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सोनी सोरी बेला भाटिया के बहाने मानव अधिकार हनन के ख़िलाफ़ जनसंघर्ष की पुकार

छत्तीसगढ़ पुलिस ने आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की है। एफआईआर में प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता और रिसर्चर बेला भाटिया और दो आदिवासी सरपंचों को भी आरोपी बनाया गया है। एफआईआर इन सभी के खिलाफ धारा 188 के उल्लंघन के आरोप में दर्ज की गई है।

बेला भाटिया / सोनी सोरी

सामाजिक और मानव अधिकार रक्षकों के खिलाफ इस तरह से ऍफ़.आई.दर्ज. करना, फ़र्ज़ी मुकदमों में फ़साना, पुलिसिया दमन का बहुत पुराना हथकंडा है. हम सब इसके शिकार हो चुके हैं. लेकिन राज्य दमन के वर्तमान दौर में यह सभी सत्ताधारियों की साझा-रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सामाजिक आन्दोलनों को कमज़ोर कर नेस्त-नाबूत करना ज़रूरी है. पूँजीवादी और फासीवादी/सांप्रदायिक शक्तियों के लिए ‘लोकतंत्र’ बहुत खतरनाक है. इसलिए उसका खात्मा इनका साझा मकसद है. लोकतंत्र के खात्मे के एजेंडा में कांग्रेस पूरी तरह शामिल है. यकीन न हो तो कम-से-कम सिर्फ उन तीन राज्यों में एक फौरी तौर पर निगाह उठा कर देख लें जिनमें कांग्रेस दिसम्बर २०१८ में सत्ता में लौटी है – छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान.

मुझे उम्मीद है कि जो सामाजिक और मानव अधिकार संगठन और कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ में दिसम्बर २०१८ में कांग्रेस सरकार के गठन के बाद से उसकी तारीफ के पुल बाँध रहे थे, वे अब समझ गए होंगे कि मानव अधिकारों की रक्षा और लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं पर अमल करने में यह सरकार भी कतई समर्पित नहीं है. और मैं यह बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ, जो इस सरकार के पिछले २५० दिनों से अधिक के क्रिया-कलापों, वायदों और वादा-खिलाफी पे ढोस दस्तावेजों और आंकड़ों पर आधारित है, ख़ास कर मानव-अधिकारों के हनन, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों पर पुलिसिया हमलों और रवैय्ये के सन्दर्भ में.

मैं यह मानता हूं कि सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं को छत्तीसगढ़ राज्य में (और देश में भी) एक सकारात्मक ‘विपक्ष’ की भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि जैसे केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को चुनौती देने में वर्तमान विपक्ष नाकाम और नदारत है, वैसे ही छत्तीसगढ़ राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार को चुनौती देने में ‘भाजपा’ पूरी तौर पर विफल साबित हो रही है (जिसके मूल कारणों के विश्लेषण करने में अभी फिलहाल जाने की ज़रुरत नहीं है). 

छत्तीसगढ़ में कॉर्पोरेट एजेंडा को लागू करने में, विदेशी निवेश के लिए रेड-कारपेट बिछाने का काम, और छत्तीसगढ़ की बहुमूल्य नैसर्गिक सम्पदा को यहां की जनता से छीन कर कॉर्पोरेट जगत के हवाले करने में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी अब भाजपा से आगे निकलने की होड़ में है

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतीशील गठबंधन (यू.पी.ए.) की सरकार ने ही मानव अधिकार रक्षकों पर दमन का भयानक दौर चलाया था. चाहें वह विधिविरुद्ध क्रिया – कलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA) और छत्तीसगढ़ विशेष जन-सुरक्षा कानून जैसे गैर-संवैधानिक कानून हों, इन्हें बेरहमी और सुनियोजित तरीके से लागू करने में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू.पी.ए. सरकार और छत्तीसगढ़ में भाजपा की रमन सरकार में एक आपसी समझ थी. इसीलिए, केंद्र में गृह मंत्रालय के सरगना पी.चिदंबरम छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार की पीठ ठोकते नज़र आते थे. (वैसे एक मानव अधिकार रक्षक के तौर पर मुझे यह कहना तो नहीं चाहिए, लेकिन दबी-आवाज़ में मेरे कई साथी यह कहते सुने जाते हैं,कि चिदंबरम साहब को अब जेल की चक्की और चने का भाव पता लग रहा होगा!). क्या डॉ. बिनायक सेन, क्या सोनी सोरी, क्या अजय टी.जी., क्या वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कुमार, क्या दिल्ली यूनिवर्सिटी की नंदिनी सुंदर हों (और तमाम आदिवासी और मानव अधिकार रक्षक), यह सब-के-सब इसलिए पुलिसिया दमन के निशाने पर रहे क्योंकि कांग्रेस और भाजपा की पूँजी-परस्त सरकारें अच्छी तरह समझती थीं/हैं, कि लोकतंत्र और संविधान में निहित मूल्यों, सिद्धांतों और जन-अधिकारों की रक्षा के लिए तो सामाजिक और मानव अधिकार कार्यकर्ता ही संघर्ष करते हैं. इसलिए उन्हें पहले डराओ-धमकाओ, फिर कानूनी दांव-पेंच में फंसा दो, और नहीं तो जेल में ढूंस दो, और आखिर तक अगर वे न सुधरें तो उन्हें गोली मार दो – फर्जी मुठभेड़ में.

