किसान आंदोलन जल जंगल ज़मीन

सूरजपुर, अंबिकापुर, रायगढ़ जिला कार्यालयों और बिलासपुर जिले के गौरेला में किसान सभा और आदिवासी एकता महासभा ने दिया धरना .

जंगल हमारा हम जंगल के.इसे छोड़ेंगे_नहीं” के नारे के साथ भूमि एवं वन अधिकार आंदोलन के आह्वान पर आज छत्तीसगढ़ किसान सभा और आदिवासी एकता महासभा के बैनर के नीचे सैकड़ों किसानों और आदिवासियों ने सूरजपुर, अंबिकापुर, रायगढ़ के जिला कार्यालयों और बिलासपुर जिले के गौरेला में एसडीएम कार्यालय पर धरना दिया तथा सुप्रीम कोर्ट से वनों से आदिवासियों को बेदखल करने के अपने आदेश को रद्द करने की मांग की।

उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार से भी आग्रह किया कि सुप्रीम कोर्ट में राज्य की ओर से वनाधिकार कानून के विशेषज्ञ वकील को खड़े करें, जो बेदखली के किसी भी आदेश को मानने से इंकार कर दें, क्योंकि वनाधिकार कानून में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है।

आंदोलनरत ये दोनों संगठन क्रमशः अखिल भारतीय किसान सभा और आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच से जुड़े हैं। सूरजपुर में धरना की अगुआई कपिल पैकरा, अयोध्यासिंह राजवाड़े, सुरेन्द्रलाल सिंह, बालनारायण आदि किसान नेताओं ने किया, तो अंबिकापुर में बालसिंह, ऋषि गुप्ता, कृष्ण कुमार आदि ने, गौरेला में राकेश चौहान, नंदकुमार कश्यप, देवान सिंह मार्को, फागुन सिंह वट्टी, ओमवती मेरावी, अंजू आर्मो, बबलू गंधर्व, चैतराम चौधरी ने और रायगढ़ में लंबोदर साव, समयलाल यादव आदि ने धरना का नेतृत्व किया और जिलाधीश को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।

इन सभी संगठनों के नेताओं ने 1927 के वन कानून में प्रस्तावित संशोधनों को आदिवासीविरोधी और कार्पोरेटपरस्त करार देते हुए कहा कि आदिवासियों को उनकी वन भूमि से भगाने के लिए तथा इसके खिलाफ पनपने वाले जनांदोलनों को कुचलने के लिए ही वन कानून में ऐसे संशोधन किए जा रहे हैं।

इन धरनों के जरिये छत्तीसगढ़ में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार द्वारा उद्योग लगाने के नाम पर अधिग्रहित हज़ारों एकड़ जमीन को भूमि अधिग्रहण कानून के प्रवधानों के अनुसार मूल भूस्वामी किसान को लौटाने की भी मांग की गई। इसके साथ ही स्वामीनाथन आयोग के सी-2 फार्मूले के अनुसार धान और अन्य फसलों का न्यूनतम लाभकारी मूल्य देने और केंद्र सरकार के बजट में कृषि क्षेत्र की सब्सिडी में की गई कटौती को भी वापस लेने की मांग की गई।

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