कला साहित्य एवं संस्कृति

सुरेश सेन निशांत* की कविताएँ प्रस्तुत हैं. कविताओं पर चर्चा की उम्मीद है.: अनिल करमेले प्रस्तुत. दस्तक़ में आज.

ऐसे समय में जबकि वैचारिकता से कोसों दूर रहने वाले मजमेबाज़ कई अकवि और कुकवि हिंदी कविता में अपनी जगह बना रहे हैं, एक सरल हृदय और शांत लेकिन अपने सरोकारों से लैस कवि *सुरेश सेन निशांत* का असमय चले जाना दुखद है. हमारे लिए भी यह शर्म की बात है कि ऐसे कवियों तक हमारी दृष्टि नहीं पहुंचती है. लोकप्रिय हथकंडों से दूर रहने वाले ऐसे कवियों को तरज़ीह देना हिंदी जगत का चलन नहीं है, लेकिन यह करना होगा. ऐसी कविताओं को सामने लाना और उन पर बात करना ज़रूरी है.

मित्र *कैलाश बनवासी* की एक संक्षिप्त टिप्पणी के साथ *सुरेश सेन निशांत* की कविताएँ प्रस्तुत हैं. कविताओं पर चर्चा की उम्मीद है…

० अनिल करमेल

*गहरे सामाजिक सरोकारों वाला कवि चला गया*

हम सबके प्रिय कवि *सुरेश सेन ‘निशांत’* जी का जाना जितना आकस्मिक है, उनके न होने की पीड़ा स्थायी है। दूर पहाड़ी गाँव में रहते उन्होंने कविता को ही अपना जीवन बना लिया था। अपने सरोकारों की बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी थी, कि उन पर विशेष नजर रखी जा रही थी. सत्ता अपनी मशीनरी का उपयोग उन जैसे खुले हृदय के कवि के लिये कर रही थी, जिसके कारण निशांत जी को कुछ वैसे ही भय से गुज़़रना पड़ा था जैसे कभी मुक्तिबोध को विचलित कर देने वाले दबावों से जूझना पड़ा था. इन सबका असर निश्चय ही उनके जीवन पर पड़ा और उनकी अस्वस्थता लगातार बढ़ती ही गयी। ऐसी मौतों के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से तंत्र का ही हाथ देखना चाहिये।

दूसरी बात, हिंदी कविता जगत ने उन्हें वह जगह नहीं दी जिसके वे हकदार थे। शायज इसलिये कि वे पद- प्रतिष्ठा-पुरस्कारों की जो घटिया राजनीति होती है उससे हमेशा दूर रहे। अपने सरोकारों को लेकर अडिग रहे। उनकी कवितायें इसकी गवाह हैं। पहाड़ के लोगों की पीड़ा और उनके संघर्ष उनकी कविताओं के केन्द्र में रहे। उनके साथ खास बात ये थी कि वे कविता के किसी भी स्थापित और लोकप्रिय ‘स्कूल’ से अलग अपनी संवेदना और दृष्टि के आधार पर लगातार लिखते रहे।

हिमाचल के इस कवि को सलाम!!

कैलाश बनवासी कलानवासी*
______________________________

*सुरेश सेन ‘निशांत’ की कविताएँ*

*|| ये पहाड़ ||*

ये पहाड़
ये कितनी बड़ी बिड़म्बना है
इस कठिन समय में
पहाड़ का एक आसान-सा चित्र
नहीं बन पा रहा है
एक छोटी-सी बच्ची से ।

उसे नहीं आ रहा है ख्याल
पहाड़ों पे वृक्ष बनाने का
वह चिड़ियों को
नहीं दे पा रही है
अपने उस चित्र में जगह
उगता सूरज
घुमड़ते बादल कुछ भी नहीं ।

पहाडों की नंगी देह पर
उकेरे हैं उसने
बिजली के बड़े-बड़े टावर
और चुपचाप चली गई
उस चित्र को वहाँ छोड़ ।

मैं भौंचक-सा खड़ा
डूबा उस चित्र में
सोचता हुआ कि
उसने पेड़ों को क्यों नहीं बुलाया
क्यों नहीं दिया न्यौता
चहचहाते पंछियों को
वह घुमड़ते बादलों से
क्यों नहीं बतिया पाई
अपने उस चित्र में ।

