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सुधा के पूरे जीवन को देखता हूं तो ऐसा लगता है हम कोई कहानी पढ़ रहे हैं जिसमें एक संत को क्रूर राजा सताता है. ःः हिमांशु कुमार

13.11.2018

आज से करीब दस साल पहले अमेरिका की पीपल्स हिस्ट्री की किताब दिखाते हुए सुधा ने मुझसे कहा, हिमांशु मैं जब जेल जाऊंगी तो इस किताब का हिन्दी अनुवाद करूंगी। सुधा भारद्वाज से मेरी मुलाक़ात मेरे बस्तर में काम शुरू करने के कई साल बाद एक मीटिंग में हुई। सुधा मानवाधिकारों के लिए काम करती थीं। तब तक मैं और हमारे साथी सरकार की योजनाओं को आदिवासियों तक पहुंचाने में सरकार की मदद करते थे। मेरे एक हज़ार साथी बस्तर भर में स्वास्थ्य, शिक्षा,पानी बचाने, जंगल लगाने, युवाओं को रोज़गार मूलक प्रशिक्षण देने और महिलाओं के स्व-सहायता समूहों के द्वारा उनकी आमदनी बढ़ाने के लिए काम कर रहे थे। 

वैसे तो बस्तर पांचवीं अनुसूची में आता था। पांचवीं अनुसूची इलाके में सरकार बिना आदिवासियों की ग्राम सभा की इजाज़त के कोई खनन या उद्योग नहीं लगा सकती थी। लेकिन सरकार ने संविधान को नहीं माना। सरकार ने पांच हज़ार आदिवासी युवाओं को बंदूकें देकर गांव वालों को पीटकर -मारकर उन्हें गांव खाली करने के काम पर लगा दिया। इन्हें सरकार ने विशेष पुलिस अधिकारी कहा। इस काम में इनके साथ अर्ध सैनिक बल और पुलिस को भी शामिल कर दिया गया। इन सबने मिलकर आदिवासियों के साढ़े छह सौ गांवों को जला दिया। आज़ादी के बाद यह आदिवासियों पर सरकार का सबसे बड़ा हमला था। बच्चों के डॉक्टर बिनायक सेन को इसके खिलाफ आवाज़ उठाने के कारण सरकार ने जेल में डाल दिया था। 

 

इसी दौरान मेरी मुलाक़ात सुधा से हुई। पहली ही मुलाक़ात में सुधा नम्रता से बात करने वाली बहुत समझदार लगीं। इसके बाद कई साल तक हम लोगों ने साथ में काम किया। ज्यादा सच तो यह कहना होगा कि इसके बाद सुधा ने कई वर्षों तक मेरी बहुत मदद की। 

 

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार आदिवासियों की ज़मीनों पर कम्पनियों का कब्ज़ा कराने के लिए आदिवासियों के गांवों को जला रही थी। आदिवासी महिलाओं के साथ सुरक्षा बल के सिपाही और विशेष पुलिस अधिकारी बलात्कार कर रहे थे। सरकार निर्दोष बच्चों और युवाओं की हत्याएं कर रही थी। इस तरह की घटनाओं की सूचना मिलते ही हमारे साथी पीड़ित आदिवासियों से मिलते थे।

सुधा आकर उन लोगों को कानूनी मदद देने के लिए कागजात तैयार करती थीं। सुधा हमारे पास पांच सौ किलोमीटर का बस से सफर करके बिलासपुर से आती थीं। सुधा ने कभी हमसे किराया नहीं मांगा। सुधा हमारे सारे मुकदमें मुफ्त में लड़ती थीं। कई सारे मामलों में सुधा हमारे साथ गांव में जाकर पीड़ित आदिवासियों से मिलती थीं। 

सामसेट्टी गांवों में चार बलात्कार पीड़ित लड़कियों के साथ पुलिस वालों ने सामूहिक बलात्कार किया था। पुलिस मामले को दबाने में पूरी ताकत लगा रही थी। लेकिन सुधा ने उस मामले को अपने हाथ में लेकर पुलिस वालों के वारंट निकलवा दिए। लेकिन बाद में सरकार ने पूरी फ़ोर्स लगा कर लड़कियों का अपहरण करवा लिया और थाने में लाकर दुबारा बलात्कार करवाया। इस बीच मुझे छत्तीसगढ़ से निकाल दिया गया उसके बाद उन लड़कियों का पुलिस ने तीसरी बार अपहरण करके उनसे जबरदस्ती केस वापस करवा दिया।

सुधा के साथ मुझे देश के अलग-अलग शहरों में जाकर सभाओं को संबोधित करने का मौका मिला। सुधा बहुत अच्छी वक्ता हैं। वे बहुत सीधे सादे तरीके से अपनी बात श्रोता तक पहुंचा देती हैं।सुधा अमेरिका में पैदा हुई और लन्दन में पढ़ीं लेकिन उनके बारे में पूछने पर सुधा बहुत शर्मा कर ही यह बात बताती हैं। सुधा कभी नहीं चाहतीं की गांव से आये कार्यकर्ता सुधा को खुद से बड़ा समझें।

सुधा का रहन-सहन बहुत सादा है। खादी की सूती धोती और पैर में सस्ती सी चप्पल। नींद आने पर सुधा ज़मीन पर चादर बिछा कर चुपचाप सो जाती हैं। कुछ भी खा लेती हैं।संतों के वर्णन के मुताबिक़ सुधा इस ज़माने की संत हैं। जो जनता के लिए कष्ट सहन करते हैं। सब कुछ त्याग देते हैं और इस कारण जिन्हें सत्ता परेशान करती है। 

आज सुधा को सत्ता परेशान कर रही है। मोदी सरकार ने सुधा को जेल में डाल दिया है। मैं जानता हूं सुधा बहुत निर्दोष साबित होकर जेल से बाहर आयेंगी।सुधा के पूरे जीवन को देखता हूं तो ऐसा लगता है हम कोई कहानी पढ़ रहे हैं जिसमें एक संत को क्रूर राजा सताता है। कभी समय मिला तो सुधा के ऊपर एक उपन्यास लिखूंगा।

    हिमांशु कुमार 

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