कला साहित्य एवं संस्कृति

फ़ैज़ की जयंती पर विशेष–13 फरवरी : जिस दिन सर्वहारा को अपनी ताकत का एहसास हो जाएगा उस दिन वे दुनिया को बदलकर रख देंगे. : फ़ैज़

13 फरवरी 2019

सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे…तानाशाही के दौर में लोकतंत्र का शायर फैज़

प्रस्तुति गणेश कछवाह ,रायगढ 

आज फैज़ अहमद फैज़ का दिन है, फैज़ अहमद फैज़ उर्दू शायरी का एक ऐसा नाम है जिसकी शायरी आज भी मजलूमों के लिए हिम्मत का काम करती है. फैज़ का जन्म 13 फरवरी, 1911 को अविभाजित भारत के सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था. फैज पहले सूफी संतों से प्रभावित थे. 1936 में वे सज्जाद जहीर और प्रेमचंद जैसे लेखकों के नेतृत्व में स्थापित प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हो गए. फैज़ इसके बाद एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी हो गए.

फैज अहमद फैज मुहब्बत और इश्क की शिद्दत याद दिलाते थे, तो लोकतंत्र की मजबूती का एहसास कराते हुए बगावत का बिगुल फूंकते थे। फैज के बारे में जितना लिखा जाए कम, आज फैज हमारे बीच नहीं,लेकिन उनकी रूमानी और इंक़लाबी जुबान मुल्क में मौजूद है जो आज के दौर में ज्यादा जरूरी भी है।

आज उनका यौम-ए-पैदाइश है. फैज, वो रूमानी और इंक़लाबी शायर, जिसने मोहब्बत की खातिर सरहद और मजहब की बेड़ियों को तोड़ा. एक इंगलिश लड़की एलिस से इश्क किया, शादी की और उसे ता उम्र निभाया. ये वही शायर थे जिन्होंने अपनी शायरी में सोये हुए लोगों को जगाने की बात की, जिसके बदले में उन्हें जेल और निर्वासन मिला.वो कहते थे…*”मुक़ाम “फैज़” कोई राह में जंचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले.”कोई मुकाम उनके लायक होता तब उन्हें जंचता, जो तख्त गिराए जाने और ताज उछाले जाने की बात करे. जिसकी हर सोच हल्क-ए-खुदा के राज करने के इरादे तक जाती हो. जो अपनी शायरी में गरीबों के हक़-हकूक की बात करे. खाक में लिथड़े हुए और खून में नहलाए हुए मनाज़िर याद करवाए. जो अजीम इंकलाबी व बागी शायर जिसने सताए हुए लोगों को हौसला दे. जिसने तानाशाह के चेहरे से नाकाब नोंचा. उसे दार के अलावा कोई *और मुकाम कैसे जंच सकता है*.

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे-

ऐसा लग रहा था कि फैज़ को फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा।

लियाकत अली खान की हुक़ूमत ने फैज़ साब को तख़्तापलट की साजिश रचने के झूठे जुर्म में 1951 – 1955 तक जेल की कैद में रखा. सभी को उस वक्त ऐसा लग रहा था कि उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा. पर खुद फैज़ साब बेखौफ थे. यही बेखौफी थी जिसकी वजह से वो तानाशाही हुक़ूमतों के निगाह में ता उम्र चढ़े रहे. उसी दौरान फैज साब ने *”बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे” नज्म लिखी*

*बोल की लब आज़ाद हैं तेरे*
*बोल ज़बां अब तक तेरी है*
*तेरा सुत्वां जिस्म है तेरा*
*बोल कि जां अब तक तेरी है*
*देख कि आहन-गर की दुकाँ में तुंद हैं*
*शोले सुर्ख़ है*
*आहन खुलने लगे*
*क़ुफ़्लों के दहाने फैला हर इक ज़ंजीर का दामन*
*बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है*
*जिस्म ओ ज़बां की मौत से पहले*
*बोल कि सच ज़िंदा है अब तक*
*बोल जो कुछ कहना है कह ले*

फै़ज़ साहब लाहौर जेल में थे. इसी दौरान पेशी के लिए उनको लेकर अदालत जाना था. उनके हाथों में हथकड़ियां लगी हुईं थी. रास्ते में पुलिस की गाड़ी खराब हो गई. फिर उनको तांगे पर बिठाया गया. जैसे ही तांगा पहुंचा जिला कचहरी के पास कि उन्हें देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा. लोग “फैज़ साब ज़िंदाबाद” के नारे लगाने लगे. फैज़ साब को अदालत में दाखिल होने में घंटो लग गए और भीड़ को अलग-थलग करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी. फैज़ साहब पेशी बाद जब वापस जेल पहुंचे तो हालात पर एक नज़्म लिखी.