मैं अपराधी-सा शर्मिंदा
खड़ा रहा उस चित्र के सामने
माँगता हुआ मन ही मन माफ़ी
उस नन्ही मासूम से
कि हमने नहीं
उसने सुनी है
इस पहाड़ की कराहटें ।

*|| बीज ||*

बीज हूँ मैं
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे खेतों में
पेड़-पौधों की फुनगियों से सजा
धरती की नसों में करवट बदलता
तुम्हारे सपनों में फलता
बीज हूँ मैं
मुझे तुम्हारे पास लाए हैं
तुम्हारे पुरखे
कभी-कभी मैं
ख़ुद ही हवा-पानी के संग
डोलता हुआ आ गया

कभी पँछियों की बीट में
कभी मवेशियों की पूँछ से चिपका
कभी कामगारों की पीठ
मुझे ले आई तुम्हारी देहरी पे

बूढ़ी दादी ने मुझे संभाले रखा
मिट्टी और बाँस की पेड़ियों में
मुझ तक नहीं पहुँचने दिया घुणों को

तुम्हारे संग बहती
हवा-पानी नदी में रचा बसा
तुम्हारा सबसे बड़ा सखा
बीज हूँ मैं

चाहता हूँ मैं रहूँ
तुम्हारे विचारों में
तुम्हारी ख़ुशियों में
मैं भी लडूँ
तुम्हारी विपदा में
तुम्हारे हाथों की ताक़त बनकर

बीज हूँ मैं
मैं प्यार हूँ
हवा हूँ
पानी हूँ
पुरखों की एक मात्र निशानी हूँ
मैं हूँ तो तुमसे दूर है
महाजन की टेढ़ी नज़र

मैं हूँ तो
बची हुई है
तुम्हारे ज़िन्दा रहने की ख़बर

मैं हूँ तो
सजते रहेंगे गाँव हाट में
छोटी-छोटी ख़ुशियों के मेले

मैं हूँ तो
ज़रा-सा भीगने पर
पुलक से भर जाती है
परती धरती

मैं हूँ तो
सीधी रहेगी तुम्हारी पीठ

मैं हूँ तो
हरी रहेगी तुम्हारी दीठ

बीज हूँ मैं
मुझे मत बिसराना
किसी लालच में पड़कर
गिरवी मत रखना
मैं तुम्हारा ईमान हूँ

*|| मैं क्या ग़लत करता हूँ ||*

मैं क्या ग़लत करता हूँ
एक कवि से माँगता हूँ
उसका ईमानदारी भरा दिल.

एक फूल से चाहता हूँ
उसकी प्यार भरी गंध.

नदी के जल के पास रखता हूँ
मछलियों के संग
तैरने की इच्छा.

मैं क्या ग़लत करता हूँ
पत्नी की आँखों में ढूँढता हूँ
खोई हुई प्रेम भरी
चिठ्ठियों का मजमून.

बच्चों में ढूँढता हूँ
भविष्य के रास्तों की गंध.

स्वर्ग सिधारे पुरखों से
माँगता हूँ
धरती के चेहरे पे फैली
बिवाइयों के लिए माफी.

मैं क्या ग़लत करता हूँ
जो कविता से माँगता हूँ
अंधेरे में कंदील भर रोशनी
धूप में पेड़ भर छाँव
प्यास में घूँट भर जल.

*|| मृत्यु ||*

अच्छे बुरे की उसे
ज़रा भी समझ नहीं रही कभी
कभी वह नन्हे बच्चे को
उठा कर चल देती है
कभी उमंग में नाचते युवा को
बाजू से पकड़ कर चलती बनती है
कभी मरने की प्रार्थना कर रहे
बुजुर्ग की ओर देखती भी नहीं

अंधेरे में भागते
साये की तरह दिखी थी
कुछ विद्वानों को उसकी शक्ल
कुछ को दिखा था अंधेरा
कुछ ने गहरी नींद का नाम दिया उसे

