कला साहित्य एवं संस्कृति मजदूर

हमारे हाथ अभी बाकी हैं : शरद कोकास .

डॉ कमला प्रसाद जी को जब मैंने मजदूरों पर लिखी अपने शुरुआती दौर की यह कविता सुनाई तो उसकी पंक्तियाँ थीं…”उठो दौड़ो /छीन लो उनके हाथों से वे पत्थर / तुम्हारे हाथ अभी बाकी हैं ।” कमला जी ने नाराज़ होते हुए कहा “एक सर्वहारा या मजदूर को यह हक़ बिल्कुल नहीं होता कि वह किसी अन्य मजदूर को उपदेश दे कि ऐसा कर लो वैसा कर लो , इसलिए यहाँ ‘तुम’ नहीं ‘हम’ होना चाहिए , इसलिए कि हम भी शोषित सर्वहारा हैं , मजदूर हैं ।”

बस मेरी तो सोचने की दिशा ही बदल गई .

★ हमारे हाथ अभी बाकी हैं ★

कल रात मेरी गली में एक कुत्ता रोया था
और उस वक़्त आशंकाओं से त्रस्त कोई नहीं सोया था
डर के कारण सबके चेहरे पीत थे
किसी अज्ञात आशंका से सब भयभीत थे

सब अपने अपने हाथों में लेकर खड़े थे अन्धविश्वास के पत्थर
कुत्ते को मारने के लिये तत्पर
किसीने नहीं सोचा
कुत्ता क्यों रोता है

उसे भी भूख लगती है
उसे भी दर्द होता है

हम भी शायद कुत्ते हो गए हैं
इसलिए खड़े हैं उनके दरवाज़ों पर
जो नहीं समझ सकते
हमारे रूदन के पीछे छिपा दर्द

उनके हाथों में हैं वे पत्थर
जो कल हमने तोड़े थे चट्टानों से
बांध बनवाने के लिए
या अपने गाँव तक जाने वाली
सड़क पर बिछाने के लिए

उनका उपयोग करना चाहते हैं वे
कुचलने के लिये हमारी ज़ुबान
चूर करने के लिए
हमारे स्वप्न और अरमान
वे जानते हैं
हमें जो कहनी है
वह बात अभी बाकी है

ज़ुबानें कुचले जाने से नहीं डरेंगे हम
हमारे मुँह में दाँत अभी बाकी हैं

लेकिन ……
हम आदमी हैं कुत्ते नहीं
आओ उठे दौड़ें
और छीन लें उनके हाथों से वे पत्थर
हमारे हाथ अभी बाकी हैं …

हमारे हाथ अभी बाकी हैं ।

■ शरद कोकास ■

(‘सापेक्ष’ पत्रिका में 1982 में प्रकाशित ।)

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