*”आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो”*.
*आज बाज़ार में पा-ब-जौला *चलो”चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा *काफी नहीं*
*तोहमत-ए-इश्क़ पोशीदा काफी नहीं*
*आज बाज़ार में पा-ब-जौला *चलोदस्त-अफ्शां चलो, *मस्त-ओ-रक़्सां चलो*
*खाक-बर-सर चलो, खूं-ब-दामां चलो*
*राह तकता है सब शहर-ए-जानां चलो *हाकिम-ए-शहर भी, मजम-ए-आम भी*
*तीर-ए-इल्ज़ाम भी, संग-ए-दुश्नाम भी*
*सुबह-ए-नाशाद भी, रोज़-ए-नाकाम *भी इनका दमसाज़ अपने सिवा कौन है*
*शहर-ए-जानां मे अब बा-सफा कौन है*
*दस्त-ए-क़ातिल के शायां रहा कौन *हैरख्त-ए-दिल बांध लो दिलफिगारों *चलो*
*फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारों चलो*
*आज बाज़ार में पा-ब-जौला*

जो कि हर दौर में नाइंसाफी के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई का संघर्ष गान बना. ये फैज साहब का कमाल ही है कि उनकी नज्मों को सुनकर जुल्म और ज्यादती के खिलाफ लड़ना लोगों को खूबसूरत लगने लगता है.”

*सब ताज उछाले जाएंगे-सब तख़्त गिराये जाएंगे

बात 1985 की है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल जियाउल हक ने इस्लामीकरण की शुरुआत कर दी थी। पूरे पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगा था। लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरे थे। आम लोगों की जिंदगी पर पाबंदियां थीं। महिलाएं साड़ी नहीं पहन सकती थीं। इस दमघोंटू माहौल में लाहौर का स्टेडियम एक शाम इंकलाब जिंदाबाद के नारों से गूंज उठा, लोकतंत्र और अपने अधिकारों के लिए जनता ने बगावत का ऐलान किया। और इस बगावत और इंकलाब को आवाज दी थी पाकिस्तान की मशहूर गायिका इकबाल बानो ने। उन्होंने इस स्टेडियम में कम से कम 50 हजार लोगों की मौजूदगी में जो नज्म सुनाई, उसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह नज्म थी:

*हम देखेंगे*
*लाज़िम है कि हम भी देखेंगे*
*वो दिन कि जिसका वादा है*
*जो लौह-ए-अज़ल में लिखा है*
*जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां*
*रुई की तरह उड़ जाएँगे*
*हम महक़ूमों के पाँव तले*
*ये धरती धड़-धड़ धड़केगी*
*और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर*
*जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी*
*जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से*
*सब बुत उठवाए जाएँगे*
*हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम*
*मसनद पे बिठाए जाएँगे*
*सब ताज उछाले जाएँगे*
*सब तख़्त गिराए जाएँगे*

यह सब लिखने वाले शायर और कोई नहीं फैज अहमद फैज थे। यह फैज का इंकलाबी रूप है। लेकिन इस इंकलाबी शायर का एक रुमानियत से भरपूर रंग भी है।

आज की युवा पीढ़ी को शायद फैज अहमद फैज के बारे में न पता हो। परन्तु उन्हें यह मालुम होना चाहिए कि विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्म हैदर में इसी गजल का इस्तेमाल किया था। खुशनसीब है आज की युवा पीढ़ी जिसका अभी लोकतंत्र पर छाए काले बादलों से पैदा संकटों से सामना नहीं हुआ है। लेकिन फैज की यह गज़लें, ये नज्में ऐसी हैं, जिन्हें आज गाया जा सकता है, सुनाया जा सकता है, साझा किया जा सकता है। शायद अब इसकी और ज्यादा जरूरत है।

फैज ऐसे शायर थे, जो लिखते थे, जेल में डाल दिए जाते थे। फिर लिखते थे, फिर जेल जाते थे। वे फिर जेल में ही लिखते थे। आज भी सत्ता तानाशाही विकसित करती है, फैज के दौर में भी ऐसा होता था।