वह हमेशा अचानक दबे पाँव
पहुँचती है किसी घर में और ले जाती है
अपना शिकार
यह तरीक़ा उसने क़स्बे की
बिल्लियों से सीखा है शायद ।

*|| इस वृक्ष के पास ||*

चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से
प्रार्थना में रत है यहाँ एक औरत
उसे विश्वास है
इस वृक्ष में बसते हैं देवता
और वे सुन रहे हैं उसकी आवाज़।

एक औरत और ईश्वर
रत है बातचीत में
चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से
ऎसा कौतुक
एक औरत ही रच सकती है
जो ईश्वर को स्वर्ग से उतार कर
एक वृक्ष की आत्मा में बसा दे ।

चिड़ियों की चहचहाहट
हवाओं की सरसराहट
कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा है उसे
सिवाय अपने ह्रदय की धड़कनों के
सिवाय अपनी प्रार्थना के ।

वृक्ष के हरे पत्ते
तालियों की तरह बजते हुए
दे रहे हैं उसे आश्वासन
कि उठो माँ
सुन ली है ईश्वर ने तुम्हारी प्रार्थना ।

मंदिर और मस्ज़िद से दूर
उनकी घंटियों और अजानों
से बहुत दूर
प्रार्थना में रत है एक औरत
चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से.

*|| अच्छे भाग वाला मैं ||*

अच्छे भाग वाला हूँ मैं
इतना बारूद फटने के बाद भी
खिल रहे हैं फूल
चहचहा रही हैं चिड़ियाँ
बचा है धरती पर हरापन
सौंधी ख़ुशबू

अभी भी नुक्कड़ों पे
खेले जा रहे हैं ऐसे नाटक
कि उड़ जाती है तानाशाह की नींद

बचा है हौंसला
आतताइयों से लड़ने का
इतने खौफ़ के बावजूद भी
गूँगे नहीं हुए हैं लोग

बहुत भागवाला हूँ मैं
बाज़ारवाद के इस शोर में भी
कम नहीं हुआ है भरोसा दोस्त
कवियों का
जीवन पर से

अभी भी
उन लोगों के पास
दूजों का दुख सुनने के लिए
है ढेर सारा वक़्त

अभी भी है
उनके दिल की झोली में
सांत्वना के मीठे बोल
द्रवित होने के लिए
बचे हैं आँसू
कुंद नहीं हुई है
इस जीवन की धार
बहुत ख़ुशक़िस्मत हूँ मैं
हवा नहीं बँधी है
किसी जाति से
और पानी धर्म से
चिड़िया अभी भी
हिन्दुओं के आँगन से उड़ कर
बैठ जाती है मुसलमानों की अटारी पे

उसकी चहचहाहट में
उसकी ख़ुशियों-भरी भाषा में
कहीं कोई फ़र्क नहीं

अच्छे भागवाला हूँ मैं
अभी भी लिखी जा रही है
अन्धेरे के विरुद्ध कविताएँ
अभी भी
मेरे पड़ोसी देश में
अफ़जल अहमद जैसे रहते हैं कई कवि

*|| पीठ ||*

यह दस वर्ष के लड़के की पीठ है
पीठ कहाँ हरी दूब से सजा
खेल का मैदान है
जहाँ खेलते हैं दिन भर छोटे-छोटे बच्चे

इस पीठ पर
नहीं है क़िताबों से भरे
बस्ते का बोझ
इस पीठ को
नहीं करती मालिश माताएँ
इस पीठ को नहीं थपथपाते हैं उनके पिता
इस दस बरस की नाज़ुक-सी पीठ पर है
विधवा माँ और
दो छोटे भाइयों का भारी बोझ
रात गहरी नींद में
इस थकी पीठ को
अपने आँसुओं से देती है टकोर एक माँ
एक छोटी बहिन

अपनी नन्हीं उँगलियों से
करती है मालिश
सुबह-सुबह भरी रहती है
उत्साह से पीठ

इस पीठ पर
कभी-कभी उपड़े होते हैं
बेत की मार के गहरे नीले निशान
इस पीठ पर
प्यार से हाथ फेरो
तो कोई भी सुन सकता है
दबी हुई सिसकियाँ