मेरे लिए यह कतई आश्चर्यजनक नहीं था कि विधि-विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) संशोधन विधेयक (unlawful activities prevention amendment act ) को राज्य सभा ने भी पारित किया, जिसमें कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी ने समर्थन में वोट डाला. कांग्रेस की ‘कथनी और करनी’ में फर्क करना महज़ एक बेफकूफी होगी. अब देखें कि कांग्रेस पार्टी ने पिछले लोक-सभा चुनाव के दौरान अपने चुनावी घोषणा-पत्र में अंग्रेज़ों के ज़माने के देशद्रोह (Sedition) कानून ( भारतीय दंड संहिता की धरा १२४ अ) की समीक्षा कर रद्द करने का वादा किया था. लेकिन इनकी राजनितिक अक्ल पर तरस आता है कि इसके बावजूद उन्होंने यू.ए.पी.ए. के उस संशोधन को समर्थन दिया दिया जिसमें एक व्यक्ति को भी ‘आतंकी’ घोषित किया जा सकता है. याद रहे कि देशद्रोह कानून छत्तीसगढ़ में डॉ. बिनायक सेन, अजय टी.जी., सोनी सोरी और तमाम आदिवासियों, किसानों, महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर लगाया गया था, और अभी भी तमाम आदिवासी, किसान, महिला और जवान इस कानून के तहत जेलों में सड रहे हैं.

इस सन्दर्भ में मेरा सुझाव है कि सामाजिक संगठनों और संस्थानों को छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार का एक ‘सोशल ऑडिट’ करने की ज़रुरत होगी, और उस पर सार्वजानिक बहज़ भी चलानी होगी, जिसमें एक वैज्ञानिक सोच पर आधारित संतुलन बनाने की ज़रुरत होगी. आशा है कि इस सुझाव पर हमारे जुघरू और संघर्षशील संगठन और साथी पहल करेंगे. इसमें मेरी ओर से जो भी सहयोग चाहिए, वह उन्हें ज़रूर मिलेगा.

अंत में, कुछ मानदंड बनाने की ज़रुरत है, जिसकी कसौटी पर वर्तमान सरकार को कसा जा सके. एक मानव अधिकार रक्षक होने के नाते, मेरे लिए कुछेक मानदंड नीचे दर्शाए जा रहे हैं, अगरचे यह सरकार लोकतान्त्रिक मूल्यों और प्रक्रियाओं के प्रति गंभीर है तो:

  • छत्तीसगढ़ विशेष जन-सुरक्षा कानून को तत्काल प्रभाव से निरस्त करे, और जितने भी लोगों पर यह कानून लगाया गया है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाए
  • इसी तारतम्य में अपनी राजनितिक इमानदारी का परिचय देते हुए, छत्तसीगढ़ सरकार को ‘देशद्रोह’ (Sedition) कानून के तहत जितने भी लोग गिरफ्तार हैं या उनपर मुकदमा ठोंका गया है, उसे वापस लेकर उन्हें तुरंत रिहा करें, और आश्वासन दें कि भविष्य में इस कानून का इस्तमाल छत्तीसगढ़ में (और सभी कांग्रेस शासित राज्यों में) नहीं किया जाएगा.
  • छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार आश्वासन दे कि मानव अधिकारों के प्रति अपनी इमानदारी और निष्ठा दर्शाते हुए विधि-विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) संशोधन विधेयक (unlawful activities prevention amendment act ) का इस्तमाल नहीं करेगी.
  • छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार द्वारा अवकाशप्राप्त न्यायमूर्ति ए. के. पटनायक की अध्यक्षता में गठित समिति की अभी तक की कार्यवाई की रपट सार्वजनिक करे, जिसमें उन्होंने नक्सल-प्रभावित छेत्रों में आदिवासियों के खिलाफ पुलिस द्वारा दायर मुकदमों की समीक्षा की बात कही है, ताकि जनता को पता चले कि उनकी क्या रणनीति है.
  • छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद से ( दिसम्बर २०१८) जितनी भी मुठभेड़ें, पुलिस हिरासत में मौतें, पत्रकारों के खिलाफ पुलिस कार्यवाई, और मानव अधिकारों के हनन के मामलों में के सरकार द्वारा उच्च-स्तरीय न्यायिक जांच कराने की क्या राजनितिक इच्छा-शक्ति है? यदि हां, तो एक उच्च-स्तरीय न्यायिक जांच आयोग का गठन जिसे ने केवल कांग्रेस शासन काल वरन भाजपा शासन काल के दौरान हुई इन सभी मुठभेड़ों, पुलिस हिरासत में मौतें, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हमलों, छत्तीसगढ़ विशेष जन-सुरक्षा कानून और  राजद्रोह कानून के दुरूपयोग का मामले सौंपे. 
  • छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग का विधिवत और अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप पुनर्गठन कर उसे सक्रिय करने साधन-सुविधा उपलब्ध कराए.

आलेख : राजेन्द्र सायल

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