियाँ माँ की
और खनक उठती हैं चूड़ियों सी 
ये मरजानी लड़कियाँ
न संवारों न दुलारो तो भी
न जाने कब और कैसे
ओक में भर लेती हैं अपने हिस्से की चांदनी
ये मरजानी लड़कियाँ
नींद में भी चल देती हैं
संवारने बिखरा हुआ घर
कजरी सी गूंज उठती हैं बियाबानों में
ये मरजानी लड़कियाँ
चटके दर्पण में निहारती हैं
अपनी आँखों की चमक
और खुद पर ही हो उठती हैं निसार
ये मरजानी लडकियाँ
कहने को तो
कपास सी उड़ी फिरती हैं हवाओं संग
पर रो उठती हैं अक्सर मुस्कुराते हुए
ये मरजानी लड़कियाँ
|| ऊब ||
ऊब थी, वो तो आनी ही थी 
तो तोड़ दिए हमने मिट्टी के खिलौने 
कब तक खेलते रहते उनसे 
आखिर वक्त के साथ चलना था 
पुराने को छोड़ कुछ नया भी तो करना था 
और अब जो गढा गया सचमुच 
नया था अज़ब था…
 
नन्हे भोलू के चेहरे से 
मुस्कान हटाकर 
पेड की छाँव तले रात गुजारते
एक पगले को दे दी गयी,
खाकी वर्दी पहने सिपाही 
बंदूक लिए तो नज़र आता है पर
ट्रिगर उसके हाथों में नहीं 
पोशीदा पर्दों के पीछे बैठे 
सफेदपोशों के हाथों में दे दिया गया 
   
और धीरे-धीरे ये खेल 
खिलौनों के साथ नहीं 
इंसानों के साथ खेला जाने लगा 
जो मिट्टी के खिलौनों की तरह 
तुरत टूटते भी नहीं थे 
पर देखा जाए तो अज़ब से 
इस खेल से खेलते हुए 
अब हमें ऊब जाना चाहिए?
और ऊब आने का यह मुकम्मल वक्त होगा!
|| पशोपेश में शैतान ||
परेशान है इन दिनों 
उलटे पैरों वाला शैतान 
चबाता रहता है मायूसी से 
नींद में भी अपना निचला होंठ 
क्योंकि नहीं खौफ रहा उसका अब धरती पर कोई!
दे दी है पटखनी 
कुछ सीधे पैरों वाले इंसानों ने 
इस आखिरी मुकाबले में भी उसे 
बेबस हो जब-तब 
दांतों से चबा उठता है नाखून अपने 
उफ़ कि नहीं पहचान सकता 
चेहरा अपने उस्ताद का 
और आखिर आजिज़ आ 
मुक़र्रर कर ली है सज़ा 
उसने खुद अपने लिए 
कुछ सफेदपोशो के दरबार में अब 
हर सुबह ओ शाम 
सिर झुकाकर ठोंकता है सलाम
*|| शब्दों और व्यवहार के फासले से क्षुब्ध कविता ||*
शब्दों के ताने बाने में
कुशलता से बुनी गयी वेदना
सहानुभूति/श्रद्धा/प्रेम/क्रांति और बदलाव
मानो उपज आये हों
अंतड़ियों में
नुकीले कई दांत
कुतरते हुए दीवारें
आखिर चुन ही डालेंगे ज़रूर
हमारी सम्पूर्ण मज्जा भी
एक न एक दिन
फिर पहचाने जा सकेंगे सहज ही
खोखली हड्डियों वाले
खड़खड़ाते शरीर दूर से ही
और हो न हो
वह दिन आज के मुकाबले
कहीं सुन्दर और बेहतर होगा!!
*|| गुरु मानूँ तो मानूँ किसे ||*
गुरु मानूँ तो मानूँ किसे 
उसे?
गर्भ में खत्म करने के लिए मुझे
उड़ेल कर हलक में सिरका 
दुनिया का चलन समझाया जिसने?
या उसे
आधा पानी आधा दूध थमाकर
हर हाल में
जिन्दा रहने का हुनर सिखाया जिसने?
या फिर उसे
राह चलते फब्तियाँ कस-कस
अपनी अलबेली सोच से परिचित कराया जिसने?
या उसे
अपनी नापाक़ हरक़तों से
गुरु हो सकने का हर भरम तोड़ा जिसने?
या फिर उसे
अँधेरे रास्तों में अकेला छोड़
मेरा खुद से तआरुफ़ कराया जिसने?
*|| दोराहे पर ||*
दोराहे पर 
ठिठकी हैं 
कुछ परछाइयाँ
किसी की पढ़ने की उम्र है 
पर कंधे पर बस्ते नहीं 
किसी की खेलने की उम्र है 
पर हाथों में खिलौने नहीं
उनके चेहरे 
सांध्य बेला में 
कीट-पतंगों से घिरे 
पुष्प सरीखे नज़र आते हैं
उनकी आँखों में 
तितलियों के पर छूने की ललक नहीं 
सब कुछ गिरा देने को आकुल 
बेशुमार आँधियाँ हैं
वे देख रहे हैं 
धरती को धुआँ-धुआँ होते हुए
वे देख रहे हैं 
भीड़ को बसों और 
गाड़ियों के शीशे तोड़ते हुए
हाथ बढ़ा 
वे रोकना चाहते हैं 
पूछना चाहते हैं कुछ सवाल 
हर आते-जाते से
पर भीगे परिंदे से 
फड़फड़ा कर रह जाते हैं 
उनके होंठ
नहीं रुकता कोई
कोई रुकता भी नहीं

*० नीता पोरवाल*
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*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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