इतना सब कुछ होने के बावजूद
यह पीठ बड़ी हो रही है

यह पीठ चौड़ी हो रही है
यह पीठ ज़्यादा बोझा उठाना सीख रही है

उम्र के साथ-साथ
यह पीठ कमज़ोर भी होने लगेगी
टेढ़ी होने लगेगी ज़िन्दगी के बोझ से
एक दिन नहीं खेल पाएँगे इस पर बच्चे

एक दिन ठीक से घोड़ा नहीं बन पाएगी
होगी तकलीफ़ बच्चों को
इस पीठ पर सवारी करने में

वे प्यार से समझाएँगे इस पीठ को
कि घर जाओ और आराम करो
अब आराम करने की उम्र है तुम्हारी
और मँगवा लेंगे
उसके दस बरस के बेटे की पीठ
वह कोमल होगी
ख़ूब हरी होगी
जिस पर खेल सकेंगे
मज़े से उनके बच्चे !

*|| माँ की कोख में ||*

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा
एक खिलता हुआ फूल
याद आता है माँ को ।

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा
आसमाँ में उड़ती चिड़िया पे
बहुत प्यार आता है माँ को

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा
मछली-सी तैरती जाती है
ख़्यालों के समन्दर में माँ
अपने बच्चे के संग-संग

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा
सैकड़ों फूलों की ख़ुशबू
हज़ारों पेड़ों का हरापन
अनन्त झरनों का पानी
अपने आँचल से
उड़ेल देती है माँ
ज़िन्दगी के सीने में ।

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा
पृथ्वी के सीने में भी
उतर आता है दूध
फैल जाता है हरापन
खिलते हैं फूल
निखरती है ख़ुशी !

*|| देश कोई रिक्शा तो है नहीं ||*

देश कोई रिक्शा तो है नहीं
जो फेफड़ों की ताक़त की दम पे चले
वह चलता है पैसों से

सरकार के बस का नहीं
देना सस्ती और उच्च शिक्षा
मुफ़्त इलाज भी
सरकार का काम नहीं

कल को तो आप कहेंगे
गिलहरी के बच्चे का भी
रखे ख़याल सरकार
वे विलुप्त होने की कगार पे हैं

परिन्दों से ही पूछ लो
क्या उन्हें उड़ना
सरकार ने सिखाया है..?

क्या उनके दुनके में
रत्ती-भर भी योगदान है सरकार का
जंगल में
बिना सरकारी अस्पताल के
एक बाघिन ने
आज ही दिया जन्म
तीन बच्चों को
एक हाथी के बच्चे ने
आज ही सीखा है नदी में तैरना

बिना सरकारी योगदान के
पार कर गया नीलगायों का झुण्ड
एक खौफ़नाक बहती नदी

सरकार का काम नहीं है
कि वो रहे चिन्तित

उन जर्जर पुलों के लिए
जिन्हें लाँघते है हर रोज़
ग़रीब गुरबा लोग

सरकार के पास नहीं है फुर्सत
हर ग़रीब आदमी की
चू रही छत का
रखती रहे वह ख़याल
और भी बहुत से काम है
जो करने हैं सरकार को

मसलन रोकनी है महँगाई
भेजनी है वहाँ सेना
जहाँ लोग बनने ही नहीं दे रहे हैं
सेज

सरकार को चलाना है देश
वह चलता है पैसों से
और पैसा है बेचारे अमीरों के पास
आज ही सरकार
करेगी गुज़ारिश अमीरों से
कि वे इस देश को
ग़रीबी में डूबने से बचाए

देश की भलाई के लिए
अमीर तस्करों तक के आगे
फैलाएगी अपनी झोली
बदले में देगी
उन्हें थोड़ी-सी रियायतें

क्योंकि देश कोई रिक्शा तो नहीं
जो फेफड़ों की ताक़त के दम पे चलें
वह तो चलता है पैसों से !

