कला साहित्य एवं संस्कृति

हर बार की तरह खुद की अना ताक पे रख कर नहीं लौटूंगी…रोशनी..

हर बार की तरह खुद की अना ताक पे रख कर नहीं लौटूंगी…
अब की मैं गई तो नहीं लौटूंगी…
तुम बढ़ कर मुझे रोक लेना…
याद दिलाना मुझे हमारी पहली गुफ़्तगू..
मुझे इश्क़ का वो मंज़र याद दिलाना ,
जिसमें मैंने खुद रूठ कर तुम्हें मनाया था..
जिसमें खुद रो कर तुम्हें हंसाया था…
तुम बढ़ कर मुझे रोक लेना…
यूँ कि अब जो गई तो नहीं लौटूंगी मैं…

थाम लेना मेरे हाथ,
और याद दिलाना पहली दफा हाथ के थामने का..
थाम लेना वो लम्हा…
और नज़रें मिलने का पहला वाक़िया थाम लेना…
याद दिलाना वो रूमानी हवा…
तुम बढ़ कर मुझे रोक लेना…
यूँ कि अब जो गई तो नहीं लौटूंगी मैं….

याद तो होगा न वो रातें जाग जाग कर,
ऑनलाइन आने का इंतज़ार…
वो अटपटी सी रिप्लाई ,
बाते करने का तुम्हारा बहाना…
वो नज़्में जो एक दूसरे को भेजीं थी हमने..
तुम मेरा रस्ता रोक मुझे फिर से सुना देना..
तुम बढ़ कर मुझे रोक लेना…
यूँ कि अब जो गई तो नहीं लौटूंगी मैं…

.तुम्हारी मुन्तज़िर “रोशनी बंजारे (चित्रा)

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