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सोनहत के नाले और दिल्ली के झरने – नथमल शर्मा. ईवनिंग टाईम्स बिलासपुर.

एक जनवरी 2018

ये उस वक्त की बात है जब देश के राष्ट्रपति जरा नाराज हो गए थे क्योंकि भाषण के बीच ही खाने के पैकेट बांटे जा रहे थे। उस समय एक गांव में कुछ लोग नाले का गंदा पानी पीकर प्यास बुझा रहे थे। ये उस वक्त की भी बात है जब देश के प्रधानमंत्री एक पहाड़ी शहर में चाय की चुस्कियां लेकर बीते दिनों को याद कर रहे थे। ये उस वक्त की भी बात है जब राष्ट्रपति भवन में बैठे कुछ अफ़सर पंडो जनजाति की फ़ाइल ढूंढ रहे थे। क्योंकि राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र हैं पंडो जनजाति के लोग। उस वक्त भी ये लोग नाले का गंदा पानी पी रहे थे । ये कल की बात है । परसों की भी और आज की भी बात है ।

सोनहत एक कस्बा है। कोयले की खदानों से घिरा। इसी के पास रहते हैं पंडो । इनके लिए पीने का पानी नहीं है । नाले के गंदे पानी से बुझानी पड़ती है प्यास । बहुत कम बचे हैं पंडो परिवार। जंगल के ये बेटे बेटी हैं। किसी तरह जीवन बिता रहे हैं। इसीलिए देश के राष्ट्रपति ने इन्हें गोद लिया हुआ है। ताकि पंडो आदिवासियों को किसी तरह की तकलीफ़ न हो । इनके लिए बहुत सारी योजनाएं हैं। बहुत सारा पैसा भी खर्च होता है। फ़िर भी इन्हें पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता । नाले के गंदे पानी से बुझानी पड़ती है प्यास। अपने छत्तीसगढ़ में ही है सोनहत। कोरिया जिले में। ऐसे ही कोरबा जिले में कोरवा आदिवासी परिवार रहते हैं। पांडातराई के आसपास भी हैं। जशपुर से लेकर बस्तर तक सभी जिलों में रहते हैं। हमने इनके जंगल छीन लिए। विकास कर रहे हैं हम । प्रकृति के साथ रहने के अभ्यस्त इनसे हमने इनके हिस्से का जीवन छीन लिया। और बहस को आरक्षण की बुराईयों तक ले गए। फिर भी नाले का पानी पीकर बीमार हो रहे हैं पंडो भाई बहन।

सोनहत की यह ख़बर अख़बार के भीतर के पन्ने पर एक कोने में छपी । वैसे भी पहला पन्ना तो कंपनियों के रंगीन विज्ञापनों ने छीन लिया। दूसरे वाले पहले पन्ने पर सरकारों की उपलब्धियां तो तीसरे वाले पहले पन्ने पर राजनीति बिखरी पड़ी है। इसलिए अब ज़रूरी या संवेदनशील खबरें भीतर कहीं छपती है । हां, छप रही है यह बात भी तो महत्वपूर्ण है। कब तक ये महत्व बना रहेगा कहा नहीं जा सकता।

सोनहत के पंडो आदिवासियों को आज तक हम पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं करा सके । यह हमारी सारी तरक्क़ी और राजनीति और विकास योजनाओं के मुंह पर करारा तमाचा ही तो है । वैसे यह हाल पूरे देश का ही है । आदिवासी क्या आम आदमी का जीवन बेहद कठिन है। हमने तरक्की का मतलब बहुत सारे घर (नहीं फ्लेट्स) बना लेना या कुछ कारखाने खडेईकरना ही तो लगा लिया है। कोई गांव आत्मनिर्भर नहीं। हर गाँव का सपना शहर हो जाना है और शहरों का मतलब ही हमारे सपनों का मर जाना है । ऐसे विरोधाभास में ही तो जी रहे हैं । हम तो नागरिक – बोध से सोचते भी नहीं कि ये जीना भी कोई जीना है ? हम तो सारा दोष राजनीति पर लगाते हुए चाय की चुस्कियां लेते हुए

देश – दुनिया पर बहस कर आरामदेह रजाइयों मे दुबक जाते हैं। उस समय भी पीने के पानी के लिए पंडो जद्दोजहद कर रहे होते हैं और राजनीति तो गाय,गोबर, भगवा या हरे में उलझी होती है । लोकल ट्रेनों, बसों में धक्के खाते या कि कार्पोरेट दफ़्तर में कम्प्यूटर पर जूझते किसको याद आती है लोकतंत्र में लगातार हाशिये पर जा रहे आम आदमी की । सभी तो सारा दोष राजनीति पर मढ़कर जैसे निश्चिंत है । और राजनीति के लिए तो ये सबसे आदर्श स्थिति है जब सब चुप हैं। बुनियादी सवाल ग़ायब हों और संसद का समय किसी भाषण के कुछ वाक्यों पर बर्बाद हो जाता हो । ये सही है कि गांधी ने कभी इस आखिरी आदमी की आंख के आंसू पोछने की बात कही थी। पर यह भी कटु सत्य है कि गांधी अब जहाँ छपे हैं उसे पाने के लिए ही तो आंसू पोंछे नहीं जा रहे हैं बल्कि खून के आंसू रुलाए जा रहे हैं। इस निर्मम समय में अपनी असहाय भूमिका के लिए अभिशप्त हैं क्या हम ?

* नथमल शर्मा

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