*|| काग़ज़ ||*

इस काग़ज़ पर
एक बच्चा सीखेगा ककहरा
एक माँ की उम्मीदें
इस काग़ज़ पर उतरेंगी
चिड़िया की तरह
दाना चुगने के लिए

एक पिता देखेगा
अपने संग बच्चे का भविष्य
सँवरता हुआ

इस काग़ज़ पर सचमुच
एक लड़का सीखेगा ककहरा

एक कवि लिखेगा कविताएँ
इस काग़ज़ पर
एक-एक शब्द को लाएगा
गहन अँधेरों से ढूँढकर

हज़ारों प्रकाश-वर्ष की दूरी
तय करेगा इस छोटे से काग़ज़ पर
अपनी चेतना की
रौशनाई के सहारे
एक-एक पंक्ति को
कई-कई बार लिखेगा
तपेगा दुख की भट्टी में
कितने ही रतजगे होंगे उसके

इस काग़ज़ के भीतर
सदियों बाद भी
किसी कबीर का
तपा-निखरा चेहरा झाँकता मिलेगा
इसी तरह के किसी काग़ज़ पे

इस काग़ज़ पर
लिखे जाएँगे अध्यादेश भी

इस काग़ज़ पर
कोई न्यायाधीश
लिख देगा अपना निर्णय
क़ानून की किसी धारा के तहत

और सो जाएगा
मज़े से गहरी नींद

इस काग़ज़ पर
एक औरत लिखना चाहेगी
अपने मन और ज़िस्म पे हुए
अनाचार की कथा

इस काग़ज़ पर
एक दूरदर्शी संत लिखेगा उपदेश
जिन पे वह ख़ुद कभी भी
नहीं करेगा अमल

एक मज़दूर लिखेगा चिट्ठी
इस काग़ज़ पर
अपने घर अपनी कुशलता की
आधी सदी के बाद भी
किसी स्त्री के संदूक में
सुरक्षित मिलेगा यह काग़ज़

इस काग़ज़ से
एक बच्चा बनाएगा कश्ती
और सात समन्दर पार की
यात्रा पे निकल जाएगा

*|| छोटे मोहम्मद ||*

छोटे मोहमद….!
पक गए दिखते हैं
देवकी के बगीचे के आम
चलो चुपक से
सुग्गों से पहले वहां पहुंच जाएं
दो-चार आम चुरा ले आएं
अपने एकान्त में
उनकी मिठास का
जी भर आन्द उठाएं

इस जेठ की दुपहरी में
सोए हुए हैं घर वाले
हवा बेठी है गुमसुम
भीगी बिल्ली सी
न्दी भी होगी अकेली
चलो ! नदी तक हो आएं
अपनी शरारतों में
उसे भी शामिल करें
संग उसके
खूब धमा-चौकड़ी मचाएं
और नदी को बताए बिना
उसके तलछट से
मोतियों और सीप जैसे
कुछ सुन्दर पत्थर समेटे लाएं

छोटे मुहम्मद!
खेतों में भुट्टे
कतने लगे हैं सूत
प्हरेदारी में खड़े हो गए हैं बिजूके
लगता है भर गया है दानों में रस।

चलो! श्रस भरे भुट्टों को
चोरी से तोड़ें
खडड् के किनारे भूनें
और मजे से खाएं
पर मुंह और हाथ से उठती
भुट्टों की भीनी गंध से
मं के हाथों पकड़े जाएं
छोटे मोहम्मद

अब नहीं रहा
वैसी शरारतों का मौसम
न रहे वो रस भरे आम के पेड़
न नदी ही रही उतनी चंचल
भुट्टों के खेतों में
बिजूके की जगह
खड़े हैं लठेत।

और झुलसे हुए हैं रिश्तों के भी चेहरे
किसकी लगाई आग है यह
जो दिखती नहीं
फिर भी झुलसा रही है
हमारे तन और मन को

छोटे मुहम्मद !
आओ सोचें कुछ
बीता जा रहा है मौसम
बच्चे हो रहे हैं बड़े
वहीं वे भी न झलसे
हमारी तुम्हारी तरह
इस नफरत की भयावह आग में।

*० सुरेश सेन नि‍शांत*

(जन्म : 12 अगस्त ,1969 निधन : 33 ,आक्टूबर 2818
_________________________
*० दस्तक के लिए प्रस्तुति : अनिल करमेले*

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