भारत में भी आजादी की आमद के वक्त लोगों को उसका चेहरा नजर ही नहीं आ रहा था, कहीं ।लोग एक-दूसरे की जान के दुश्मन थे, 1947 में मुल्क आज़ाद तो हो गया पर चारों तरफ सांप्रदायिकता का माहौल था. लोग दंगो की आग में जल रहे थे. बस्तियां लहूलुहान थीं. हिंदू और मुसलमान भाइयों को आपस में लड़ते और मार-काट करते देखकर  *जो फैज़ ने महसूस किया वो अपनी नज्म *सुबह-ए-आज़ादी’ में लिखा. फैज़ साब को लगा कि ये वो तो नहीं है जिसका हमने खाब देखा था*

*ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर*
*वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं*
*ये दाग़ दाग़ उजाला*
*ये शबगज़ीदा सहर*
*वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं*
*ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर*
*चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं*
*फ़लक के दश्त में तरों की आख़री मंज़िल*
*कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल*
*कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल*
*जवां लहू की पुर-असरार शाहराहों से चले*
*जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े*
*दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से*
*पुकारती रहीं बाहें*
*बदन बुलाते रहे*
*बहुत अज़ीज़ थी लेकिन*
*रुख़-ए-सहर की लगन बहुत क़रीं था*
*हसीनान-ए-नूर का दामन*
*सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी* *थकन*
*ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर*
*वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं*

फैज का जन्मस्थान बंटवारे का बाद पाकिस्तान के हिस्से में आया और उन्हें पाकिस्तान का नागरिक बनना पड़ा, लेकिन उनकी शायरी सरहदों की बंदिशों से आजाद रही। आजाद ही नहीं रही, उसने तो और भी सीमाओँ को तोड़ दिया। एक तरफ पाकिस्तान में नूर जहां उनकी गजल ‘मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग’ तो भारत में जगजीत सिंह ‘चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले’ को अपने सुर दे रहे थे। इस गजल को मेंहदी हसन ने सबसे खूबसूरत अंदाज में पेश किया है।

फैज अहमद फैज सियालकोट के मशहूर बैरिस्टर सुल्तान मुहम्मद खां के घर पैदा हुए थे। पांच बहनें और चार भाई थे। वह सबसे छोटे थे, तो सबके दुलारे भी थे। परिवार बहुत ही धार्मिक किस्म का था। मदरसे भेजा गया कुरान पढ़ने, लेकिन दो सिपारे यानी दो अध्याय ही पढ़ पाए कि मन उचट गया। स्कूल में अव्वल आते रहे और शायरी करने लगे।

फैज को आमतौर पर लोग कम्यूनिस्ट कहते थे। उन्हें इस्लाम विरोधी भी कहा जाता था, और वह खुद कहते थे, ये इलजाम नहीं हकीकत है। फैज के किस्से भी बहुत हैं और हकीकत भी। फैज आजादी से पहले भी मकबूल थे और आजादी के बाद भी। फैज रोमांस की शिद्दत याद दिलाते थे, तो लोकतंत्र की मजबूती की भी।
लेकिन इस इंकलाबी शायर का एक रुमानियत से भरपूर रंग भी है। बानगी देखिए:

*गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले*

*चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले*

*क़फ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो*

*कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले*

*कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़*

*कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले*

*बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही*

*तुम्हारे नाम पे आयेंगे, ग़मगुसार चले*

*जो हम पे गुज़री सो गुज़री है शब-ए-हिज़्रां*

*हमारे अश्क़ तेरी आक़बत संवार चले*

*हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूं की तलब*

*गिरह में लेके गरेबां का तार-तार चले*

*मुक़ाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जंचा ही नहीं*

*जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले*

फैज के बारे में जितना लिखा जाए कम, लेकिन आज फैज हमारे बीच नहीं हैं, बस यही एक गम है।फ़ैज़ साब का मानना था कि *जिस दिन सर्वहारा को अपनी ताकत का एहसास हो जाएगा उस दिन वे दुनिया को बदलकर रख देंगे.*

(पीयूष राज और तसलीम खान के लेख से साभार)
–गणेश कछवाहा
जनवादी लेखक संघ,प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य
रायगढ़ छत्तीसगढ़।

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